G News 24 : 'राहु...ल, नाम के एक बिर्टिश प्राणी द्वारा,भारत को ग्रहण लगाने का लगातार किया जा रहा है प्रयास !

आरोपों की राजनीति से संस्थाओं की विश्वसनीयता तक,सवाल सिर्फ लोकतांत्रिक मर्यादा का है...

'राहु...ल, नाम के  एक बिर्टिश प्राणी द्वारा,भारत को ग्रहण लगाने का लगातार किया जा रहा है प्रयास !

                                                                      केवल सांकेतिक तस्वीर !

लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। सत्ता से जवाब मांगना विपक्ष का अधिकार है। सरकारों की नीतियों की आलोचना करना, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर बहस करना एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन सवाल तब बड़ा हो जाता है, जब सवाल पूछने और आरोप लगाने के बीच की लोकतांत्रिक सीमा धुंधली होने लगे।

किसी संवैधानिक संस्था पर गंभीर आरोप लगाने से पहले क्या उसके समर्थन में ठोस प्रमाण होना जरूरी नहीं होना चाहिए? क्या सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल किए गए प्रत्येक गंभीर आरोप की जवाबदेही आरोप लगाने वाले की भी नहीं होनी चाहिए? और क्या किसी आरोप के बाद तथ्य सामने आने पर अपनी बात पर कायम रहने, प्रमाण देने या सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकार करने की राजनीतिक संस्कृति विकसित नहीं होनी चाहिए?

यहीं से शुरू होता है वह प्रश्न, कि क्या लोकतांत्रिक विश्वास के बीच 'राहु...ल' नाम का ग्रहण पड़ रहा है?

हाल के वर्षों में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता ने चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए। अगस्त 2025 में चुनाव आयोग ने उनके 'वोट चोरी' संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए उनसे शपथपत्र के माध्यम से आरोपों को प्रमाणित करने अथवा माफी मांगने को कहा था। आयोग ने यह भी कहा था कि आरोपों के संबंध में कोई हस्ताक्षरित औपचारिक शिकायत प्रस्तुत नहीं की गई थी।यह सवाल किसी व्यक्ति की आलोचना से ज्यादा उस राजनीतिक संस्कृति को लेकर है जिसमें संस्थाओं पर लगाए गए गंभीर आरोप कभी-कभी राजनीतिक हथियार बन जाते हैं। 

इसके बाद नवंबर 2025 में 272 पूर्व न्यायाधीशों, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने सार्वजनिक पत्र जारी कर संवैधानिक संस्थाओं, विशेषकर निर्वाचन आयोग, पर राजनीतिक हमलों को लेकर चिंता व्यक्त की। यह उनका दृष्टिकोण था और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

संस्था पर सवाल उठाना और संस्था को कटघरे में खड़ा कर देना,दो अलग बातें हैं...

निर्वाचन आयोग भारत की चुनाव प्रक्रिया का संवैधानिक प्राधिकरण है। आयोग लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों का प्रशासन करता है। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि आयोग आलोचना से ऊपर है।बल्कि लोकतंत्र में आयोग, सरकार, न्यायपालिका, मीडिया और हर सार्वजनिक संस्था से सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन सवाल और आरोप के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है...

सवाल प्रमाण मांगता है,आरोप जिम्मेदारी,यही लोकतांत्रिक संवाद की पहली शर्त है...

यदि किसी राजनीतिक नेता के पास चुनावी अनियमितता का प्रमाण है तो उसे सार्वजनिक करने, आयोग के समक्ष रखने और न्यायिक प्रक्रिया में प्रस्तुत करने का पूरा अधिकार है। लेकिन यदि किसी गंभीर आरोप को बार-बार सार्वजनिक मंचों पर दोहराया जाता है, तो उसका प्रभाव केवल संबंधित अधिकारी या संस्था की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहता; वह आम मतदाता के मन में पूरी चुनावी व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है।

  • यही वह बिंदु है जहां राजनीति को आत्ममंथन करना चाहिए।
  • संस्थाओं की विश्वसनीयता किसी सरकार या पार्टी की निजी संपत्ति नहीं
  • आज चुनाव आयोग है, कल कोई दूसरी संस्था हो सकती है।

  1. आज आरोप किसी निर्वाचन अधिकारी पर है, कल किसी बैंकिंग नियामक, राजनयिक, सुरक्षा अधिकारी, न्यायिक संस्था या प्रशासनिक अधिकारी पर हो सकता है।
  2. यदि बिना प्रमाण किसी संस्था को लगातार संदेह के घेरे में डालना राजनीतिक संवाद का सामान्य तरीका बन गया, तो धीरे-धीरे नागरिक के मन में हर संस्था के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है।
  3. राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों से लेकर अर्थव्यवस्था संभालने वाले संस्थानों और विदेश नीति से जुड़े अधिकारियों तक—इन सभी के निर्णयों की आलोचना हो सकती है, होनी भी चाहिए; लेकिन आलोचना और चरित्र-हनन में अंतर बनाए रखना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
  4. हाल ही में इंदौर में राहुल गांधी के एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को लेकर फोन, व्हाट्सऐप, फेसबुक और कथित फोन टैपिंग से जुड़े आरोप रिपोर्ट किए गए। ऐसे आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं; इसलिए इनका मूल्यांकन राजनीतिक भाषण की तीव्रता से नहीं, बल्कि उपलब्ध प्रमाण और सक्षम संस्थाओं की जांच से होना चाहिए। 
  5. यही लोकतंत्र का सही रास्ता है,आरोप नहीं, प्रमाण; प्रचार नहीं, प्रक्रिया।

सरकारें मूकदर्शक रहें या कानून अपना रास्ता चले,यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है...

यदि कोई व्यक्ति किसी नागरिक की प्रतिष्ठा को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने वाला झूठा आरोप लगाता है तो उसके विरुद्ध कानून में रास्ते मौजूद हैं। वर्तमान भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 मानहानि को परिभाषित करती है। हालांकि इसी कानून में सत्य, लोकहित तथा लोक सेवक के सार्वजनिक कार्यों पर सद्भावनापूर्ण राय जैसी महत्वपूर्ण अपवाद व्यवस्थाएं भी हैं। 

इसलिए हर तीखी आलोचना को अपराध मान लेना भी लोकतंत्र के लिए उचित नहीं होगा...

  • कानून की कसौटी यह होनी चाहिए कि आरोप झूठा है या नहीं, उसकी मंशा क्या थी, उससे वास्तविक प्रतिष्ठा-हानि हुई या नहीं और क्या वह संवैधानिक रूप से संरक्षित आलोचना की सीमा में आता है।
  • सरकार को किसी राजनीतिक आलोचक पर केवल इसलिए कार्रवाई नहीं करनी चाहिए कि वह सरकार की आलोचना कर रहा है।
  • लेकिन यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध कानूनन संज्ञेय अपराध बनता है, तो उसका राजनीतिक पद या प्रभाव उसे कानून से ऊपर नहीं कर सकता।
  • न कानून आम आदमी के लिए अलग हो और न राजनीतिक व्यक्ति के लिए अलग। यही समानता का वास्तविक अर्थ है।

क्या सत्ता को राजनीतिक सुविधा दिखाई देती है,यह सवाल सरकारों से भी पूछा जाना चाहिए...

यदि कोई व्यक्ति लगातार ऐसे आरोप लगाता है जो किसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं, तो सरकार का काम केवल राजनीतिक प्रतिवाद करना नहीं है।

सरकार को चाहिए कि...

  • तथ्य सार्वजनिक करे,
  • प्रमाण उपलब्ध कराए,
  • संबंधित संस्था को अपना पक्ष रखने का अवसर दे,
  • आवश्यकता होने पर स्वतंत्र जांच की व्यवस्था करे,
  • और जहां वास्तविक कानूनी उल्लंघन हो, वहां कानून को अपना काम करने दे।

सरकार की चुप्पी कभी-कभी राजनीतिक सुविधा तो दे सकती है,लेकिन संस्थागत विश्वास को नहीं। साथ ही विपक्ष की आवाज दबाना भी समाधान नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष का मजबूत होना उतना ही जरूरी है जितना सरकार का जवाबदेह होना। 

  • आज की राजनीति का सबसे बड़ा संकट भाषा नहीं, प्रमाण का है
  • राजनीति में भाषण तेज होते जा रहे हैं।
  • सोशल मीडिया ने आरोपों को सेकंडों में करोड़ों लोगों तक पहुंचाने की ताकत दे दी है।
  • लेकिन किसी आरोप को वायरल होने में प्रमाण नहीं लगता,सिर्फ एक कैमरा, एक माइक्रोफोन और एक उत्तेजक वाक्य काफी है।
  • यहीं मीडिया और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

यदि कोई नेता कहता है कि चुनाव में गड़बड़ी हुई है तो मीडिया को यह पूछना चाहिए...

  1. कहां हुई?
  2. किस बूथ पर हुई?
  3. किस अधिकारी ने की?
  4. क्या दस्तावेज हैं?
  5. क्या शिकायत दर्ज हुई?
  6. क्या जांच हुई?
  7. न्यायालय ने क्या कहा?
  8. आरोप का तथ्यात्मक आधार क्या निकला?

नई पीढ़ी को क्या सिखा रहे हैं हम?

  1. आज का युवा राजनीति को केवल संसद और चुनावी मैदान से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से देखता है। यदि उसे लगातार यह बताया जाए कि चुनाव चोरी हो सकते हैं,संस्थाएं बिक सकती हैं, अधिकारी किसी राजनीतिक शक्ति के इशारे पर काम करते हैं और हर संवैधानिक व्यवस्था संदिग्ध है,तो कल वह लोकतंत्र पर विश्वास क्यों करेगा?
  2. और दूसरी ओर यदि उसे यह बताया जाए कि सत्ता से कोई सवाल ही नहीं पूछा जा सकता, सरकार की आलोचना देश-विरोध है और हर संस्थागत निर्णय सही ही है,तो वह भी लोकतंत्र नहीं होगा। लोकतंत्र का सही पाठ इन दोनों अतियों के बीच है।
  • सवाल पूछो,लेकिन प्रमाण के साथ 
  • सरकार की आलोचना करो,लेकिन तथ्य के साथ।
  • संस्था पर संदेह हो,तो जांच की मांग करो।
  • आरोप लगाओ,तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करो।
  • और यदि आरोप गलत साबित हो जाए,तो सार्वजनिक जीवन में माफी मांगने को कमजोरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता माना जाए।

'राहु...ल' केवल एक नाम नहीं, एक राजनीतिक प्रतीक बनने का खतरा...

शीर्षक में प्रयुक्त 'राहु...ल' को किसी व्यक्ति के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी के रूप में नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रवृत्ति के प्रतीक के रूप में पढ़ा जाना चाहिए जिसमें लगातार अविश्वास, आरोप और संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न राजनीति का केंद्रीय हथियार बन जाए। क्योंकि लोकतंत्र में व्यक्ति आते-जाते हैं।

  • सरकारें बदलती हैं।
  • पार्टियां सत्ता में आती-जाती हैं।
  • लेकिन संवैधानिक संस्थाएं देश की स्थायी संपत्ति हैं।
  • आज यदि कोई विपक्ष में रहकर निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाता है, तो कल वही संस्था किसी दूसरी पार्टी की सरकार के लिए चुनाव कराएगी।
  • आज यदि किसी अधिकारी पर राजनीतिक आरोप लगाया जाता है, तो कल किसी दूसरे दल की सरकार उसी प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर होगी।
  • इसलिए संस्थाओं की विश्वसनीयता बचाना किसी एक दल का नहीं, पूरे लोकतांत्रिक समाज का साझा दायित्व है।

अंतिम सवाल, जो देश जानना चाहता है...

  1. क्या राजनीतिक विरोध इतना बढ़ जाना चाहिए कि संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा ही राजनीतिक मतभेद का शिकार हो जाए?
  2. क्या गंभीर आरोप प्रमाण के बिना सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनते रहें?
  3. क्या आरोप लगाने वाले से प्रमाण मांगना लोकतंत्र-विरोधी है?
  4. क्या गलत आरोप सिद्ध होने पर माफी मांगना राजनीतिक कमजोरी है?
  5. क्या सरकार को केवल इसलिए कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि कोई आलोचना कर रहा है,या केवल तब, जब कानून का वास्तविक उल्लंघन हो?

सबसे बड़ा सवाल...

क्या हम आने वाली पीढ़ी को ऐसा भारत देना चाहते हैं जहां हर संस्था पर भरोसा करने से पहले नागरिक राजनीतिक चश्मा लगाए, या ऐसा भारत जहां संस्थाओं की आलोचना भी हो और उनकी विश्वसनीयता की रक्षा भी?

भारत के विकास को सड़कों, पुलों, कारखानों, तकनीक और अर्थव्यवस्था जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत विश्वसनीय संस्थाओं और जिम्मेदार राजनीतिक संवाद की भी है। क्योंकि विकास की राह में सबसे बड़ा ग्रहण केवल आर्थिक पिछड़ापन नहीं होता।अविश्वास भी विकास को रोकता है। इसलिए समय आ गया है कि राजनीति आरोपों की ऊंचाई नहीं, प्रमाण की गहराई से अपनी ताकत साबित करे।

बिग थिंकर का सवाल साफ है...

“व्यक्ति बदलते रहेंगे, सत्ता बदलती रहेगी; लेकिन क्या हम अपनी संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा बचाए रख पाएंगे !”

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