G News 24 : मौत वाले 'सत्संग' के बाद,मौज करने वाले बाबा की भी तो बनती है कुछ जवाबदारी !

 जिस बाबा सत्संग में गिर गई 123 लाशें, वो बाबा भी तो करे उन परिजनों की आर्थिक मदद...

मौत वाले 'सत्संग' के बाद,मौज करने वाले बाबा की भी तो बनती है कुछ जवाबदारी !


भीड़ में विवेक नहीं होता... भीड़ भेड़ चाल में चलती है... यदि भीड़ को सुव्यवस्थित तरीके से नियंत्रित न किया जाए तो उसके अनुशासन तोड़ने में भी देर नहीं लगती. हाथरस में भीड़ के बेकाबू होने से बड़ा हादसा हुआ. इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई. ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति चिंता में डालने वाली है. देश में खास तौर पर धार्मिक आयोजनों में इस तरह की दुर्घटनाएं होती रही हैं लेकिन इन्हें रोकने के लिए अब तक कोई मैकेनिज्म विकसित नहीं हो सका है. यदि कोई व्यवस्था है भी तो, उसको लेकर प्रशासनिक प्रतिबद्धता के बजाय लापरवाही, सैकड़ों लोगों की मौत का कारण बनती है.

 उत्तर प्रदेश के हाथरस के सिकंदरराऊ इलाके के फुलरई गांव में मंगलवार को नारायण साकार विश्व हरि यानी ‘भोले बाबा' के सत्संग में उनके लाखों अनुयायी पहुंचे थे. इसी आयोजन के दौरान भगदड़ मच गई और 21 लोगों की मौत हो गई.जैसा कि हमेशा होता है सरकार ने इस हादसे में मरने वालों के परिवारों को दो-दो लाख रुपये और घायलों को 50-50 हजार रुपये की आर्थिक मदद देने की घोषणा कर दी. हादसे की मजिस्ट्रियल जांच का लिए एक समिति गठित की गई जो कि पता लगाएगी कि इस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कौन है? यह कमेटी इस बात की भी जांच करेगी कि क्या यह साजिश थी? 

दुर्घटना के बाद सरकार तो अपना काम कर ही रही है। लेकिन जिस बाबा सत्संग में गिर गई 123 लाशें, वो बाबा भी तो करे उन परिजनों की आर्थिक मदद, क्योंकि आज बाबा के पास जो अरबों की चल-अचल संपत्ति है उसे भी तो बाबा ने इन्ही अंधभक्तों को गुमराह करके इन्ही से इनके ही माध्यम से चंदा उगाही करवा कर बनाया है। ऐसे उस पैसे से भगदड़ में मारे 123 लोगों के परिजनों की आर्थिक मदद बाबा क्यों नहीं कर रहा है। सरकार इस दिशा में बाबा को निर्देशित कर सकती है।  

जांच के निष्कर्षों से नहीं  लिए जाते हैं सबक !

जब भी इस तरह की कोई घटना होती है, इसी तरह के आदेश जारी किए जाते हैं. घटनाओं की जांच लंबी चलती है.. काफी हफ्तों, महीनों और कई बार वर्षों बाद जांच की रिपोर्ट आती हैं, लेकिन इनके निष्कर्ष भी अक्सर अस्पष्ट ही होते हैं. फिर सबसे बड़ी बात की हादसे दर हादसे होते रहने के बावजूद इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं बनाई जाती. 

हाथरस के हादसे से सरकार और प्रशासन के कामकाज के तरीकों को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं. बड़े धार्मिक आयोजनों को लेकर क्या प्रशासन आयोजकों से कभी पूछता है कि उसमें कितने लोग शामिल होंगे? यदि पूछा भी जाता है तो क्या आयोजन के दौरान आए लोगों की तय संख्या की पुष्टि की जाती है? यदि निर्धारित तादाद से अधिक लोग आ रहे हैं, तो क्या उन्हें रोकने के लिए कोई इंतजाम होते हैं? क्या प्रशासन आयोजन स्थल की क्षमता की तुलना में वहां आने वाले लोगों की संख्या को लेकर इंतजामों का आकलन करता है?     

आयोजकों को गई हिदायतों पर अमल नहीं, तो कार्यवाही हो सुनिश्चित

प्रशासन की ओर से आयोजकों से क्या यह पूछा जाता है कि उन्होंने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए क्या इंतजाम किए हैं? यदि यह जानकारी मिल गई है तो क्या आयोजकों की व्यवस्था का मौके पर आकलन किया जाता है? यदि जरूरत के मुताबिक व्यवस्था नहीं है तो क्या प्रशासन की ओर से आयोजकों को जरूरी निर्देश और हिदायतें दी जाती हैं? यदि आयोजकों की व्यवस्था पुख्ता नहीं है तो क्या प्रशासन जरूरत के मुताबिक अपना अतिरिक्त अमला तैनात करता है? 

प्रशासन आश्वस्त हुए बिना दी मंजूरी !

इसी तरह के और भी कई सवाल हैं जो इस तरह के हादसों को लेकर सरकारी व्यवस्थाओं पर उंगली स्वाभाविक तौर पर उठा रहे हैं. निश्चित तौर पर सार्वजनिक आयोजनों के दौरान प्रशासन का उक्त सभी मुद्दों को लेकर आश्वस्त होना जरूरी है, लेकिन जमीन पर क्या हमेशा ऐसा होता है? जब हाथरस के सत्संग में 80 हजार लोग आने थे, तो फिर तीन लाख लोग कैसे पहुंच गए? क्या प्रशासन मूक बनकर बेतहाशा भीड़ बढ़ती देखता रहा? सत्संग में तीन लाख लोग और उनको नियंत्रित करने के लिए सिर्फ 40 पुलिस कर्मी? प्रशासन ने 80 हजार लोगों के शामिल होने की अनुमति दी थी. यदि इस हिसाब से भी तैनात किए गए पुलिस कर्मियों की संख्या देखें, तो क्या यह युक्तिसंगत है?                     

हाथरस में सत्संग स्थल पर न फायर ब्रिगेड थे, न डॉक्टरों का दल था, न ही एंबुलेंस थीं. वहां न तो खानपान का समुचित इंतजाम था, न ही गर्मी से बचाव के लिए पंखों आदि का कोई प्रबंध था. इससे भी बड़ी खामी यह कि, भारी भीड़ वाले आयोजन में लोगों के आने और जाने के लिए कोई स्थान तय नहीं था. देश में पहले हुए हादसों में भी यह एक बड़ी खामी पाई गई थी.           

धार्मिक आयोजनों में पहले भी हुईं कई घटनाएं

महाराष्ट्र के नासिक जिले में 27 अगस्त 2003 को कुंभ मेले में स्नान के दौरान भगदड़ में 39 लोगों की मौत हुई थी और करीब 140 लोग घायल हो हुए थे. इसके दो साल बाद महाराष्ट्र के ही सतारा जिले में 25 जनवरी 2005 को मंधारदेवी मंदिर में एक सालाना तीर्थयात्रा के दौरान भगदड़ मची थी. इसमें 340 से अधिक लोगों की भीड़ द्वारा कुचले जाने से मौत हो गई थी. सैकड़ों घायल हो गए थे. 

सन 2008 में 3 अगस्त को हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में नैना देवी मंदिर में मची भगदड़ में 162 लोगों की मौत हुई थे और 47 व्यक्ति घायल हो गए थे. भगदड़ चट्टान गिरने की अफवाह की वजह से मची थी. इसी साल 30 सितंबर को राजस्थान के जोधपुर में चामुंडा देवी मंदिर में बम विस्फोट की अफवाह फैल गई थी. इससे भगदड़ मच गई थी जिसमें लगभग 250 लोगों की मौत गई थी. हादसे में 60 लोग घायल हो गए थे.

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में 4 मार्च 2010 को कृपालु महाराज के राम जानकी मंदिर में मची भगदड़ में 63 लोगों की मौत हुई थी. केरल के इडुक्की जिले के पुलमेडु में 14 जनवरी 2011 को सबरीमला के दर्शन करके लौट रही भीड़ में भगदड़ मच गई थी. इसमें 104 लोग मारे गए थे और 40 घायल हो गए थे.


G News 24 : प्रदेश पर बढ़ते हुए कर्ज के लिए लाडली बहन जैसी योजनाएं नहीं है जिम्मेदार !

 सरकारी पैसे के दम पर ऐश करने वाले मंत्री-विधायकों के कारण बढ़ रहा है प्रदेश पर कर्ज !

 प्रदेश पर बढ़ते हुए कर्ज के लिए लाडली बहन जैसी योजनाएं नहीं है जिम्मेदार !

गरीब एवं मध्यमवर्गीय परिवारों की महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए पहले भी केंद्र और राज्य सरकार है तमाम योजनाएं चलाती रही हैं, ताकि महिलाओं को कुछ इन योजनाओं से आर्थिक मदद मिल सके और उनके जीवन स्तर में कुछ सुधार हो। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा महिलाओं बच्चियों के उत्थान के लिए तमाम स्कीम में चलाई जा रही थी। इन स्कीमों के के संचालन में होने वाले पैसे के खर्चों को लेकर उन्होंने कभी भी इन योजनाओं को प्रदेश पर बढ़ते हुए कर्ज के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया और ना ही उन्होंने कभी इस प्रकार की योजनाओं को बंद करने का विचार बनाया। वर्तमान समय में यदि प्रदेश की सत्ता  शिवराज सिंह चौहान के हाथ में होती तो शायद,किए गए वादे के अनुसार अभी तक लाडली बहना को इस योजना के माध्यम से₹3000 मासिक मिलना आरंभ हो गया होता ! प्रदेश में योजनाओं का संचालन कैसे किया जाना है इसके लिए पैसा कहां से जुटना है यह शिवराज सिंह चौहान को भलीभांति आता है। 

लेकिन जबसे डॉक्टर मोहन यादव के हाथ में प्रदेश की सत्ता आई है तब से प्रदेश की योजनाओं को सुचारू रूप से संचालन को लेकर संशय बना हुआ है। बार-बार प्रदेश पर बढ़ते हुए कर्ज को लेकर इन योजनाओं को  प्रदेश जिम्मेदार  ठहराया जाता है। जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि टैक्स के रूप में आमजन से सरकार जो पैसा वसूलती हैं वही पैसा प्रदेश द्वारा चलाई जाने वाली तमाम विकास की योजनाओं संचालन का संचालन होता है। सरकार यदि टैक्स में₹1 की भी बढ़ोतरी करती है तो सरकारी खजाने में अरबो रूपया इकट्ठा हो जाता है तो फिर भला कोई योजना प्रदेश पर बढ़ते हुए कर्ज के लिए कैसे जिम्मेदार हो सकती है ? 

प्रदेश पर बढ़ते हुए कर्ज के लिए जिम्मेदार है सरकार के विधायक और मंत्री हैं जिन्हें सारी सुख सुविधाओं के साथ-साथ लाखों रुपए सैलरी, वाहन-पेट्रोल भत्ता,फ्री हवाई- रेल यात्रा, खुद के गृह नगर और राजधानी में बंगला और इन बंगलो पर फ्री  बिजली-पानी, बंगलो पर तैनात सैकड़ो कर्मचारी और उनकी सैलरी आदि सहित तमाम में से खर्चे हैं जिनकी भरपाई सरकारी खजाने से ही होती है। ये खर्चे कोई मामूली खर्चे नहीं है बल्कि इन पर खर्च होने वाला यह पैसा अरबो रुपए होता है। देश-प्रदेश पर बढ़ते कर्ज का असली कारण यही है। ये छोटी-मोटी योजनाएं नहीं।  

यूं  तो सभी नेता अपने आप को जनसेवक कहते हैं वोट मांगते समय हाथ जोड़कर जनता की सेवा करने की सौगंध भी कहते हैं, लेकिन जब यह चुनाव जीत जाते हैं मंत्री या और विधायक बन जाते हैं तो फिर यह जनता से अपनी सेवा करवाते हैं उसके द्वारा दिए गए टैक्स से मिले पैसे पर ऐस करते हैं। अभी यहां प्रश्न वही उठता है कि यदि यह जन सेवक हैं तो सेवा के बदले सैलरी कैसी ? सेवा के बदले घर चलाने के लिए कुछ सुविधाऐ या मेहनताना तो ले सकते हैं लेकिन इतनी भारी-भरकम सुविधाएं, समझ से परे हैं। और यदि प्रदेश की सत्ता चलाने के लिए ये मंत्री विधायक अपनी  सेवाओं को नौकरी के रूप में देखते हैं तो, इन्हें  सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों के समान सिर्फ सैलरी ही मिलना चाहिए अन्य सुख सुविधा नहीं। 

 अन्य सुविधाओं का यदि उन्हें लाभ लेना है तो उसकी भरपाई सरकारी कर्मचारियों की तरह अपनी सैलरी में से करना सुनिश्चित होना चाहिए। इन्हे एक पेंशन ही मिले,अपना इनकम टैक्स ये स्वयं भरें,इतना ही नहीं चुनावों के दौरान जो पार्टी प्रत्याशी को चुनाव लड़ाने के लिए, जो बंदोबस्त और चुनावी सभाएं आदि सत्ताधारी पार्टी द्वारा सरकारी खजाने से किए जाते हैं। उन पर होने वाले खर्च की वसूली भी पार्टी फंड या पार्टी उम्मीदवार से की जानी चाहिए। सरकारी खजाने से नहीं। 

यदि इस सब पर अमल किया जाएगा तो प्रदेश कर्ज से तो बाहर आएगा ही आएगा बल्कि विकास की नई इबादत भी लिखेगा। देश और प्रदेश को यदि वास्तविक रूप से कर्ज से बाहर निकलना है तो जिम्मेदार मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को इस प्रकार के निर्णय लेना होंगे।

G News 24 : सोशल मीडिया और रील बनाने का क्रेज हो रहा है जानलेवा !

 चलती बाइक पर लाइव करना पड़ा भरी, मौत से टक्कर का वीडियो वायरल...

सोशल मीडिया और रील बनाने का क्रेज हो रहा है जानलेवा !

सोशल मीडिया की लत से होने वाले नुकसान को लेकर विशेषज्ञों की ओर से बार-बार चेतावनी दी जाती है, लेकिन आम लोगों के बीच इसका असर नहीं दिखाई पड़ रहा और न वह इसकी गंभीरता को समझ रहे हैं। हालात यह हो चले हैं कि अब सोशल मीडिया और रील बनाने का क्रेज जानलेवा साबित हो रहा है।

आए दिन ऐसे हादसे अब आम हो चले हैं, जहां लोग रील बनाने के चक्कर में खतरनाक जगहों पर चले जाते हैं या फिर जानलेवा हरकतें करते हैं और हादसे का शिकार हो जाते हैं। दो दिन पहले तिघरा में सेल्फी लेते वक्त युवक गहरे पानी में गिर गया था,वह तो गनीमत रही कि यहां तैनात लाइफ गार्डों ने समय रहते बचा लिया। दूसरा वाक्या रेलवे ट्रेक पर सेल्फी लेते समय हुआ जिसमें दो दोस्तों ने अपनी जान गवां दी ऐसी ना जाने कितनी ख़बरें आये दिन देखने व सुनने में आती हैं लेकिन लोग हैं कि इन घटनाओं से कोई सबक लेते ही नहीं हैं। 

एक वीभत्स वीडियो सोशल मीडिया पर खूब तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दो युवक चलती बाइक में वीडियो बनाना शुरु कर देते हैं। पहले पीछे बैठा हुआ शख्स सेल्फी कैमरे से वीडियो रिकॉर्ड करता है।

कैमरे में कैद हुआ एक्सीडेंट

इसके बाद गाड़ी चला रहा शख्स भी आगे की रोड छोड़कर मोबाइल फोन में देखने लगता है। दोनों युवक कैमरे पर कुछ कहते हुए देखे जा सकते हैं और किसी का ध्यान आगे नहीं है। इसी बीच उनकी गाड़ी असंतुलित हो जाती है और रोड से नीचे उतर जाती है। वीडियो में दोनों का एक्सीडेंट होते देखा जा सकता है। बताया जा रहा है कि मामला महाराष्ट्र के धुले-सोलापुर हाईवे का है।

एक की मौत

रिपोर्ट्स के अनुसार हादसे में एक शख्स की मौत हो गई है, जबकि दूसरा शख्स गंभीर रूप से घायल हो गया है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियों पर लोगों के रिएक्शन भी आ रहे हैं, जिसमें लोग युवकों की लापरवाही के और उनके रील्स के पागलपन को लेकर कमेंट्स कर रहे हैं।

G News 24 : संसद भवन से "सेंगोल" को हटाने की मांग तो बहाना है,इनका मकसद है संसद वाधित करना !

 सपा-कांग्रेस का कहना है कि "सेंगोल" राजा महाराजाओं का प्रतीक है। तो फिर इन निशानों पर ये क्या बोलेंगे...

संसद भवन से "सेंगोल" को हटाने की मांग तो बहाना है,इनका मकसद है संसद वाधित करना !

सपा-कांग्रेस का कहना है कि "सेंगोल" राजा महाराजाओं का प्रतीक है। इसे संसद से हटाया जाये। देश ये अच्छी तरह  जानता है कि तुम्हारी इस मांग के पीछे तुहारी मंशा को, संसद भवन से "सेंगोल" को हटाने की मांग तो बहाना है, आपका मकसद है संसद वाधित करना ! यदि आप सही में राजतंत्र का विरोध करते हैं  तो फिर इन निशानों पर ये क्या बोलेंगे -

  • 1. राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ किसका प्रतीक?
  • 2. तिरंगे लगा धर्म चक्र का प्रतीक अशोक चक्र किसका प्रतीक?
  • 3. अंग्रेजों के समय का बना राष्ट्रपति भवन किसका प्रतीक?
  • 4. मुगल सम्राट शाहजहां द्वारा बनवाए गए लाल क़िले में हर साल स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण किया जाता है। लाल क़िला किसका प्रतीक?  
  • 5. अकबर रोड, तुगलक रोड, औरंगजेब रोड ये सब किसका प्रतीक?

बात उठेगी तो दूर तलग जाएगी। RK चौधरी क्या आप अकबर रोड को बदलने की मांग कर सकते हैं ? क्या आप लाल क़िले से ध्वजारोहण ना करने की मांग कर सकते हैं ? क्या आप तमाम राज प्रतीकों को दिल्ली और देश के तमाम हिस्सों से हटाने की मांग संसद में करेंगे,अगर नहीं तो फिर सेंगोल ही निशाना क्यों ?  ये फालतू की घटिया राजनैतिक नौटंकी मत करो। संसद चलने दो। देश की जनता का पैसा और समय बर्वाद मत करो,  सेंगोल से क्या समस्या ? क्या आपको समस्या नये भारत से है ? या नए संसद भवन से है ? या फिर मोदी से है। यदि मोदी से है तो उनसे निपटो ये फालतू की घटिया राजनैतिक नौटंकी मत करो। 

तुम अभी 37 और कांग्रेस ने 99 सीट पाकर सैंगोल हटाने की मांग करने लगे। कभी तिलक-कलावे का विरोध करते हो, कभी राम का विरोध,आखिर तुम लोग अपनी मंशा खुलकर बता ही दो क्या चाहते हो ? क्या तुम जिस दिन 272 पाओगे सैंगोल की जगह चांद तारा और संविधान की जगह शरिया लाओगे। तुम्हारे व्यवहार और राजनीति को देखकर ऐसा ही प्रतीत होता है। 

G News 24 : पांच वक्त का नमाजी होने पर हाई कोर्ट ने फांसी को उम्रकैद में बदला !

 ओडिशा हाई कोर्ट ने छह साल की बच्ची से बलात्कार और फिर उसकी हत्या के दोषी को दी राहत ? 

पांच वक्त का नमाजी होने पर हाई कोर्ट ने फांसी को उम्रकैद में बदला !

देश की न्याय व्यवस्था किस दिशा में जा रही है, इसका अंदाज़ा जिम्मेदारों को नहीं है शायद ! अभी हाल ही में आये कुछ फैसलों से तो यही लगता है। न्याय की कुर्सी पर बैठे फैसला सुनाने वाले ये भूल जाते हैं की उनका सुनाया गया फैसला किसी की जिंदगी को कितना प्रभावित करेगा। अभी हाल ही में राउज एवन्यु कोर्ट दिल्ली की एक जज महोदया ने शराब घोटाला केस में ईडी द्वारा केस में सबूत के तौर पर प्रस्तुत दस्तावेजों को देखे वगैर ही  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जमानत दे दी थी। हालाँकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर तुरंत रोक भी लगा दी। 

और अब ओडिशा हाई कोर्ट ने ऐसे अपराधी को मिली फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला है. जो एक छह साल की मासूम बच्ची से बलात्कार और हत्या का दोषी है। लगातार आने वाले ऐसे फैसले लोगों की अदालतों एवं न्याय के प्रति आस्था-विश्वास पर प्रशन खड़ा करते हैं। 

क्या किसी अपराधी की सजा इस आधार पर कम की जा सकती है कि वह दिन में कई बार नमाज पढ़ता है ? वह भी तब जब वह छह साल की मासूम बच्ची से बलात्कार और हत्या का दोषी हो ? यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि ओडिशा हाई कोर्ट ने ऐसे अपराधी को मिली फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला है. ऐसे निर्णय देने वाले न्यायधीशों के बारे में बार काउंसिल और शीर्ष अदालतों को मंथन करना चाहिए कि वे उनके जज इस न्याय व्यवस्था के लिए कितने फिट बैठते है। 

HC ने फैसले में मामले को इस आधार पर 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' नहीं माना कि 'वह (दोषी) दिन में कई बार भगवान से प्रार्थना करता है और वह सजा कबूल करने के लिए तैयार है, क्योंकि उसने खुदा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है'. केवल 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामलों में ही मृत्युदंड की सजा दी जा सकती है.

G News 24 : PM मोदी की इटली यात्रा से अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले की परतें खुलने की बंधी उम्मीद !

 इटली ने भारत को सौंपे सीलबंद डॉक्यूमेंट,कांग्रेस नाराज...

PM मोदी की इटली यात्रा से अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले की परतें खुलने की बंधी उम्मीद ! 

G-7 शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इटली यात्रा तीसरे कार्यकाल में उनकी पहली विदेश यात्रा और सात देशों के समूह के बैठक (जी-7) में जाने का उनका पांचवां कार्यक्रम था। हालांकि, इटली में उनके गर्मजोशी से हुए स्वागत ने कई लोगों, विशेष रूप से इसने कांग्रेस पार्टी को परेशान कर दिया। 

क्योंकि इटली के द्वारा भारत को सौंपे गए सीलबंद इतालवी दस्तावेजों में रक्षा घोटाले में रिश्वत पाने वालों के नाम भी हैं। इससे यूपीए-2 के दौरान सत्ता में बैठे लोगों के लिए खतरे की घंटी बजना तय है और सबसे बड़े रक्षा घोटालों में से एक, जो एक दशक तक दबा रहा, वह अब बाहर आने के लिए तैयार नजर आ रहा है।

शायद यही कारण है कि कांग्रेस पीएम मोदी की इटली यात्रा के पीछे के उद्देश्य पर सवाल उठाती रही। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस की नाराजगी का कारण अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला (वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाला) का 'डर' हो सकता है, जो उसे परेशान कर रहा है, खासकर ऐसे समय में जब वह लोकसभा चुनाव में पार्टी की सफलता का जश्न मना रही है।

इटली ने भारत को सौंपे हैं सीलबंद डॉक्यूमेंट

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने भी सवाल किया, 'जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए पीएम मोदी की इटली यात्रा के बारे में कांग्रेस लगातार क्यों शिकायत कर रही थी' और उन्होंने यह भी विवरण साझा किया कि सबसे पुरानी पार्टी को क्या 'चिंतित और परेशान' कर रहा है। एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय दैनिक ने सूत्रों का हवाला देते हुए दावा किया कि इटली ने अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले पर अपनी अदालत के 225 पृष्ठों के विस्तृत फैसले और रिश्वत घोटाले से संबंधित कुछ दस्तावेजों को भारत के साथ साझा किया है। इससे साफ है कि ये दस्तावेज पूरे खेल को पलट सकते हैं और भारत में उच्च प्रोफाइल वाले राजनेताओं और बिचौलियों को उनके इस अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है।

यूपीए-2 के कई चेहरे हो सकते हैं बेनकाब

बता दें कि 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी जब पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बने, उसके लगभग 8 महीने पहले, इटली की एक अदालत ने भारत से जुड़े सबसे बड़े रिश्वत घोटालों में एक हाई प्रोफाइल कंपनी के सीईओ, एक इतालवी रक्षा कंपनी के अध्यक्ष और दो बिचौलियों सहित चार लोगों को दोषी ठहराते हुए एक फैसला सुनाया था। लेकिन, इस मामले में वहां की अदालत में दर्ज अभियुक्तों के पूरे बयान, अपीलों का पूरा लेखा-जोखा और अदालत के अंतिम फैसले को 2013 में भारत के दबाव में तत्कालीन इतालवी सरकार द्वारा कभी भी सार्वजनिक नहीं किया गया था, क्योंकि इससे भारत के राजनीतिक और नौकरशाही प्रतिष्ठानों में भूचाल आ सकता था।

इन दस्तावेजों के जरिए जो खुलासा होता उससे भारत के प्रमुख राजनीतिक परिवार और बिचौलियों के पूरे नामों का खुलासा हो जाता, जिन्हें अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले में 600 करोड़ रुपये से अधिक की रिश्वत मिली थी। इस मामले में भारत में इसको लेकर रिश्वत प्राप्त करने वालों के नाम इतालवी अदालत के दस्तावेजों में सील कर दिए गए।

 3,600 करोड़ में खरीदे थे 12 VVIP हेलीकॉप्टर

हेलिकॉप्टर घोटाला भले ही भारत में अंजाम तक नहीं पहुंचा हो, लेकिन इतालवी अदालत ने भारतीय समकक्षों को रिश्वत देने वालों को इस मामले में दोषी ठहराया है। अब बताया जा रहा है कि इटली के द्वारा भारत को सौंपे गए सीलबंद इतालवी दस्तावेजों में रक्षा घोटाले में रिश्वत पाने वालों के नाम भी हैं। इससे यूपीए-2 के दौरान सत्ता में बैठे लोगों के लिए खतरे की घंटी बजना तय है और सबसे बड़े रक्षा घोटालों में से एक, जो एक दशक तक दबा रहा, वह अब बाहर आने के लिए तैयार नजर आ रहा है।

विशेष रूप से, अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाला यूपीए-2 शासन का एक भ्रष्टाचार का मामला है, जिसमें बिचौलियों और शायद राजनेताओं को भी रिश्वत दी गई थी, क्योंकि भारत ने इतालवी रक्षा विनिर्माण दिग्गज फिनमैकेनिका द्वारा अनुमानित लागत पर 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टर खरीदने का 3,600 करोड़ रुपये का सौदा किया था।

G.NEWS 24 : चंद पैसौं से लालच के में होने दे रहे हैं पानी की बर्बादी और कर रहे हैं डीजल की चोरी !

नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों की लापरवाही और अनदेखी के कारण...

चंद पैसौं से लालच के में होने दे रहे हैं पानी की बर्बादी और कर रहे हैं डीजल की चोरी !

ग्वालियर। शहर में पानी का क्राइसिस बना हुआ है नगर निगम ग्वालियर के द्वारा शहर वासियों को अभी एक दिन छोड़कर  पानी सप्लाई किया जा रहा है और आने वाले दिनों में दो दिन छोड़कर के सप्लाई दिए जाने के लिए अधिकारियों द्वारा विचार किया जा रहा है। 

जिला कलेक्टर ग्वालियर और नगर निगम आयुक्त के द्वारा भी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि शहर में कहीं भी पानी की बर्बादी ना हो जितने भी धुलाई सेंटर शहर में चल रहे हैं वे पानी की समस्या को देखते हुए इस समय बंद रहेंगे। स्पष्ट आदेश के बावजूद शहर के तमाम स्थानों पर निगम के कर्मचारियों को चंद पैसे की रिश्वत देकर धुलाई सेंटर बदस्तूर चल हैं। 

जिन कर्मचारियों पर इन सेंटर्स के खिलाफ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है वे ही कुछ पैसे लेकर इन धुलाई सेंटर वालों को खुली छूट दे रहे हैं। दिखावे के लिए कार्रवाई की जाती है उसके घंटे 2 घंटे बाद ही फिर से ये सेंटर खुल जाते हैं।

यह स्थिति तो है शहर के बीचो-बीच नौगज,रोड डीडी मॉल के चल धड़ल्ले से रहे हैं। या तो मुख्य सड़क की स्थिति है इसी प्रकार गली मोहल्ले और बाजारों में न जाने कितने धुलाई सेंटर पानी की बर्बादी कर रहे। यहां जो गाड़ियां धो रहे हैं और जो गाड़ियां खुलवा रहे हैं जिनकी गाड़ियां ढोई जा रही हैं उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं है कि लोग पानी के लिए परेशान है चारों तरफ पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। इन्हें तो सिर्फ पैसे से मतलब है लोग चाहे फिर परेशान हो या आपस में पानी के लिए झगड़ा या मरे कोई परवाह नहीं। जिम्मेदार कर्मचारी इन सेंटर्स के खिलाफ कार्रवाई इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्हें भी उनका हिस्सा मिल रहा है।

यही स्थिति शहर में कचरा उठाने वाले वाहनों की है इन वहानों के चालक, वाहनों से डीजल निकाल कर के प्राइवेट गाड़ी वालों को बेच रहे हैं। कई ड्राइवर तो ऐसे हैं जिन्होंने उसी क्षेत्र में सेटिंग कर ली है जिस क्षेत्र में ये कचरा उठाने जाते हैं और वहां के वाहन चालकों को डीजल बेच देते हैं।जब यह खबर मीडिया वालों को पता है तो क्या नगर निगम के अधिकारियों के संज्ञान में यह बात क्यों नहीं है। इन वाहन चालकों पर नजर क्यों नहीं रखी जा रही है। अधिकारी क्यों नहीं इनके बहन की तलाशी लेते हैं। यह वाहन चालक वाहन के अंदर ही छिपा करके कट्टे या बोरी के अंदर  में डीजल की खाली या भरी केन रखे रहते हैं और जैसे ही मौका मिलता है डीजल निकाल करके प्राइवेट वाहन चालकों को बेच देते हैं।

मार्केट रेट से मात्र चार या ₹ 5 के अंतर से ये लोग डीजल निकाल करके प्राइवेट लोगों को बेच रहे हैं। यदि मान जाए कि एक गाड़ी वाला 2 दिन में 10 लीटर डीजल भी बेचता है तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि शहर में कचरा उठाने के कार्य में कितने वाहन लगे हुए हैं। इनकी संख्या के आधे लोग भी यदि डीजल बेच रहे हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने राजस्व का नुकसान इनके द्वारा किया जा रहा है।

- रवि यादव

G News 24 : ऑफेंसिव पर डिफेंस खेलते हुए पूरी ताकत के साथ एक्शन में हैं मोदी !

 दिल्ली में पर्दे के पीछे हुई तेजी से बदलती घटनाएँ...

ऑफेंसिव पर डिफेंस खेलते हुए पूरी ताकत के साथ एक्शन में हैं मोदी !

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद यह स्पष्ट हुआ कि भाजपा को केवल 240 सीटें मिलेंगी। उस समय श्री मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और नड्डा ने विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया कि हम विपक्ष में बैठेंगे। और गठबंधन के साथियों को फोन कर सूचित किया गया कि आप स्वतंत्र हैं अपना निर्णय लेने के लिए। इंडी अलायंस को शासन करना चाहिए। सबसे पहले चिराग पासवान और शिंदे ने कहा कि हम आपके फैसले में शामिल हैं और हम भी विपक्ष में बैठने के लिए तैयार हैं। ध्यान दें कि मोदी पार्टी कार्यालय में दोपहर चार बजे आने वाले थे, लेकिन वे देर शाम आए, इसका कारण यही था। दिल्ली के सत्ता के गलियारों में रहने वाले मेरे एक मित्र ने यह रोमांचक और बेहद नाटकीय घटनाक्रम, जो एक आम आदमी की समझ से परे है, मुझे 5 जून को ही बताया था।

मोदी ने दोपहर में नायडू और नीतीश को फोन किया था ताकि उन्हें यह बता सकें कि आप अपना देख लो, हमें कोई आपत्ति नहीं है। मोदी के इस फैसले को सुनकर दोनों हक्के-बक्के रह गए। दोनों ही ठंडे पड़ गए क्योंकि उन्हें इंडी दलों की स्थिति का पता था। मोदी के इस निर्णय की खबर इंडी दलों को भी पहुंचाई गई। खडगे, जयराम रमेश को तो झटका ही लगा क्योंकि वे मानसिक रूप से इस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे। फिर भी उन्होंने यह खबर बाहर न आने देते हुए केवल शरद पवार को नीतीश और नायडू से बात करने के लिए कहा। उनकी विनती पर पवार ने नीतीश को फोन किया।

नीतीश ने शरद पवार से पूछा कि आपको कैसे पता चला कि मोदी विपक्ष में बैठने को तैयार हो गए हैं? शरद पवार ने नीतीश से कहा कि मुझे यह नहीं पता है। मुझे केवल आपके संपर्क में रहने के लिए कहा गया है। तब नीतीश जी ने शरद पवार को सब कुछ बताया, और यह भी पूछा कि सभी के खाते में 8500 रुपये देने होंगे और संपत्ति का वितरण पिछड़े वर्ग के लोगों को करना होगा, यह दो बड़े वादे कांग्रेस ने लोगों से किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री कौन होगा? यह सुनकर पवार को समझ आया कि उन्हें अंधेरे में रखा गया है। उन्होंने सबसे पहले अखिलेश यादव को फोन किया और बताया कि भाई, ऐसा हुआ है और कांग्रेस हमें अंधेरे में रखकर कुछ साजिश कर रही है।

 इतने पर पवार ने खडगे को फोन करके नाराजगी जताई कि आपने मुझे क्यों नहीं बताया कि भाजपा विपक्ष में बैठने को तैयार है? खडगे ने पवार से कहा कि यह खबर उड़ते-उड़ते आई थी इसलिए नहीं बताया। पवार ने कहा कि पहले प्रधानमंत्री तय करें और फिर आगे बढ़ें। इसी बीच अखिलेश यादव ने भी खडगे को फोन करके कहा कि मुझसे पूछे बिना कुछ नहीं करना, नहीं तो मैं अकेला अलग बैठ जाऊंगा। यह खबर इंडी गठबंधन में फैल गई, जबकि नतीजे आ ही रहे थे, लेकिन हर जगह हड़कंप मच गया।

इंडी दलों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रति व्यक्ति 8500 रुपये/माह और अमीर लोगों के पैसे लेकर उनका वितरण पिछड़े वर्ग में कैसे किया जाए, क्योंकि कांग्रेस ने जल्द से जल्द पैसे देने का वादा किया था। पर्दे के पीछे जबरदस्त उठा-पटक चल रही थी। इंडी दलों को तो छोड़ें, नायडू और नीतीश कुमार को भी उम्मीद नहीं थी कि मोदी और शाह ऐसा फैसला लेंगे। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू ने भाजपा के बड़े नेताओं से फोन पर संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया कि हम भाजपा के साथ ही रहना चाहते हैं, मोदी को तुरंत सरकार बनानी चाहिए।

भाजपा की 240 सीटें और पासवान, शिंदे सहित अन्य छोटे सहयोगियों को मिलाकर संख्या 264 हो जाती थी। इतना मजबूत विपक्ष होते हुए हम इंडी गठबंधन के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मोदी और शाह विपक्ष में बैठकर कोई भजन नहीं करने वाले थे, यह निश्चित था। इधर मोदी और शाह को जयंत चौधरी के माध्यम से इंडी गठबंधन के भीतर के गड़बड़ी का पता चल गया था। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में भाजपा ने मुस्लिम वर्ग में यह अफवाह फैला दी कि कांग्रेस का सरकार बन गई है और बैंक में सभी को 8500 रुपये मिलेंगे। इस वजह से बंगलोर और लखनऊ में बैंकों में मुस्लिम महिलाओं की लंबी कतारें लग गई थीं।

इंडी गठबंधन के नेताओं के बीच सवाल खड़ा हो गया कि अगर हम सरकार बनाते हैं, तो हमें वादे के अनुसार तुरंत 100000 रुपये प्रति वर्ष देने होंगे, भले ही हम समान संपत्ति के वितरण को कुछ समय बाद करने का वादा कर सकते हैं, लेकिन यह 8500 रुपये/प्रति माह कैसे देंगे? इस तरह प्रधानमंत्री बनना मतलब सूली पर चढ़ने जैसा होगा। महिलाओं की आधी जनसंख्या को ही मानें तो प्रति महिला एक लाख रुपये के हिसाब से साठ लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष होते हैं। और इधर तो लोग बैंकों में भी आना शुरू कर चुके हैं। भाजपा ने हवा फैला दी कि बैंक जाओ और पैसे ले लो।

इस पर यह समाधान निकला कि फिर ऐसा करें कि नीतीश और नायडू हमें, मतलब इंडी दलों को समर्थन दें, कांग्रेस भी बाहरी समर्थन दिखाएगी और सरकार में शामिल नहीं होगी। मतलब ये पैसे देने और संपत्ति के समान वितरण करने का सवाल ही नहीं उठेगा। कांग्रेस बता सकेगी कि हमारी सरकार नहीं है, हमारी बात नहीं मानी जाती, इसलिए हम सरकार में शामिल नहीं हुए। इससे कांग्रेस फिर से अपनी जनता के बीच अच्छी छवि बनाए रख सकेगी। कांग्रेस एक बार फिर चित भी मेरी पट भी मेरी का खेल खेल रही थी।

इस पर नीतीश और नायडू ने साफ कहा कि कांग्रेस का बाहरी समर्थन देने का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। उन्होंने ऐसे ही चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल को बाहरी समर्थन दिया था और फिर अचानक वापस ले लिया था और इन सभी की सरकारें कुछ ही दिनों में गिर गई थीं। हम आपके साथ नहीं आएंगे, और वहां इतनी मजबूत विपक्ष होने पर मोदीजी शांत नहीं बैठेंगे। इतना ही नहीं, बिहार में भाजपा समर्थन वापस लेगी, यह अलग बात है और बिहार में तेजस्वी का मुख्यमंत्री पद का दावा पहले से ही था, जिससे नीतीश कुमार के सामने इधर कुआं उधर खाई जैसी स्थिति थी। सोचिए, नतीजे आने के दौरान कितनी तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम पर्दे के पीछे चल रहा था। इसी वजह से नीतीश कुमार और नायडू ठंडे पड़ गए और उन्होंने मोदी और शाह से सरकार बनाने का अनुरोध किया और समर्थन देने का आश्वासन दिया।

गुज्जुभाई मन ही मन हंस रहे थे। उन्होंने यह सब जानबूझकर नाटक किया था। उन्हें एक तरफ इंडी दलों और सभी हितधारकों को दिखाना था कि 8500 रुपये प्रति माह और संपत्ति का समान वितरण का उनका वादा कितना फर्जी है। साथ ही, यह दिखाना था कि यह आने वाले इंडी गठबंधन सरकार के लिए कैसे गले की फांस है। उसी समय, एनडीए के दो प्रमुख घटक दल नीतीश और नायडू की बार्गेनिंग पॉवर कम करनी थी, इसलिए गुज्जुभाई ने हाथ ऊपर उठाकर देने का नाटक किया।

नीतीश और नायडू का दिमाग दो घंटे में ठिकाने पर लाना पहला काम था, जो सफल रहा। फिर अमित शाह ने दूसरा बम फेंका कि सीसीएस यानी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी पूरी तरह भाजपा की होगी, मतलब गृह, वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालय हमारे पास रहेंगे। मरता क्या न करता, दोनों ने तुरंत सहमति दी। उसके बाद रात साढ़े सात बजे नरेंद्र मोदी भाजपा कार्यालय पहुंचे और उन्होंने सरकार बनाने का ऐलान किया। मोदी का भाषण कितना आत्मविश्वास से भरा था, यह आप याद करें।

इस तरह तेज राजनीतिक घटनाक्रम पर्दे के पीछे चल रहा था, जिसकी वजह से नीतीश कुमार बार-बार एनडीए की बैठक में कहते रहे कि सरकार जल्दी बनाओ और 9 जून की बजाय 8 जून को शपथ लो और हमारा टेंशन दूर करो। इधर 5 जून और 6 जून को भी लखनऊ और बंगलोर में लोग बैंकों और कांग्रेस कार्यालयों में पैसे लेने आते रहे। भाजपा ने हवा फैला दी थी कि जाओ पैसे मिल रहे हैं। इसीलिए शाम को इंडी गठबंधन की बैठक में यह निर्णय हुआ कि हम कोई फोड़-फोड़ न करें, नहीं तो हमें लोकक्षोभ का सामना करना पड़ेगा और बदनामी होगी और फिर जनता हम पर विश्वास नहीं करेगी। राहुल गांधी की जल्दी से 8500 रुपये वाली घोषणा ऐसी विपत्ति बन गई।

इसलिए खडगे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हम सही समय आने पर भाजपा सरकार को हराएंगे और हम कोई सरकार नहीं बनाएंगे।इसे चाणक्य नीति कहते हैं, एक पत्थर से दो पक्षी मारना। एनडीए में नीतीश और नायडू, इन दोनों पक्षों को गुज्जुभाई ने ठिकाने लगाया। आज 10 जून को घोषित मंत्रिमंडल के बंटवारे से पूरी स्थिति पर मोदी और शाह का नियंत्रण साबित होता है। यह अटल और आडवाणी की भाजपा नहीं है, यह ध्यान में रखते हुए हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।इसे ऑफेंसिव डिफेंस कहते हैं।मोदी पूरी ताकत के साथ एक्शन में हैं। 

G.NEWS 24 : पहला जल-विहीन शहर घोषित हुआ केपटाउन !

नियति ने आखिरकार ट्रिगर दबा दिया...

पहला जल-विहीन शहर घोषित हुआ केपटाउन !

दक्षिण अफ्रीका की राजधानी शहर केपटाउन को दुनिया का पहला जल-विहीन शहर घोषित किया गया है, क्योंकि इसकी सरकार ने 14 अप्रैल, 2024 के बाद पानी की आपूर्ति करने में असमर्थता दिखाई है। वहां नहाने पर रोक लगा दी गयी है, 10 लाख लोगों के कनेक्शन काटने की तैयारी चल रही है। जिस तरह भारत में पेट्रोल पंप जाकर पेट्रोल खरीदा जाता है, वैसे ही वहां केपटाउन में जगह जगह पानी के टैंकर होंगे वहां 25 लीटर पानी मिलेगा। 

ज्यादा पानी मांगने या पानी लूटने वालों के इलाज के लिए पुलिस व सेना के लोग तैनात किए गए हैं। अंत में दुनिया की दुखद यात्रा का यह समय किसी के भी पास आएगा, इसलिए पानी का संयम से उपयोग करें। पानी बर्बाद करना बंद करो। हमने रेल द्वारा लातूर (महाराष्ट्र) को पानी भेजते हुए भी देखा है। विश्व का केवल 2.7% जल ही पीने योग्य है। जैसे-जैसे आसपास के सभी बांधों में पानी का स्तर कम हुआ है, भूमिगत जल स्तर गहरा होता गया है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम पानी की बर्बादी को रोककर पानी की बचत करेंगे। 

आप इसे आसानी से कर सकते हैं-

  • कार/ बाइक को रोज न धोएं।
  • आंगन/सीढ़ी/फर्श को धुलना अवॉयड करें या धोने में पानी कम से कम प्रयोग करें।
  • नल को लगातार चालू न रखें।
  • घर में टपकते नल को ठीक करें।
  • पेड़ के गमले में कम से कम पानी डालें।
  • रोड पर पानी न छिड़कें। 
  • छत पर पानी की टंकी को भर जाने के बाद मोटर को समय से बंद कर दे, कियोकि इसमें पानी की अनावश्यक बर्बादी होती  है। 
  • रोज की दिनचर्या मे पानी की अनावश्यक खर्च को कम करे। 
  • बरसात के मौसम मे प्रत्येक व्यक्ति कम से कम 5-10 पेड़ जरूर लगाये।

हम सभी को मिलकर इस संकट का सामना करना चाहिए इससे जादू जैसा तो कुछ नहीं होगा, लेकिन महत्वपूर्ण समाचार फैलाने का संतोष जरूर मिलेगा और आने वाले सूखे में पानी बचाने का पुण्य पूरा होगा, चार प्यासों की प्यास बुझेगी तथा अगली पीढ़ी को भी पानी मिल सकेगा।

G News 24 : जिन उम्मीदवारों से असहमत था आरएसएस उन्ही को BJP ने दिया टिकिट !

 संघ से दूरी भाजपा को पड़ी भारी, किसी फैसले में नहीं ली आरएसएस से सलाह ...

जिन उम्मीदवारों से असहमत था आरएसएस उन्ही को BJP ने दिया टिकिट !

लखनऊ। लोकसभा चुनाव में करीब आधी सीटों तक सिमटने वाली भाजपा की हार के भले ही कई कारण गिनाए जा रहे हों, पर संघ से दूरी भी एक बड़ी वजह है। संभवतः यह पहला चुनाव है जिसमें भाजपा ने प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति तैयार करने तक में भी संघ से परामर्श नहीं लिया।उत्तर प्रदेश में भाजपा को संघ से दूरी भारी पड़ गई। जिलों में न तो संघ और भाजपा की समन्वय समितियां दिखीं और न ही डैमेज कंट्रोल के लिए बैठकें हुईं। भाजपा ने प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति तैयार करने तक में भी संघ से परामर्श नहीं लिया। लिहाजा संघ ने भी खुद को अपने वैचारिक कार्यक्रमों तक ही समेटे रखा।

इसका भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा। यह पहला चुनाव था जिसमें चुनावी प्रबंधन में संघ परिवार और भाजपा में दूरी दिखी। भाजपा ने किसी भी फैसले में उससे परामर्श करने तक की भी जरूरत नहीं समझी। ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मौन साध रखा था। आमतौर पर चुनाव में जमीनी प्रबंधन में सहयोग करने वाले संघ के स्वयंसेवक इस चुनाव में शायद ही कहीं दिखे हों। 

जिलों में न तो संघ और भाजपा की समन्वय समितियां दिखीं और न ही डैमेज कंट्रोल के लिए छोटे-छोटे स्तर पर अमूमन होने वाली संघ परिवार की बैठकें होती नजर आईं। कम मतदान पर लोगों को घर से निकालने वाले समूह भी इस चुनाव में कहीं नहीं दिखे। 

अब सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो संघ ने चुनाव से किनारा कर लिया। संघ से जुड़े कुछ वर्तमान, पूर्व पदाधिकारियों व प्रचारकों के अनुसार इसकी मुख्य वजह भाजपा के एकांगी निर्णय और संघ परिवार के संगठनों के साथ संवादहीनता रही।

माना जाता है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के बयान "भाजपा अब पहले की तुलना में काफी मजबूत हो गई है। इसलिए उसे अब संघ के समर्थन की जरूरत नहीं है" ने भी स्वयंसेवकों उदासीन कर दिया। संघ के एक पूर्व वरिष्ठ पदाधिकारी बताते हैं कि संघ अचानक तटस्थ होकर नहीं बैठा था। 

 संघ से जुड़े सूत्रों के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में मिले परिणामों के बाद आत्ममुग्धता से लबरेज भाजपा ने अपने सियासी फैसलों में संघ परिवार को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था। 

 भाजपा ने जब संघ परिवार की सलाह की अनदेखी कर एक के बाद एक कई ऐसे फैसले कर डाले, जिनसे संगठन की साख और सरोकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ना लाजिमी था, इसलिए संघ ने भी अपनी भूमिका समेट ली। अयोध्या में श्रीरामलला के प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर भी कुछ मतभेद उभरे।

कई उम्मीदवारों से असहमत था संघ

बताया जाता है कि संघ ने कौशांबी, सीतापुर, रायबरेली, कानपुर, बस्ती, अंबेडकरनगर, जौनपुर, प्रतापगढ़ सहित प्रदेश की लगभग 25 सीटों के उम्मीदवारों पर असहमति जताई थी। साथ ही बड़े पैमाने पर दूसरे दलों के लोगों को भाजपा में शामिल करने पर भी नाराजगी वयक्त की थी। 

जानकारी के मुताबिक, संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी से कहा था कि दूसरे दलों के दागी और अलोकप्रिय चेहरों को शामिल करना उचित नहीं है। इससे गुटबाजी बढ़ रही है। साथ ही संगठन की साख पर भी सवाल उठ रहा है। पर, उसकी सलाह नहीं मानी गई। लिहाजा संघ उदासीन हो गया। 

 भाजपा का चुनाव प्रबंधन तो पहले से ही कागजों पर था। संघ भी उदासीन हुआ तो ज्यादातर स्थानों पर न तो भाजपा के वोटरों को निकालने वाले दिखे और न उन्हें समझाने वाले। लिहाजा ज्यादातर मतदान केंद्रों पर 2014, 2019, 2017 और 2022 वाला प्रबंधन नहीं दिखा।

संघ की संवाद बैठक का नहीं ले पाए लाभ

चुनाव की घोषणा के एक साल पहले ही संघ परिवार ने अपने वैचारिक कार्यक्रम के तहत जनता से संवाद शुरू कर दिया था। घोषणा होने तक हर लोकसभा क्षेत्रों में एक-एक लाख बैठकें हो चुकी थीं।

इसके तहत संघ के जमीनी कार्यकर्ता 10-20 परिवारों के साथ बैठकें करके मतदाताओं को मतदान के लिए जागरूक करने, सांस्कृतिक और राष्ट्रवाद के एजेंडे पर हुए कार्यों की चर्चा कर माहौल बनाया था, लेकिन भाजपा संघ के इस कवायद का भी फायदा नहीं उठा पाई।

 क्षेत्रीय व जिलाध्यक्षों की नियुक्ति से भी थी नाराजगी

संघ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि चुनाव से पहले प्रदेश भाजपा ने कई क्षेत्रीय अध्यक्षों के साथ ही जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की। इसमें भी संघ परिवार के फीडबैक की अनदेखी की गई।

खासतौर से गोरक्ष प्रांत और काशी के क्षेत्रीय अध्यक्ष और कुछ पदाधिकारियों की नियुक्ति को लेकर संघ ने नाराजगी व्यक्त की थी। वाराणसी समेत कई लोकसभा क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत में भारी कमी आने के पीछे पदाधिकारियों की मनमानी नियुक्ति को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है।

जमीन पर संगठन को सक्रिय नहीं कर सकी पार्टी

संघ से दूरी बनाने का दुष्परिणाम यह भी रहा कि जमीनी स्तर पर काम करने वाला भाजपा का संगठन भी पूरी तरह से सक्रिय नहीं रहा। माना जा रहा है कि संघ से बेहतर समन्वय नहीं बनने की वजह से भाजपा की अधिकांश बूथ कमेटियां व पन्ना प्रमुख भी निष्क्रिय बैठे रहे।

वहीं संघ के स्थानीय कार्यकर्ता निरंतर जनता के बीच काम करते हैं और संगठन से जनता को जोड़ने में उनकी प्रमुख भूमिका होती है। समन्वय नहीं होने की वजह से दोनों तरफ के कार्यकर्ता उदासीन रहे। नतीजा यह हुआ कि तमाम घरों पर परिवारों तक पर्चियां तक नहीं पहुंच पाई।

बाहरी चुनाव प्रभारी का प्रयोग भी रहा विफल

इस बार के चुनाव भाजपा ने हर लोकसभा क्षेत्र के लिए प्रभारी नियुक्त किया था, जो कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए। इसकी वजह यह बताई जा रही है कि ज्यादातर लोकसभा क्षेत्रों में बाहरी नेताओं को प्रभारी बनाया गया था, जिन्हें न तो संबंधित लोकसभा क्षेत्र की भौगोलिक जानकारी थी और न ही जातीय समीकरण व मुद्दों की।

मतदाताओं के बीच भी बाहरी प्रभारियों की कोई पकड़ नहीं थी। लिहाजा तमाम प्रभारियों ने जमीन पर काम करने के बजाय सिर्फ क्षेत्रों में होने वाले बड़े नेताओं के सभाओं में चेहरा दिखाने तक ही खुद को सीमित रखा।

G News 24 : जनता ने रवनीत सिंह बिट्टू को नकारा,लेकिन फिर भी नेतृत्व ने मंत्री बनाया !

 रवनीत सिंह बिट्टू 10 साल कांग्रेस रहे,इसी साल बीजेपी शामिल हुए ...

जनता ने रवनीत सिंह बिट्टू को नकारा,लेकिन फिर भी नेतृत्व ने मंत्री बनाया ! 

2024 के इस लोकसभा चुनाव में बड़े-बड़े नेता चुनाव हार गए. औरों को तो छोड़िए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही 20 मंत्री चुनाव हार गए. इन हारे हुए लोगों को पीएम मोदी ने भी अपने मंत्रिमंडल में जगह न देकर किनारे लगा दिया, लेकिन एक नेता ऐसा भी है, जो लोकसभा चुनाव में हारने के बावजूद पीएम मोदी की तीसरी सरकार में मंत्री बन गया है. नाम है रवनीत सिंह बिट्टू. तो आखिर इस हारे हुए शख्स में ऐसा क्या है कि पीएम मोदी समेत पूरी बीजेपी को इस नेता पर इतना भरोसा है और आखिर क्यों रवनीत सिंह बिट्टू का केंद्र में मंत्री बनना बीजेपी के भविष्य के लिए बेहद अहम है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो तीसरा मंत्रिमंडल है, उसमें हारने वाले तो किनारे लगाए ही गए हैं, जीतने वालों में भी कई कद्दावर लोगों को जगह नहीं दी गई है. उदाहरण के तौर पर स्मृति ईरानी, आरके सिंह, संजीव बालियान, अर्जुन मुंडा और अजय मिश्रा टेनी समेत 15 से ज्यादा मंत्री चुनाव हारकर तीसरी सरकार में मंत्री बनने की रेस से बाहर हो गए हैं. तो वहीं जीतने के बावजूद दूसरी मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके अनुराग ठाकुर जैसे कद्दावर नेता भी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हैं. हालांकि, पंजाब की लुधियाना सीट से करीब 20 हजार वोटों से चुनाव हारने के बाद भी रवनीत सिंह बिट्टू को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिल गई है.

रवनीत सिंह बुट्टू के दादा की हत्या खालिस्तानियों ने बम धमाके में कर दी थी

इसकी वजह है रवनीत सिंह बिट्टू की पंजाब की राजनीति में बनी हुई छवि, जिससे न तो कांग्रेस इनकार कर सकती है और न ही बीजेपी. रवनीत सिंह बिट्टू पंजाब के एक बड़े सियासी घराने से ताल्लुक रखते हैं. उनके दादा बेअंत सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री रहे हैं, जिनकी हत्या खालिस्तानियों ने बम धमाके में कर दी थी. 24 मार्च 2024 से पहले तक खुद रवनीत सिंह बिट्टू खांटी कांग्रेसी हुआ करते थे.

तीन-तीन बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके थे. वो भी दो अलग-अलग सीटों से. 2009 में रवनीत बिट्टू ने आनंदपुर साहिब से जीत दर्ज की थी तो 2014 और 2019 में वो लुधियाना से सांसद बने थे. मार्च 2021 में कुछ दिनों के लिए वो लोकसभा में कांग्रेस के नेता सदन भी बनाए गए थे. 

रवनीत सिंह के लिए प्रचार करने खुद पहुंचे थे अमित शाह

24 मार्च, 2024 को लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले रवनीत बिट्टू कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी ने भी उन्हें हाथों हाथ लिया और लुधियाना से लोकसभा चुनाव का उम्मीदवार बना दिया. चुनाव प्रचार में खुद गृहमंत्री अमित शाह पहुंचे और कहा, 'मैं जल्दी बिट्टू को बड़ा आदमी बनाऊंग.'

कांग्रेस उम्मीदवार से हारे रवनीत सिंह

अमित शाह के इस बयान के यही मायने निकाले गए कि अगर रवनीत सिंह बिट्टू लुधियाना से चुनाव जीत जाते हैं तो मोदी सरकार में उनका मंत्री बनना तय है. बिट्टू कांग्रेस के उम्मीदवार अमरिंदर सिंह राजा वडिंग से करीब 20 हजार वोट से चुनाव हार गए. पंजाब के लोगों को लगा कि अब रवनीत सिंह बिट्टू को इंतेजार करना होगा, लेकिन जैसे ही 9 जून की शपथ की तारीख तय हुई, ये भी तय हो गया कि रवनीत सिंह बिट्टू केंद्र में मंत्री बन रहे हैं. खुद रवनीत बिट्टू ने भी शपथ से पहले मीडिया से बातचीत करके प्रधानमंत्री मोदी से हुई बात का जिक्र किया.

पंजाब की राजनीति में बिट्टू के दखल को बढ़ाना,खालिस्तान के खात्मे की ओर उठाया गया एक कदम !

रवनीत बिट्टू की इस बात से इतना तो तय है कि अब पंजाब में बीजेपी का सबसे बड़ा कोई चेहरा बन रहा है, वो हैं रवनीत सिंह बिट्टू. बीजेपी अपने सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल से हाथ छुड़ा चुकी है और जिस तरह के नतीजे लोकसभा चुनाव में आए हैं, उसने साफ कर दिया है कि अब बीजेपी पंजाब में अकेले दम पर ही राजनीति करेगी.

इसके लिए उसे जिस फायरब्रांड नेता की जरूरत है, वो रवनीत सिंह बिट्टू ही हैं. इसके अलावा पंजाब में इस बार लोकसभा चुनाव के जो नतीजे आएं हैं और उनमें जिन दो निर्दलीय सांसदों ने जीत दर्ज की है, उसने बीजेपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को भी सचेत कर दिया है.

दो निर्दलीयों की जीत बढ़ाई टेंशन

खडूर साहिब सीट से जो नए सांसद बने हैं वो हैं अमृतपाल सिंह संधू, जिन्हें पंजाब का दूसरा भिंडरेवाला कहा जा रहा है. पूरी तरह से खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह तो चुनाव जीतकर सांसद बने ही बने हैं, इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह के बेटे सरबजीत सिंह खालसा भी फरीदकोट से सांसद बन गए हैं. इन दोनों की जीत को पंजाब में खालिस्तान के प्रति बढ़ती हमदर्दी के तौर पर देखा जा रहा है. इस हमदर्दी के खात्मे के लिए भी एक ऐसे नेता की जरूरत है, जो खालिस्तान के खिलाफ सख्त हो.

रवनीत सिंह बिट्टू के परिवार का इतिहास इस बात की गवाही देता है क्योंकि रवनीत सिंह बिट्टू के दादा बेअंत सिंह पंजाब के वो मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने पंजाब में चरमपंथियों का खात्मा करने में कोई कोताही नहीं की और इसी की वजह से उनकी हत्या भी हुई. ऐसे में उनके ही पोते रवनीत सिंह बिट्टू का केंद्र में मंत्री बनना और पंजाब की राजनीति में रवनीत सिंह बिट्टू के दखल को बढ़ाना उस खालिस्तान के खात्मे की ओर उठाया गया एक कदम दिख रहा है, जिसने हाल के दिनों में देश ही नहीं पूरी दुनिया के लिए नई चुनौतियां पेश की हैं.

G News 24 : वोटर्स ने भव्य-दिव्य राम मंदिर मंदिर बनाने बालों को अयोध्या से ही दिया वनवास !

  'जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे'...नहीं चला BJP का नारा...

वोटर्स  ने भव्य-दिव्य राम मंदिर मंदिर बनाने बालों को अयोध्या से ही दिया वनवास !

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के लिए चौंकाने वाले हैं. भारतीय जनता पार्टी जिस राम मंदिर को चुनावी मुद्दा बनाया था, वह फेल हो गया. यह कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को श्रीराम का आशीर्वाद नहीं मिला. चुनाव से पहले चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी, सीएम योगी समेत भाजपा के वरिष्ठ नेता हर रैलियों में राम मंदिर का जरूर जिक्र करते हुए विपक्ष पर निशाना साधते थे. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता तो यह भी नहीं कहने से चूकते थे कि मोदी सरकार की वजह से राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और रामलला 50 साल बाद अपने मंदिर में विराजमान हुए. लेकिन लोकसभा चुनाव में मतदाताओं को शायद यह बात हजम नहीं हुई. इसलिए तो फैजाबाद लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार लल्लू सिंह 50 हजार वोट से हार गए. लल्लू सिंह को समाजवादी पार्टी से उम्मीदवार पूर्व मंत्री अवधेश प्रसाद को हराया है.

अयोध्या मंडल की सभी सीटों पर भाजपा को मिली शिकस्त

यहीं नहीं अयोध्या मंडल की अमेठी, अम्बेडकरनगर, बाराबंकी, सुल्तानपुर में भाजपा को रामलला का आशीर्वाद नहीं मिला है. अमेठी से वर्तमान सांसद और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को कांग्रेस प्रत्याशी किशोरी लाल शर्मा ने हराया दिया है. इसी तरह अंबेडकरनगर बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए रितेश पांडे को सपा प्रत्याशी लालजी वर्मा ने हरा दिया है. बाराबंकी से कांग्रेस प्रत्याशी तनुज पुनिया ने भाजपा की राजरानी रावत को 2 लाख वोटों से हरा दिया है. जबकि 2019 में अंबेडकरनगर को छोड़कर सभी सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी. वहीं, अवध की 17 में से 15 सीटें भाजपा हार गई है. जिनमें धौरहरा, सीतापुर, इटावा (अजा), कन्नौज, कानपुर, अकबरपुर, बहराइच, मोहनलालगंज, लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, फैजाबाद, कैसरगंज, गोंडा, बाराबंकी, फतेहपुर, सुलतानपुर, प्रतापगढ़, फूलपुर, इलाहाबाद, अंबेडकर नगर लोकसभा सीटों पर चौथे और पांचवें चरण में चुनाव हुए हैं.

सेंट्रल यूपी की 24 सीटों में से 15 पर हारी भाजपा

जबकि, 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मध्य यूपी की 29 में से 22 सीटें जीती थीं। लेकिन, इस बार इस क्षेत्र में 13 सीटों का नुकसान हुआ है और भाजपा 9 सीटों पर ही सिमट गई. जबकि कांग्रेस को 3 और सपा को 11 सीटों का फायदा हुआ है। इस तरह इंडी गठबंधन को मध्य उत्तर प्रदेश में 15 सीटें जीतने में कामयाब रहीं. इसमें से तो मोहनलाल गंज, लखीमपुर खीरी, अमेठी से तो केंद्र सरकार में मंत्री भी अपनी सीट नहीं बचा पाए.

पीएम मोदी की ताबड़तोड़ जनसभाएं भी नहीं आईं काम

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक रैली और रोड शो किए थे. पीएम मोदी ने यूपी में 29 रैलियां और रोड शो किए थे. पीएम मोदी चुनावी भाषण में राम मंदिर निर्माण और रामलला की स्थापना का जिक्र जरूर रहता था. पीएम मोदी मंच से कहते थे कि भाजपा सरकार में ही राम मंदिर का सपना साकार हुआ है. 500 साल के बाद मंदिर बनकर तैयार हुआ और रामलला टेंट से अपने मूल स्थान में विराजमान हुए. इसके साथ ही विपक्ष को भगवान राम का अपमान करने वाला बताते थे. पीएम मोदी के साथ सीएम योगी भी अपने भाषणों में कहते थे कि विपक्ष ने राम मंदिर का निमंत्रण ठुकरा कर अपमान किया है. इसके साथ ही सपा सरकार पर राम भक्तों पर गोलियां चलवाने का जिक्र करते थे. लेकिन ये बातें शायद अवध क्षेत्रों को पसंद नहीं आईं, इसलिए सपा और कांग्रेस को अपना आशीर्वाद दे दिया.

G News 24 : जब नेता अपना स्व: हित देखता तब उसकी पार्टी व देश के प्रति 'निष्ठा' बदल जाती है !

दल-बदलू नेता के लिए पार्टी  के प्रति निष्ठा ,विचारधारा,देश हित जैसी बातों के कोई मायने नहीं रहते है !

जब नेता अपना स्व: हित देखता तब उसकी पार्टी व देश के प्रति 'निष्ठा' बदल जाती है !

लोकसभा चुनाव 2024 की तस्वीर साफ हो चुकी है. किसी भी पार्टी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला है. बीजेपी भी 239 सीटों पर सिमट गई है. हालांकि एनडीए के पास बहुमत से कहीं ज्यादा 293 का आंकड़ा है, जो 5 साल सरकार चलाने के लिए काफी है. बहुमत का आंकड़ा भले ही एनडीए के पास हो.लेकिन इधर इंडिया गठबंधन  भी 232 सीटें जीत चुका है. और उसने भी एनडीए की सहयोगी पार्टियों से संपर्क साधना शुरू कर दिया गया है. जानकारी के मुताबिक, नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन ने डिप्टी पीएम पद ऑफर किया है. ऐसे में नेताओं की निष्ठा बदलने की बातें उठने लगी हैं. 

बुधवार को एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों की होनी है बैठक 

खुद शरद पवार ने मंगलवार को कहा कि उन्होंने किसी भी एनडीए के नेता को फोन नहीं मिलाया है. उन्होंने कहा, मैंने सिर्फ सीताराम येचुरी और  मल्लिकार्जुन खड़गे से बात की है. पवार भले ही कुछ भी कहें लेकिन इंडिया गठबंधन इस फिराक में जरूर होगा कि वह मैजिक नंबर हासिल कर ले. ताकि उसकी सरकार बन जाए. लेकिन यह तो तभी मुमकिन है जब टीडीपी या जेडीयू के चुने हुए सांसद एनडीए छोड़कर उसका हाथ थाम लें. लेकिन उसमें एक पेच है.

एनडीए में कौन कितनी सीटें जीता

एनडीए में बीजेपी के बाद सबसे ज्यादा 16 सीटें आंध्र प्रदेश की तेलुगू देशम पार्टी को मिली हैं. इसके बाद नीतीश कुमार की जेडीयू के 12 नेता जीते हैं. वहीं शिवसेना से 6, एलजेपीआरबी को 5 सीटें मिली हैं. अन्य छोटे दलों को भी 1-1 सीट मिली है. अगर टीडीपी या जेडीयू के सांसद एनडीए का साथ छोड़कर जाते हैं तो दल बदल कानून लागू होगा. उस स्थिति में क्या होगा, चलिए समझते हैं.

भारत में  दल-बदल का पुराना इतिहास  है 

भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आपको दल-बदल के कितने ही उदाहरण मिल जाएंगे. इस कारण से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बन जाता है. उस वक्त सरकारें प्रशासन पर ध्यान देने की बजाय नेताओं को जाने से रोकने पर ध्यान देती हैं. इसी कारण से 'आया राम गया राम' का नारा भारतीय राजनीति में काफी फेमस हुआ था.

अकसर आपने देखा होगा कि चुनाव जीतने के बाद कई पार्टी विधायक पाला बदलकर दूसरी पार्टी का हाथ थाम लेते हैं, जिससे पुरानी सरकार गिर जाती है. उस वक्त ना तो पार्टी की विचारधारा मायने रखती है ना ही निष्ठा. तब नेता सिर्फ अपना भविष्य देखते हैं. इसी को दल-बदल कहा जाता है.

क्या कहता है दल-बदल कानून !

साल 1985 में संविधान में 52वां संशोधन किया गया और देश में दल-बदल कानून लागू हो गया. इसके तहत विभिन्न कारणों के तहत जनता के चुने जनप्रतिनिधि को अयोग्य ठहराया जा सकता है. यानी अगर कोई चुना हुआ सदस्य अपनी मर्जी से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है, या फिर किसी अन्य दल में शामिल हो जाता है. अगर सदन में कोई सदस्य पार्टी के पक्ष के खिलाफ जाकर वोट देता है. अगर कोई निर्वाचित निर्दलीय किसी पॉलिटिकल पार्टी को जॉइन कर लेता है. या खुद को वोटिंग से अलग रखता है. तब यह कानून लागू होता है. 

ऐसे में कानून के तहत, सदन के अध्यक्ष के पास यह अधिकार होता है कि वह इन सदस्यों को अयोग्य ठहरा सकता है. कोई भी दल अध्यक्ष के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है.लेकिन इस कानून में यह भी प्रावधान है कि अगर कोई राजनीतिक दल ने दूसरे दल में विलय किया हो तब अयोग्य नहीं माना जाएगा. इसके लिए दोनों उस राजनीतिक पार्टी के दो-तिहाई विधायकों की विलय पर सहमति जरूरी होनी चाहिए. 

G.NEWS 24 : ये भारत है, यहाँ ऐसा ही होता है !

हत्यारे की गोद में जाकर बैठना कौनसी नाराजगी है...

ये भारत है, यहाँ ऐसा ही होता है !

अयोध्या की सीट हारने के बाद एक बात तो समझ आ गयी है कि यहां विकास के नाम पर वोट नहीं मिलता है क्योंकि दस साल में सर्वाधिक विकास इसी स्थान पर हुआ है। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, इकोनॉमी, बिजनिस, इंफ्रास्ट्रक्चर, रोड्स से लेकर विकास के तमाम पैमाने इस शहर में आसमान से उतर आए थे। मैं विकास में राममंदिर निर्माण को तो गिन ही नहीं रही हूँ। फिर भी विकास से वोट नहीं मिला। 

हिन्दुत्व के नाम पर भी वोट नहीं मिलता, क्योंकि जिस शहर में धर्म की 500 वर्ष बाद जय हो और राष्ट्र का भव्यतम मंदिर बने, उसके उपरांत भी वोट नहीं मिला। वह पार्टी यहाँ 50 हज़ार वोट से जीत रही है जो इसी शहर में रक्त की नदियां बहाने को कुख्यात रही है, जिसने राममंदिर प्राण प्रतिष्ठा को मजाक बनाया, वहाँ जाने से भी मना कर दिया। आज यहां की जनता ने ये सिद्ध कर दिया है कि वोट केवल जाति देख कर ही दिया जाता है। यह अयोध्या सीट का हासिल परिणाम है। 

  • जिस सरकार ने देश को चांद पर पहुंचाया
  • जिस सरकार ने पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा
  • जिस सरकार ने जम्मू कश्मीर से 370 जैसा कलंक मिटाया
  • जिस सरकार ने करोड़ों हिंदुओ की आस्था राम मंदिर बनवाया
  • जिस सरकार ने देश के हाइवे को वर्ल्ड क्लास बनाया
  • जिस सरकार ने देश के करोड़ों गरीब को मुफ्त राशन दिया
  • जिस सरकार ने करोड़ों महिलाओं को गैस कनेक्शन दिया
  • जिस सरकार ने करोड़ों परिवार को शौचालय दिया
  • जिस सरकार ने विश्व में भारत का नाम चमका दिया

आज उस पार्टी को नुकसान का सामना करना पड़ा। यदि कोई नाराजगी किसी से थी तो घर में सुलझाते, हत्यारे की गोद में जाकर बैठना कौनसी नाराजगी है। मथुरा और काशी मांगने जैसा यहाँ के लोगों ने किसी को छोड़ा नहीं है, इसके बीज लाखों वर्ष पुराने उत्तरकाण्ड में भी मिलते हैं। 

- दिव्या सिंह

G News 24 : दिल धड़कनें तेज कौन बनेगा सांसद और कौन बैठेगा घर !

 नजदीक आती नतीजे की घड़ी ...

दिल धड़कनें तेज कौन बनेगा सांसद और कौन बैठेगा घर !

ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र से क्या इसबार भी भाजपा विजय परचम लहराएगी या कांग्रेस कमल दल के इस अभेद गढ़ को ध्वस्त करने में कामयाब होगी ! नतीजे की घड़ी नजदीक आने से पहले इसको लेकर ग्वालियर में मतदाताओं के दिलों की धड़कन तेज हो गई है।

यहां मुकाबला इस कारण रोचक बन गया है क्यों कि दोनों ही दलों ने यहां से विधानसभा चुनाव के पिटे पिटाए मोहरों को मैदान में उतारा था इनमें कौन कौन बनेगा सांसद और कौन बैठेगा घर, इसने लोगों की उत्सुकता को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। उल्लेखनीय है कि ग्वालियर लोकसभा से भाजपा ने भारत सिंह कुशवाह को और कांग्रेस ने प्रवीण पाठक को प्रत्याशी बनाया था।

इसबार भी सीधा मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है हालांकि बहुजन समाज पार्टी का प्रत्याशी भी मैदान में है लेकिन वह मुकाबले से बाहर होने की वजह से उसकी चर्चा नहीं है। ¹इतना जरूर है कि यदि पार्टी आधार पर मतदाताओं ने वोटिंग की होगी तो बीएसपी सीधे सीधे कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाली है। इस दृष्टि से भाजपा के सामने कोई भी वोट कटुआ प्रत्याशी नहीं होने से उसे लाभ मिल सकता है।

पिछले  चुनावों की बात करें तो ग्वालियर लोकसभा सीट पर 2004 के बाद से लगातार भाजपा का कब्जा रहा है। चूंकि इस लोकसभा में कुशवाह वोटरों की तादाद तीन लाख से ऊपर है इस कारण भाजपा ने विधानसभा चुनाव हारने और पहले से ही कुशवाह समाज से मध्यप्रदेश सरकार में ग्वालियर से एक केबिनेट मिनिस्टर बनाए जाने के बावजूद कुशवाह समाज के ही भारत सिंह पर दांव लगाया है। इस रणनीति के पीछे मुख्य किरदार पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का माना जा रहा है क्यों कि भारत सिंह को उन्ही का खासमखास माना जाता है।

ग्वालियर सीट पर सबसे ज्यादा अनुसूचित जनजाति के मतदाता हैं। इस सीट पर अनुसूचित जाति के लिए चार लाख के करीब मतदाता हैं। दो लाख क्षत्रिय, दो लाख गुर्जर, दो लाख यादव, डेढ़ लाख अनुसूचित जनजाति, डेढ़ लाख करीब मुस्लिम और तीन लाख के करीब ब्राह्मण मतदाता हैं।  इसमें कांग्रेस  को उम्मीद है कि ब्राह्मण के साथ ही मुस्लिम, गुर्जर, आदिवासी जनजाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं  ने उनको वोट दिए हैं। वहीं, कुशवाह को मोदी फैक्टर, केंद्रीय योजनाओं पर भरोसा है।

दूसरी ओर कांग्रेस ने ग्वालियर से ब्राह्मण कार्ड खेला है उसे विश्वास है कि प्रवीण पाठक को वैश्य और छत्रीय समाज का भी समर्थन मिलने के साथ भाजपा की अंदरूनी खटपट का लाभ भी मिला है। चूंकि पाठक का शैक्षणिक स्तर अच्छा था अतः उन्हें पढ़े लिखे होने का फायदा भी मिला है ।

वहीं भारत सिंह कुशवाह के समर्थकों का मानना है कि मोदी फैक्टर और तमाम लोकप्रिय केंद्रीय योजनाओं के सामने कांग्रेस के सारे चुनावी दांव पेच फेल साबित हुए हैं मतदाताओं ने मोडी की गारंटी पर भरोसा जताया है। उल्लेखनीय है कि ग्वालियर लोकसभा सीट से यह माना जा रहा था कि पार्टी ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रत्याशी बनाएगी लेकिन उन्हें गुना से टिकिट दिए जाने से उनके तमाम समर्थक गुना पलायन कर गए जिसका कि भाजपा प्रत्याशी को नुकसान उठाना पड़ा। 

उधर सिंधिया के बाद टिकिट की दौड़ में शामिल जयभान सिंह पवैया,प्रभात झा, ,माया सिंह, विवेक शेजवलकर जैसे कई बड़े जनाधार वाले नेता टिकिट न दिए जाने से निराश हो गए जिसका कि नुकसान भाजपा प्रत्याशी को उठाना पड़ा इतना ही नहीं मजबूत कुशवाह नेता और प्रदेश सरकार के मंत्री नारायण सिंह कुशवाह शुरुआती दौर में उतने सक्रीय नहीं दिखे यदि इन बातों का असर वोटरों पर पड़ा होगा तो इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ सकता है।

ग्वालियर संसदीय सीट पर 2007 से भाजपा का कब्जा है। यहां पर 2007 का उपचुनाव और 2009 का चुनाव यशोधरा राजे सिंधिया जीती। इसके बाद 2014 में नरेंद्र सिंह तोमर और 2019 में विवेक शेजवलकर ने चुनाव जीता। उन्होंने कांग्रेस के अशोक सिंह को 1.46 लाख वोट से चुनाव हराया था। इस बार भाजपा ने विवेक शेजवलकर का टिकट काट कर भारत सिंह कुशवाह को मैदान में उतारा है।

G News 24 : स्पीकर्स का शोर आराध्य के प्रति समर्पण नहीं बल्कि अपनी आस्था से दूसरों को प्रभावित करना है : रवि

 मनमाने तरीके से हटाए जा रहे लाउड स्पीकर : दिग्विजय सिंह 

स्पीकर्स का शोर आराध्य के प्रति समर्पण नहीं बल्कि अपनी आस्था से दूसरों को प्रभावित करना है : रवि 

मध्यप्रदेश में धार्मिक स्थलों पर नियम विरुद्ध लगाए गए लाउड स्पीकर्स को उतारने का अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखा जाना ये साफ जाहिर करता है कि राज नेता अपने राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के लिए किसी भी अच्छी मुहिम में रोड़ा अटकाने से भी बाज नहीं आते हैं वही कार्य करने का प्रयास दिग्विजय सिंह भी इन दिनों कर रहे हैं।

अब देखा जाए तो धार्मिक स्थलों पर लाऊड स्पीकर्स की जरूरत ही क्या है ? ये शोर किसे सुनाया जाता है। क्योंकि भक्ति/उपासना/अरदास/सुमिरन या दुआ करने के लिए  किसी भी आराध्य को सच्चे और शुद्ध मन याद करना ही सही मायने में उसके प्रति भक्त/उपासक की अपने आराध्य के प्रति निष्ठा होती है। आराध्य बहरा नहीं है जो उसे गला फाड़ फाड़कर शोर मचाकर अपनी आवाज़ से ये बताने का प्रयास किया जाये कि आप उसे याद कर रहे हैं। 

वैसे भी सरकार इन दिनों राज्य के अन्य शहरों में कड़ाई से पालन करने के लिए पुलिस और प्रशासन ध्वनि विस्तारक यंत्रों को हटा रहा है। कई मंदिरों से सिर्फ आरती के समय उपयोग किए जाने वाले लाउड स्पीकरों को उतार दिया गया। कई मस्जिदों से नमाज के पहले अजान के लिए उपयोग किए जाने वाले लाउड स्पीकरों को भी उतारा  जा रहा है।

 मेरे विचार से इसमें किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए। क्योंकि जब स्पीकर्स और लाइट का अविष्कार नहीं हुआ था तब भी तो आरती/अजान और अरदास होती ही थी तो अब बे -वजह इसे लेकर शोर क्यों मचाया जा रहा है। कभी-कभार इन आयोजनों में भीड़ और व्यवस्था के हिसाब से तो लाऊड स्पीकर्स का उपयोग ठीक है, लेकिन रोजाना बार बार इस प्रकार ध्वनि प्रदूषण फैलाना ठीक नहीं। इस प्रकार अपनी आस्था से दूसरों को परेशान करना कहां तक उचित है।  

लेकिन इसे लेकर दिग्विजय सिंह का कहना है कि मध्यप्रदेश सरकार के जारी निर्देशों का समानता से पालन नहीं हो रहा है। इसके लिए संबंधित धार्मिक स्थलों के प्रमुखों या धर्मगुरुओं से भी कोई सलाह-मशवरा नहीं किया जा रहा है। इस प्रकार धार्मिक केंद्रों द्वारा नियमों का पालन करते हुए उपयोग किए जा रहे लाउड स्पीकर्स को उतारना आम लोगों और धर्मगुरूओं की भावनाओं को आहत करता है।

दिग्विजय सिंह ने लिखा- मेरा आपसे अनुरोध है कि मध्यप्रदेश शासन ने जिस भावना से यह दिशा-निर्देश जारी किए हैं, उस भावना की रक्षा करने के लिए धार्मिक स्थलों पर लगे लाउड स्पीकर्स को नियमों के अंतर्गत उपयोग करने से रोकने वाले अधिकारियों पर नियंत्रण किया जाए। मानव स्वास्थ्य की रक्षा के साथ-साथ लोगों की आस्थाओं और सांस्कृतिक परंपराओं की भी रक्षा की जाए। आशा है आप इस मामले को व्यक्तिगत तौर पर दिखवाएंगे, और नियमों के विरुद्ध मनमाना आचरण करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों पर नियंत्रण करेंगे।

G News 24 : एक अकेले प्रदेश से ही विधानसभा चुनाव की दौड़ में 412 करोड़पति उम्मीदवार !

 1,283 उम्मीदवारों में से 412 यानी कि (32 %) करोड़पति लड़ रहे है चुनाव ...

एक अकेले प्रदेश से ही विधानसभा चुनाव की दौड़ में 412 करोड़पति उम्मीदवार !

आने वाले समय में आम चुनाव खास बनकर न रह जाएं इस बात की पूरी असंका लग रही है। क्योंकि चुनावों के दौरान जिस प्रकार धन का उपयोग होने लगा है उसे देख कर तो ऐसा ही प्रतीत होने लगा है कि आम चुनाव आम न होकर खास और सिर्फ धनकुबेर ही लड़ेंगे और अपनी मनमर्जी से सत्ता चलाएंगे क्योंकि आम आदमी तो चुनाव लड़ने से दूर हो रहा है. मेरी इस असंका को अभी हाल में आई ये रिपोर्ट भी बल दे रही है। इस प्रकार धन बल से चुनाव जीतना देश के लिए अच्छे संकेत नहीं है। 

ओडिशा में 13 मई से एक जून तक होने वाले विधानसभा चुनाव में 412 ‘करोड़पति’ उम्मीदवार मैदान में हैं. बताया जा रहा है, कि ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) और ‘ओडिशा इलेक्शन वॉच’ ने 1,285 उम्मीदवारों में से 1,283 के चुनावी हलफनामों का एनालिसिस किया है, जो ओडिशा में 147 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. 

ओडिशा में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही हो रहे हैं. एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि एनालिसिस किए गए 1,283 उम्मीदवारों में से 412 (32 %) करोड़पति हैं जबकि 2019 के विधानसभा चुनाव में 1,121 उम्मीदवारों में से 304 (27 %) करोड़पति थे. 

इसमें कहा गया है, कि सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (BJD) के 128 उम्मीदवारों, भाजपा के 96 उम्मीदवारों, कांग्रेस के 88 उम्मीदवारों और आम आदमी पार्टी के 11 उम्मीदवारों ने एक करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति घोषित की है. मौजूदा विधानसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 2.89 करोड़ रुपये है, जबकि 2019 में चुनावी मैदान में उतरे उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 1.69 करोड़ रुपये थी. रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व कोयला मंत्री दिलीप रे ओडिशा विधानसभा चुनाव में सबसे अमीर उम्मीदवार हैं. 

राउरकेला विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार दिलीप ने 313.53 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति घोषित की है. इसके बाद, चंपुआ क्षेत्र से बीजद उम्मीदवार सनातन महाकुड 227.67 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर हैं. तीसरे स्थान पर बस्ता विधानसभा क्षेत्र से बीजद उम्मीदवार सुबासिनी जेना हैं, जिन्होंने 135.17 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्ति घोषित की है. 

 रिपोर्ट के अनुसार, ओडिशा में विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरे पांच उम्मीदवारों ने अपने हलफनामे में शून्य संपत्ति घोषित की है. इसके अनुसार, 1283 उम्मीदवारों में से 348 (27 %) उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं. 

2019 के ओडिशा विधानसभा चुनाव में 1,121 उम्मीदवारों में से 332 (30%) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए थे. इस विधानसभा चुनाव में 292 ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले विचाराधीन हैं. इसी तरह, 566 उम्मीदवारों ने अपनी शैक्षणिक योग्यता 5वीं से 12वीं के बीच घोषित की है, जबकि 652 उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता स्नातक या उससे ऊपर है। 

G.NEWS 24 : प्रभात राय एक प्राणवान मूर्तिकार रहे...

स्मृति शेष !

प्रभात राय एक प्राणवान मूर्तिकार रहे...

प्रख्यात मूर्तिकार प्रभात राय नहीं रहे ,ये खबर अविश्वसनीय सी है ,लेकिन विश्वास करना पड़ रहा है। प्रभात राय ने ग्वालियर को उसी तरह पहचान दिलाई थी जैसे उस्ताद अमजद अली खान ने, माधवराव सिंधिया ने,मुकुट बिहारी सरोज ने अटल बिहारी बाजपेयी ने। किसी शहर का पर्याय बनने में एक उम्र गुजर जाती है। आप चाहे जिस क्षेत्र में काम करते हों ,लेकिन अपने शहर की पहचान बनने में तभी कामयाब होते हैं जब आपके  भीतर साधना का भाव हो। प्रभात राय एक ऐसा ही कलाकार था। प्रभात को मै उसके बाल्य काल   से जानता था ,क्योकि मै एक तो उससे उम्र में बड़ा था और दूसरे उसका पड़ौसी भी था। बात 1974  की रही होगी। 

कम्पू में कांटे साहब के जिस बाड़े में प्रभात आपने परिवार के साथ रहता था उसी बाड़े में हमारी समाजिक संस्था   नेत्रहीन कल्याण समिति का कार्यालय भी था। प्रभात के पिता स्वयं एक सिद्धहस्त कलाकार थे और पेशे से शिक्षक। प्रभात अपने बड़े भाई प्रशांत की तरह स्वभाव से शांत न होकर चंचल  था ,रोज कुछ न कुछ गड़बड़ करता और पिता की डाट खाता ,इसी बाड़े से उसने मूर्तिकला का ककहरा सीखा। उसके पिता और अग्रज ही उसके उस्ताद थे। उस्ताद से पिटना,प्यार पाना सबको नसीब नहीं होता ,लेकिन प्रभात को हुआ।

ये वो जमाना था जब राय परिवार के पास अपना कोई वर्कशाप नहीं था। कांटे साहब के बाड़े में ही इस परिवार ने मिलजुलकर शायद महाराणा प्रताप की अश्वारोही विशाल प्रतिमा तैयार की थी। हम सब उसे कौतूहल से देखते थे। बड़ा ही श्रमसाध्य काम था मूर्तियां बनाना। पहले मिटटी से मिनिएचर बनाया जाता था और बाद में फिर उसे विभिन्न प्रक्रियाओं से होते  हुए मूर्ति का आकार दिया जाता था। प्रभात पहले -पहल मूर्तिकला को लेकर गंभीर न था ,लेकिन बाद में उसकी अभिरुचि बढ़ी और वो लगातार तेजी से आगे बढ़ा। अपने अग्रज को भी उसने इस होड़ में पीछे छोड़ा ,लेकिन पिता के सपने को पूरा किया।

प्रभात और प्रशांत की जोड़ी अनूठी थी। मिलकर खान-पान ,हंसी मजाक ,परिवार का संचालन और मूर्ति निर्माण।दोनों को कभी अलग-करके नहीं देखा जा सकता था। कांटे साहब के तंग बाड़े से निकलकर प्रशांत और उसके परिवार में अनेक ठिकाने बदले ,लेकिन अपनी पहचान को अक्षुण रखा। पहले कम सफलता मिली ,फिर काम आगे बढ़ता   गया। उसने कभी धार्मिक लक्ष्य के लिए मूर्तियां बनाई तो कभी राजनीतिक प्रयोजन के लिए। राजनेता,धार्मिक नेता अबसे उसका तादात्म्य बैठता गया। स्थानीय शासन से लेकर राज्य शासन तक ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार में भी उसकी पैठ हो गयी। स्वर्गीय माधवराव सिंधिया हों या कैलाश विजयवर्गीय या ज्योतिरादित्य सिंधिया या नरेंद्र सिंह तोमर या पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान सब प्रभात  की मूर्तिकला के मुरीद थे। बहुत कम समय में प्रशांत ने यश और धन कमाया। खर्च भी किया। मोतीझील पर आधुनिक वर्कशाप बनाया ,जो अपने आप में एक संसथान की तरह जाना-पहचाना  हो गया।

प्रशांत और उसके परिवार  को मूर्तिकला ने वो सब दिया जो एक कलाकार को मिलना चाहिए ।  धन-दौलत,मान-सम्मान ,यश कीर्ति सब उसके हिस्से में आयी। उसे विनम्र बने  रहने में कभी संकोच नहीं हुआ। मेरी बड़ी बेटी की शादी में प्रभात ने बढ़चढ़कर हिस्सा  लिया। एक अनुज की तरह ,लेकिन हकीकत ये थी कि मैंने उसका स्थानीय नगर निगम में वर्षों से रुका हुआ भुगतान करा दिया था। उसने इसी की कृतग्यता  का ज्ञापन किया था। प्रभात जमीन से उठकर मूर्तिकला के क्षितिज पर स्थापित हुआ था। उसके समय के अनेक मूर्तिकार शहर में हैं ,उससे कहीं ज्यादा प्रतिभाशाली भी हैं लेकिन सबके पास प्रभात जैसा भाग्य नहीं है। मूर्तिकला  में ऊंच-नीच भी हुए । उसे सराहा भी गया और आलोचना भी की गई। विवाद भी आये लेकिन प्रभात सबका सामना करते हुए आगे बढ़ा। किसी की परवाह नहीं की उसने।

एक लम्बे आरसे से प्रभात के साथ मेरा उठना- बैठना नहीं था ,लेकिन जब भी कभी टकरा जाता तो उसी विनम्रता के साथ मिलता जैसा 1974  में मिला करता था। उसकी एक लम्बी यात्रा रही।  सुखद रही, स्वास्थ्य को लेकर उसकी लापरवाही हमेशा समस्याएं खड़ी करती रही। उसका जुझारूपन उसकी विशेषता  भी थी और कमजोरी भी। दिन-रात एक कर काम करना उसकी सनक थी।  ईश्वर ने उसे एक कलाकार की तरह गढ़ा था। पनीली आँखें,लम्बे घुंघराले बाल और अधरों पर सदैव एक स्निग्ध मुस्कान उसकी पहचान थी। प्रभात धर्मप्रिय था लेकिन प्रगतिशील भी। उसका 61 वर्ष की वय में जाना खल गया। अभी उसे अपना सर्वश्रष्ठ देना था। वो थका नहीं था ,लेकिन प्रकृति उसे शायद अवकाश पर भेजना चाहती थी। एक कलाकार के रूप में,एक भले मानस के रूप में प्रभात की कमी दशकों तक ग्वालियर को खलेगी। प्रभात की आत्मशांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ। उसके परिवार के प्रति मेरी संवेदनाएं हैं। 

- राकेश अचल

G News 24 : राजगढ़ में राजा और गुना में महाराज, की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है !

 तीसरे चरण में चंबल क्षेत्र में कांटे की टक्कर...

राजगढ़ में राजा और गुना में महाराज, की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है !

भोपाल। लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में मध्य प्रदेश में नौ सीटों पर 7 मई राजगढ़ में राजा और गुना में महाराज, की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है ! इसमें पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह राजगढ़ और शिवराज सिंह चौहान विदिशा और केंद्रीय उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से चुनाव मैदान में हैं। दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। वहीं, ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कांटे की टक्कर बताई जा रही है। 

गुना में महाराज ने लगाया पूरा जोर 

गुना सीट पर भाजपा ने केपी यादव का टिकट काटकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया है। वहीं, कांग्रेस ने यादवेंद्र यादव पर दांव लगाया है। इस सीट पर सिंधिया राजवंश का दबदबा रहा है। 2019 में हार के बाद सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए। अब वह फिर से अपने पारंपरिक सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। यहां पर यादव वोटरों की नाराजगी के कारण उनको ज्यादा जोर लगाना पड़ रहा है। यादवेंद्र यादव भी भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए है। उनके पिता स्व. देशराज यादव दो बार सिंधिया परिवार को टक्कर दे चुके हैं। हालांकि, उनको हार का सामना करना पड़ा था।

राजगढ़ में 'राजा' की सांख दांव पर

राजगढ़ से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से चुनाव मैदान में हैं। वे 30 साल बाद राजगढ़ से चुनाव लड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री रहने से पहले वे यहां से दो बार सांसद रह चुके हैं। अब इस बार उनका मुकाबला भाजपा के दो बार के सांसद रोडमल नागर से है। दिग्विजय सिंह ने जनता से भावनात्मक रूप से जुड़ने का प्रयास किया। उन्होंने सियासी जीवन का अंतिम चुनाव बता कर पूरी ताकत झोंक दी है। उनके पूरे परिवार ने घर-घर वोट मांगे। भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ नाराजगी के चलते मोदी के चेहरे पर वोट मांग रही है। 

विदिशा में शिव ने की मार्जिन बढ़ाने पर मेहनत

विदिशा सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चुनाव लड़ रहे हैं। यह भाजपा का गढ़ है। 2004 के बाद शिवराज विदिशा सीट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने पहुंचे हैं। वे यहां से पांच बार सांसद रह चुके हैं। शिवराज चार बार मुख्यमंत्री रहे। उनके सामने कांग्रेस ने पूर्व सांसद प्रताप भानु शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है। उनको शिवराज सिंह चौहान एक बार चुनाव हरा चुके हैं। इस सीट पर शिवराज और उनका परिवार पूरी मेहनत से जुटा हुआ है। यहां पर जीत का मार्जिन बढ़ाकर वे प्रदेश में लोकप्रिय राजनीतिक चेहरे के रूप से उभरना चाहते हैं।

बैतूल में डीडी उइके और रामू टेकाम फिर भिड़ेंगे

बैतूल में भाजपा ने वर्तमान सांसद दुर्गादास उइके को प्रत्याशी बनाया है। वहीं, कांग्रेस ने पूर्व प्रत्याशी रामू टेकाम पर ही दांव लगाया है। इस सीट में आने वाली विधानसभा की आठ में दो सीटें भाजपा हारी है। यह दोनों सीटें हरदा जिले की है। जहां पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा पार्टी की तरफ से आयोजित कराई गई है। भाजपा कोई भी कमजोरी नहीं रख रही है। 

मुरैना सीट पर कांटे की टक्कर 

मुरैना संसदीय सीट पर भाजपा ने शिवमंगल सिंह तोमर और कांग्रेस ने सत्यपाल सिंह सिकरवार को प्रत्याशी बनाया है। दोनों ही क्षत्रिय हैं। यहां पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही जागिगत समीकरण की रणनीति से चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने विजयपुर से कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत को पार्टी में शामिल करा कर कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। वे छह बार के विधायक हैं। इससे पहले भाजपा पूर्व विधायक बलवीर दंडोतिया को भी पार्टी में शामिल करा चुकी है, ताकि ब्राह्मण वोटरों की नाराजगी को दूर कर सके। 

ग्वालियर में मोदी के चेहरे पर चुनाव 

ग्वालियर में भाजपा ने पूर्व विधायक भारत सिंह कुशवाह और कांग्रेस ने पूर्व विधायक प्रवीण पाठक को टिकट दिया है। भाजपा ने ओबीसी और कांग्रेस ने ब्राह्मण को टिकट दिया है। यहां कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। हालांकि, भाजपा ने चुनाव को मोदी के चेहरे पर कर दिया है। 

भोपाल में आलोक और अरुण में जंग 

भोपाल सीट पर भाजपा ने पूर्व महापौर आलोक शर्मा को प्रत्याशी बनाया है। शर्मा दो विधानसभा चुनाव हार गए हैं। भाजपा ने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए शर्मा को प्रत्याशी बनाया है। भोपाल में पांच लाख मुस्लिम वोटर्स हैं। वहीं, कांग्रेस ने वकील अरुण श्रीवास्तव को प्रत्याशी बनाया है। भोपाल में करीब ढाई लाख कायस्थ वोटर हैं। कांग्रेस ने कायस्थ कार्ड खेलने का प्रयास किया है। 

सागर में लता और बुंदेला आमने-सामने 

सागर संसदीय सीट पर भाजपा ने लता वानखेड़े को प्रत्याशी बनाया है। लता राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रह चुकी हैं। वहीं, कांग्रेस ने चंद्रभूषण सिंह गुड्डू राजा बुंदेला को मैदान में उतारा है। सागर जिले की बीना से विधायक निर्मला सप्रे को भाजपा ने अपनी पार्टी में शामिल करा कर कांग्रेस को चुनाव से पहले बड़ा झटका दिया है। निर्मला सप्रे अनुसूचित जाति वर्ग से आती हैं। इस सीट पर दलित वोटर बड़ी संख्या में हैं। 

भिंड में बसपा के कारण मुकाबला रोचक

भिंड में भाजपा ने सांसद संध्या राय को ही टिकट दिया है। वहीं, कांग्रेस ने विधायक फूल सिंह बरैया पर दांव लगाया है। इस सीट पर बसपा से आशीष जरारिया खड़े हैं। वे पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। ऐसे में मुकाबला रोचक हो गया है। इस सीट पर राहुल गांधी कांग्रेस प्रत्याशी के लिए सभा कर चुके हैं। यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। 


G News 24 : विधानसभा हारे भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर !

 बसपा वोट कटवा पार्टी बनकर उभरी...

विधानसभा हारे भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर !


ग्वालियर। अंचल की अन्य लोकसभा सीटों की तरह ग्वालियर में भी विधानसभा हारे भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर के आसार हैं। बसपा ने भी  प्रत्याशी कल्याण सिंह कंसाना को मैदान में उतारा है लेकिन वे वोट कटवा साबित होते दिख रहे हैं। भाजपा-कांग्रेस के दोनों प्रत्याशी भारत सिंह कुशवाहा और प्रवीण पाठक विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। दोनों बड़े चेहरे नहीं हैं लेकिन मतदाता उनसे परिचित हैं। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, अंचल की तासीर के अनुसार जातीय आधार पर मतदाता लामबंद होता जा रहा है।

इस तरह बन-बिगड़ रहे जातीय समीकरण

भाजपा के प्रत्याशी कुशवाहा पिछड़े वर्ग से हैं, इसलिए इस वर्ग के तहत आने वाली अधिकांश जातियां कुशवाहा, गुर्जर, यादव, लोधी आदि भाजपा के साथ खड़ी दिखाई पड़ती हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रवीण पाठक ब्राह्मण हैं, इसलिए  हमेशा भाजपा के साथ रहने वाला  ब्राह्मण कांग्रेस की तरफ झुका नजर आ रहा है। क्षत्रिय भाजपा के खिलाफ है लेकिन आमतौर पर वह ब्राह्मणों के साथ नहीं जाता। इसलिए ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों दलों के बीच बंटे नजर आ रहे हैं। दलित मतदाता कांग्रेस और बसपा के साथ रहता है, इस बार भी यहीं स्थिति है। हालांकि बसपा प्रत्याशी दलित वर्ग से नहीं हैं, इसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। हर बार की तरह इस बार भी मुस्लिम मतदाता कांग्रेस का समर्थन करता दिख रहा है। साफ है जिस ओर जातीय समर्थन का पलड़ा भारी हो जाएगा, जीत वहां दस्तक देगी। देश, प्रदेश में चूंकि इस समय भाजपा के पक्ष में माहौल ज्यादा है। इसलिए वह बढ़त में दिखाई पड़ रही है।

पहले कांग्रेस, अब भाजपा का कब्जा

ग्वालियर में हमेशा जीत-हार के समीकरण बनते बिगड़ते रहे हैं। इस बार भी ऐसा हाेता दिख रहा है। वर्ष 2007 में हुए एक उप चुनाव के बाद ग्वालियर सीट पर भाजपा का कब्जा है। इससे पहले यहां कांग्रेस जीतती रही है। 1998 तक ग्वालियर से सांसद कांग्रेस के स्व माधवराव सिंधिया रहे। 1999 में वे गुना- शिवपुरी सीट से लड़े तब ग्वालियर में भाजपा के जयभान सिंह पवैया ने जीत दर्ज की।  2004 में कांग्रेस के रामसेवक सिंह बाबूजी ने पवैया को हराया। इसके बाद दो बार भाजपा से यशोधरा राजे सिंधिया सांसद रहीं। तब से सीट पर भाजपा का कब्जा है। कोई चार दशक बाद ग्वालियर में कांग्रेस का महापौर जीता है। कांग्रेस विधायकों की तादाद भी कम नहीं है। इस लिहाज से सीट कभी कांग्रेस कभी भाजपा के पक्ष में जाती रही है। इस बार भी मुकाबला कड़ा दिख रहा है।

किसी भी पक्ष में आ सकता है नतीजा

ग्वालियर में भाजपा भारी दिखती है लेकिन कड़े मुकाबले में नतीजा किसी भी पक्ष में आ सकता है। विधानसभा चुनाव में भी भाजपा- कांग्रेस को क्षेत्र की 8 में से 4-4 सीटों में जीत मिली थी। कांग्रेस ने पहली बार नगर निगम में महापौर का चुनाव जीता था। इस लिहाज से भी दोनों दल बराबरी पर दिखते हैं। कांग्रेस के प्रवीण पाठक 2018 में विधानसभा चुनाव जीते थे लेकिन 2023 में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। भाजपा के भारत सिंह कुशवाहा भी विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं। दोनों प्रत्याशी समाजों को साधने में ताकत झोंक रहे हैं।

प्रचार, मुद्दों में भाजपा से पिछड़ी कांग्रेस

प्रदेश के अन्य लोकसभा क्षेत्रों की तुलना में ग्वालियर में दोनों दलों का प्रचार गति पकड़े दिख रहा है। क्षेत्र में भाजपा के साथ कांग्रेस और बसपा प्रत्याशियों के भी बैनर, पोस्टर देखने को मिल रहे हैं। लेकिन प्रचार और मुद्दों के मामले में भाजपा की तुलना में कांग्रेस पिछड़ती नजर आ रही है। इसकी वजह संसाधन, नेता और कार्यकर्ता हैं। भाजपा के पास इसकी कमी नहीं है। मुद्दों के लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए काम, अयोध्या में राम मंदिर सहित राष्ट्रीय मसलों पर भाजपा मजबूत दिखती है। कांग्रेस के पास न नेता हैं, न कार्यकर्ता और न ही संसाधन। कांग्रेस के घोषणा पत्र में मुद्दे अच्छे हैं  लेकिन उनका प्रचार नहीं हो पा रहा। फिर भी जातीय समीकरणों के कारण कांग्रेस मुकाबले में है।