Random Posts

header ads
header ads

G News 24 : ईरानी लुटेरे नादिरशाह के हुक्म पर ईरानी सैनिकों ने जब दिल्ली में मचाया था कत्लेआम !

महीनों तक तक दिल्ली में सड़ती रही थीं हजारों हिंदुओं की लाशें...

ईरानी लुटेरे नादिरशाह के हुक्म पर ईरानी सैनिकों ने जब दिल्ली में मचाया था कत्लेआम !

यूएस-ईरान जंग में भारत में एक गद्दार वर्ग ऐसा है, जो ईरान को मानवता का चैंपियन बताते हुए जंग में उसका समर्थन कर रहा है. लेकिन उन्हें शायद पता नहीं है कि इसी ईरान के सैनिकों ने आज से करीब 300 साल पहले दिल्ली में हजारों हिंदुओं को एक ही दिन में कत्ल कर दिया था. उनकी लाशें सडकों पर कई दिनों तक सड़ती रही थीं.

यूएस-इजरायल और ईरान की हाल में हुई जंग में भारत की स्थिति निरपेक्षता की रही है. उसने युद्ध में किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं किया है और आपसी बातचीत के जरिए दोनों को मसले का हल निकालने का सुझाव दिया है. लेकिन सरकार के स्टैंड के इतर देश में एक बड़ा देश का गद्दार वर्ग ऐसा भी है, जो खुलकर जंग में कट्टरपंथी इस्लामिक मुल्क ईरान का सपोर्टकर रहा है. ईरान के प्रेम में डूबे उन लोगों ने अपने गहने,पैसे और जिंदगीभर की जमा-पूंजी इस मुल्क को दान कर दी. 

इन गद्दारों तर्क है कि ईरान मानवता और अपनी आजादी की जंग लड़ रहा है, जिसका समर्थन किया जाना चाहिए. लेकिन क्या आप जानते कि इसी ईरान ने आज से 288 साल पहले भारत में ऐसा कहर ढहाया था कि लोग आज भी उस नरसंहार को याद कर कांप उठते हैं. उसने न केवल भारत की दौलत लूटी बल्कि चुन-चुनकर मंदिर ध्वस्त किए. विरोध करने पर उसने दिल्ली में हिंदुओं की लाशों का ऐसा अंबार लगा दिया था, जिसे आज तक का सबसे बड़ा नरसंहार कहा जाता है.

कौन था नादिरशाह, जिसने भारत पर किया हमला?

भारत पर यह खूनी हमला नादिरशाह ने किया था. वह ईरान का शासक और अफशारिद वंश का संस्थापक था. उसकी नजर भारत की अकूत दौलत पर लगी थी. उसे पता था कि भारत में लोग संपन्न हैं, जिन्हें लूटकर ईरान का खजाना भरा जा सकता है. यह सोचकर उसने भारत पर हमले की योजना बनानी शुरू कर दी. भारत पर उस वक्त मुगल वंश का शासन चल रहा था और मुहम्मद शाह यहां का शासक था. उसके राज में मुगल साम्राज्य काफी कमजोर हो चुका था. 

अनुकूल मौका देखकर नादिरशाह ने भारत पर हमले की योजना बनाई. उसने फौज को भारत की ओर कूच करने का हुक्म दिया. उसकी सेना काबुल, गजनी और पेशावर से होते हुए पंजाब पहुंची, जहां उसका सामना मुगल फौज से हुआ. मुगल सेना, नादिरशाह की फौज से ज्यादा बड़ी थी लेकिन उसके पास कुशल नेतृत्व और संगठन की कमी थी. 

वहीं नादिरशाह की फौज में करीब 80 हजार सैनिक थे. यह सेना बेहद अनुशासित और युद्धकुशल थी, जिसमें घुड़सवार, तोपें और जंबूरक नामक छोटी तोपें शामिल थीं. नादिरशाह ने अपनी सेना को कुशल रणनीति से आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे करके मुगल वंश के तहत आने वाले भारत पर कब्जा करते चले गए. 

करनाल में मुगल सेनाओं को हराया

उसकी फौज का अभियान कंधार से शुरू होकर गजनी, काबुल, जलालाबाद, पेशावर, अटक, लाहौर, सरहिंद, अंबाला और करनाल होते हुए दिल्ली तक पहुंचा. इस दौरान नादिरशाह ने सभी जगहों पर लूटपाट करके भयानक कत्लेआम मचाया. अफगानिस्तान में चूंकि मुस्लिम थे, इसलिए वहां पर उसने ज्यादा ध्वंस नहीं किया लेकिन पंजाब और दिल्ली के बीच के इलाकों में उसने व्यापक लूटपाट की. नादिरशाह और मुगलों के बीच 24 फरवरी 1739 को करनाल के मैदान में निर्णायक युद्ध हुआ, जहां मुगलों की भारी हार हुई.

इस जीत के बाद मदमस्त होकर ईरानी शासक नादिरशाह मार्च 1739 में दिल्ली पहुंचा. उसके दिल्ली में कदम पड़ने से पहले ही मुगल बादशाह मुहम्मद शाह ने आत्मसमर्पण कर दिया. इसके बाद नादिरशाह ने दिल्ली में अपने नाम का खुतबा पढ़वाकर सिक्के अपने नाम ढलवाने का हुक्म दिया. इसके साथ ही उसने सैनिकों को दिल्ली शहर को लूटने का आदेश दिया. अपने आका का हुक्म मिलते ही ईरानी सैनिक भूखे भेड़ियों की तरह लोगों पर टूट पड़े. उन्होंने लाल किला और मुगल महलों समेत अमीर हिंदू परिवारों के घरों से सारी संपत्ति लूट ली.

नादिरशाह ने इस दौरान शाहजहां की ओर से बनवाया गया मयूर सिंहासन भी लूट लिया. यह सिंहासन शुद्ध सोने और हीरे-जवाहरात से जड़ा हुआ था. इसके अलावा कोहिनूर और दरिया-ए-नूर हीरे भी उनके हाथ लगे. उसने सैकड़ों हाथी, घोड़े, ऊंट और कारीगर भी लूटकर ले जाए गए. साथ ही मुगल खजाने से सोना-चांदी, जवाहरात और सारी नकदी भी जब्त कर ली गई.

दिल्ली की सड़कों पर लगाए लाशों के ढेर

ऐतिहासिक अनुमान के मुताबिक, नादिरशाह ने उस वक्त भारत से कुल 30 करोड़ रुपये नकद के अलावा हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी के बर्तन और दूसरी संपत्ति लूटी. अगर इस संपत्ति को आज की मुद्रास्फीति के हिसाब से ढालकर देखा जाए तो यह दौलत करीब 10 लाख 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की बनती है. कई इतिहासकारों के मुताबिक, भारत से लूटी गई यह दौलत इतनी ज्यादा थी कि नादिरशाह को ईरान में तीन साल तक कर वसूली की जरूरत ही नहीं पड़ी.

जब नादिरशाह दिल्ली में था तो अफवाह फैल गई कि जंग में घायल हो जाने की वजह से वह मर गया है. इसके बाद दिल्लीवासियों ने विद्रोह कर दिया. इसकी जानकारी मिलते ही नादिरशाह ने लोगों के कत्लेआम का आदेश जारी कर दिया. उसके हुक्म के बाद ईरानी सैनिकों ने दिल्ली में एक ही दिन में करीब 30 हजार लोगों को तलवारों से काटकर मार डाला. मरने वालों में अधिकतर हिंदू थे, जिन्हें अपने धर्म के साथ गद्दारी न करने की सजा के रूप में चुन-चुनकर मारा गया. इसके साथ ही शहर के कई इलाकों में आगजनी और लूटपाट हुई.

इतिहासकारों के अनुसार, नादिरशाह की सेना ने हिंदू आबादी वाले इलाकों में अत्याचार किए. दिल्ली के बाजारों, मंदिरों और घरों को लूटा गया. महिलाओं और बच्चों को पकड़कर गुलाम बना लिया गया, जिन्हें बाद में ईरान ले जाकर बेचा गया. नादिरशाह ने दिल्ली में 57 दिनों तक आतंक का राज चलाया. लूटपाट के साथ-साथ महिलाओं से बलात्कार और विरोध करने पर हत्याएं आम बात हो गईं थीं. हिंदू व्यापारियों और अमीरों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया. कई हिंदू परिवारों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया. दिल्ली में इस कदर लोगों को मारा गया था कि जगह-जगह लाशों के ढेर लग गए थे, जो कई दिनों तक सड़कों पर सड़ते रहे.

सिख योद्धाओं ने हमला कर कई महिलाओं को छुड़ाया

जब वह दिल्ली से करोड़ों की लूट और हजारों महिलाओं-बच्चों को गुलाम बनाकर ईरान लौट रहा था तो पंजाब में सिख योद्धाओं और हिंदू राजाओं ने उसकी सेना पर कई छोटे-छोटे गुरिल्ला हमले किए. इस हमले में उन्होंने कुछ महिलाओं और बच्चों को आजाद करवाने में कामयाबी पा ली. लेकिन, इसके बावजूद नादिरशाह अपार धन लेकर ईरान लौट गया. वापसी में उसने सिंधु नदी के पश्चिम के इलाकों पर कब्जा कर उसे ईरान का हिस्सा बना लिया.

ईरान पहुंचने के बाद नादिरशाह ने लूटी दौलत से अपनी सेना को मजबूत किया. उसने मयूर सिंहासन को ईरानी साम्राज्य का प्रतीक बनाया. भारत से लूटे गए खजाने से उसने कई और युद्ध अभियान चलाकर ईरान को समृद्ध बनाया. उसने भारत से इतना ज्यादा धन लूटा था कि तीन साल तक लोगों से कर ही नहीं वसूला. लेकिन कहते हैं कि कर्म हमेशा वापस लौटकर आते हैं. उसने जिस तरह भारत में लोगों का कत्लेआम करवाया था, उसी तरह उसे भी मरना पड़ा. ईरान में उसकी हत्या हो गई, जिसके बाद सिंहासन कई टुकड़ों में बंट गया. 

नादिरशाह तो मर गया लेकिन भारत के लोग आज भी उसकी ओर ढहाए गए जुल्मों-सितम को नहीं भूले हैं. हिंदुओं पर ढहाया गया कहर आज भी लोगों को शूल की चुभता है. ईरान ने भारत की दौलत ही नहीं लूटी, यहां की हजारों महिलाओं की इज्जत से भी खेला गया. छोटे-छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पुरुषों को मारा गया. मंदिरों को तुड़वा दिया गया. गले पर तलवार रखकर लोगों को कलमा पढ़ने को मजबूर किया गया. 

ईरान में नादिरशाह को हीरो मानते हैं लोग

दिलचस्प बात ये है कि ईरान में कोई भी व्यक्ति आज तक नादिरशाह को गलत नहीं बताता और न ही उसकी आलोचना करता है. उनका मानना है कि नादिरशाह ने अपने मुल्क और मजहब के लिए वही काम किया, जो उसे करना चाहिए था. उसने काफिरों को मारा, उनकी दौलत लूटी, उनकी महिलाओं को गुलाम बनाया. इन सबकी इजाजत मजहब देता है. 

ऐसे में जो लोग आज भारत में, ईरान प्रेम में पागल हुए जा रहे हैं, उन्हें 288 साल पहले नादिरशाह के इस नरसंहार को याद कर लेना चाहिए. उन्हें सोचना चाहिए कि क्या वे वाकई सही कर रहे हैं. क्या हमारे देश के हजारों लोगों का कत्ल करने वाले नादिरशाह के मुल्क के पीछे हमें इस तरह अंध समर्थन करना चाहिए या वहां के लोगों से नादिरशाह के जुल्मों का जवाब मांगना चाहिए. 

Post a Comment

0 Comments