हैरान कर देने वाले मौसम के पीछे का असली विज्ञान,आसमान से बरस रहे हैं बेशकीमती हीरे...
यहां पानी की बूंदें नहीं, बल्कि आसमान से चमचमाते हीरे बरसते हैं,जानकर दंग रह जाएंगे आप !!!
जब हम अमीर बनने या खजाने की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में सोने की खदानें या हीरों की तिजोरियां आती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे ही सौरमंडल में दो ऐसे जादुई और रहस्यमयी ग्रह मौजूद हैं, जहाँ हीरों की बारिश होती है? जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना. यूरेनस (Uranus) और नेप्च्यून (Neptune) नाम के इन बर्फीले ग्रहों पर पानी की बूंदें नहीं, बल्कि आसमान से चमचमाते हीरे बरसते हैं. वैज्ञानिकों ने अब इस थ्योरी को सच साबित करने वाले मजबूत सुबूत ढूंढ निकाले हैं. आइए जानते हैं कि इस खौफनाक और हैरान कर देने वाले मौसम के पीछे का असली विज्ञान क्या है.
बादलों के नीचे कैसे बनते हैं हीरे?
यूरेनस और नेप्च्यून को हमारे सौरमंडल के 'आइस जायंट्स' (बर्फीले दानव) कहा जाता है. इन ग्रहों के वायुमंडल में मीथेन गैस भारी मात्रा में मौजूद है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन ग्रहों की ऊपरी सतह से हजारों किलोमीटर नीचे का तापमान और दबाव (Pressure) इतना भयानक है कि वह मीथेन के मॉलिक्यूल्स को पूरी तरह से तोड़ देता है. जब मीथेन में मौजूद हाइड्रोजन और कार्बन अलग हो जाते हैं, तो अत्यधिक दबाव के कारण कार्बन के परमाणु आपस में जुड़कर क्रिस्टल यानी हीरे का रूप ले लेते हैं. इसके बाद ये हीरे ओलों की तरह नीचे गिरने लगते हैं.
लैब में वैज्ञानिकों ने बनाया 'नकली ग्रह'
इस थ्योरी को साबित करने के लिए साल 2017 में SLAC नेशनल एक्सीलेटर लैबोरेटरी और जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक अनोखा प्रयोग किया. उन्होंने धरती पर ही इन ग्रहों जैसा माहौल तैयार करने की कोशिश की. वैज्ञानिकों ने कार्बन और हाइड्रोजन से बने एक खास प्लास्टिक पर दुनिया का सबसे शक्तिशाली एक्स-रे लेज़र फायर किया. परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे. पलक झपकते ही, यानी एक सेकंड के अरबवें हिस्से में, उस प्लास्टिक के टुकड़े नैनो-डायमंड्स (छोटे हीरों) में बदल गए. हाल ही में इसमें ऑक्सीजन मिलाकर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि यह प्रक्रिया उम्मीद से भी ज्यादा तेज़ काम करती है.
सिर्फ बारिश नहीं, केबिन में छिपी है हीरों की परत
वैज्ञानिकों का मानना है कि हीरों की यह बारिश तो सिर्फ एक छोटी सी झांकी है. अगर यह प्रक्रिया पिछले अरबों सालों से चल रही है, तो इन ग्रहों के चट्टानी कोर (केंद्र) के चारों ओर हीरों की एक बहुत मोटी और भारी परत जमा हो चुकी होगी. यह हीरों की परत इतनी विशाल हो सकती है कि यह इन ग्रहों से निकलने वाली गर्मी और उनके अजीबोगरीब चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) को भी प्रभावित करती है.
क्या हम इन हीरों को धरती पर ला सकते हैं?
इसका सीधा जवाब है- फिलहाल बिल्कुल नहीं. ये हीरे किसी खुले मैदान या समुद्र तट पर नहीं बिखरे हैं. ये बादलों की उस गहराई में बनते हैं जहाँ का दबाव पृथ्वी के मुकाबले लाखों गुना ज्यादा है. आज तक कोई भी इंसानी स्पेस प्रोब इन ग्रहों की इतनी गहराई में नहीं जा सका है. नासा (NASA) अब भविष्य में इन बर्फीले ग्रहों के अंदरूनी रहस्यों को जानने के लिए विशेष मिशन भेजने की तैयारी कर रहा है.
पूरे ब्रह्मांड का यही है सच
यह अनोखी खोज सिर्फ हमारे सौरमंडल तक सीमित नहीं है. अंतरिक्ष में यूरेनस और नेप्च्यून के आकार के हजारों एक्सोप्लैनेट्स (सौरमंडल से बाहर के ग्रह) मौजूद हैं. इसका मतलब यह हुआ कि हीरों की बारिश ब्रह्मांड में कोई दुर्लभ घटना नहीं, बल्कि एक आम मौसम की तरह है. भले ही हम इन हीरों को कभी छू न पाएं, लेकिन विज्ञान ने यह साबित कर दिया है कि कुदरत के पास हमसे भी बड़े खजाने छिपे हुए हैं.


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