इस पर्व की सबसे दिलचस्प कहानी मंदिरों से बाहर दर्शाए गए लोकजीवन में छिपी है...
आस्था की ओट में छिपा अनूठा ‘इको-सिस्टम’, नाग पंचमी का दुर्लभ सच !
नाग पंचमी का दिन सिर्फ कैलेंडर की एक धार्मिक तिथि नहीं है। सावन के सोमवार और नाग पंचमी का एक साथ पड़ना इसे विशेष बना रहा है। देशभर के शिवालयों और नाग मंदिरों में श्रद्धा का दृश्य दिखाई देगा, लेकिन इस पर्व की सबसे दिलचस्प कहानी मंदिरों से बाहर उस लोकजीवन में छिपी है, जहां सदियों से आस्था और प्रकृति एक-दूसरे के साथ चलती आई हैं। नाग पंचमी को थोड़ा अलग नजरिए से देखें तो यह केवल नाग की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि मनुष्य और उस जीव-जगत के बीच रिश्ते को स्वीकार करने वाली भारतीय परंपरा का भी प्रतीक दिखाई देता है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सांप को लेकर लोकमानस में भय भी रहा और सम्मान भी। खेतों और ग्रामीण जीवन में मौजूद सांप चूहों तथा अनेक कीटों की संख्या नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस अर्थ में वे खेती के उस प्राकृतिक संतुलन का हिस्सा हैं, जिसे आधुनिक भाषा में ‘इको-सिस्टम’ कहा जाता है।
नाग पंचमी से जुड़ी कई लोकपरंपराएं इसी प्रकृति-संबंध की ओर संकेत करती हैं। वर्षा ऋतु में जब खेतों और आसपास के प्राकृतिक आश्रयों में पानी भरता है, तब सांपों के बाहर दिखाई देने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में उनके प्रति सावधानी और अनावश्यक हिंसा से बचने की परंपरा को केवल धार्मिक विश्वास के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सामाजिक सीख के रूप में भी देखा जा सकता है।
यही कारण है कि नाग पंचमी से जुड़े अनेक ग्रामीण रीति-रिवाजों में जमीन खोदने, हल चलाने या ऐसे कामों से बचने की मान्यता मिलती है, जिनसे धरती के भीतर रहने वाले जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। चाहे इन परंपराओं की शुरुआत धार्मिक विश्वास से हुई हो या प्रकृति के अनुभव से, उन्होंने पीढ़ियों तक मनुष्य को यह संदेश जरूर दिया कि हर जीव का अपना स्थान और महत्व है। लेकिन इसी आस्था के बीच एक ऐसी परंपरा भी है, जिस पर आज पुनर्विचार की जरूरत है,जीवित सांपों को पकड़कर उन्हें दूध पिलाना और उनके साथ प्रदर्शन करना।
सांप दूध पीने वाले जीव नहीं हैं
वन्यजीव विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सांप दूध पीने वाले जीव नहीं हैं और उन्हें जबरन दूध पिलाना उनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। नाग पंचमी का वास्तविक सम्मान जीवित सांप को पकड़कर उसे परेशान करने में नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक आवास और जीवन को सुरक्षित रखने में है।
आज जरूरत इस बात की है कि आस्था को जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना से जोड़ा जाए। नाग की पूजा करनी है तो मिट्टी, धातु या अन्य प्रतीकात्मक माध्यमों से की जा सकती है; लेकिन किसी जीव को पकड़ना, उसे भूखा-प्यासा रखना या उसके प्राकृतिक व्यवहार के विरुद्ध कुछ करवाना पूजा नहीं हो सकता।
नाग पंचमी की खूबसूरती भारत की विविध लोकपरंपराओं में भी दिखाई देती है। उत्तर भारत के अनेक ग्रामीण इलाकों में घरों के द्वार पर गोबर और गेरू से नाग की आकृति बनाने की परंपरा रही है। दूसरी ओर गोवा जैसे तटीय क्षेत्रों में इस अवसर से जुड़े पारंपरिक पकवान और प्रकृति से जुड़े लोकाचार इस पर्व को अलग सांस्कृतिक रंग देते हैं।
आज जब पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून, अभियान और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, तब नाग पंचमी जैसी परंपराएं हमें अपने अतीत की उस सामाजिक व्यवस्था की याद दिलाती हैं, जिसमें प्रकृति की रक्षा केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि लोकविश्वास और दैनिक जीवन का हिस्सा भी थी।
शायद इस नाग पंचमी का सबसे बड़ा संदेश यही है,नाग की पूजा केवल उसके सामने दीप जलाने से पूरी नहीं होती। उसके जीवन और उसके प्राकृतिक संसार के प्रति सम्मान से पूरी होती है।
जिस जीव को हम सदियों से देवत्व का प्रतीक मानते आए हैं, उसे भय या मनोरंजन का साधन बनाने के बजाय उसके प्राकृतिक अस्तित्व को स्वीकार करना ही उस आस्था का आधुनिक और मानवीय रूप है। आस्था तब और सार्थक हो जाती है, जब वह किसी जीव को जीवन देने का कारण बने, उसके जीवन के लिए खतरा नहीं।



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