धरना, विरोध और लोकतंत्र की मर्यादा...
लोकतंत्र में 'मेरी मर्जी' नहीं, संविधान की मर्जी चलती है !
हाल के घटनाक्रम में जिस प्रकार प्रधानमंत्री आवास के निकट प्रतिबंधित क्षेत्र में धरना देने का प्रयास किया गया, उससे यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या किसी भी राजनीतिक दल को यह अधिकार है कि वह सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक नियमों की अनदेखी कर अपनी इच्छा थोपने का प्रयास करे? लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति या दल की इच्छा संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
इसी प्रकार यदि किसी विषय पर सरकार चर्चा के लिए तैयार हो जाए और उसके बाद भी लगातार नई शर्तें रखकर गतिरोध बनाए रखा जाए, तो इससे यह संदेश जाता है कि उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि राजनीतिक टकराव को बनाए रखना है। संसद संवाद का मंच है, सड़क नहीं। यदि हर मुद्दे का समाधान केवल धरना, हंगामा और टकराव से खोजा जाएगा तो लोकतांत्रिक संस्थाओं का महत्व कमजोर होगा।
जब प्रशासन किसी प्रतिबंधित क्षेत्र में धरना देने से रोकता है, तो उसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल की आवाज दबाना नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था और सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। यदि कोई व्यक्ति या दल नियमों की अनदेखी करेगा, तो पुलिस द्वारा कानून के अनुसार कार्रवाई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही हिस्सा है। अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जुड़े होते हैं।
भारत का लोकतंत्र किसी एक दल, परिवार या नेता की निजी संपत्ति नहीं है। यहां संविधान सर्वोच्च है। जो भी व्यक्ति या संगठन लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में अराजकता फैलाने, नियमों की अवहेलना करने या सार्वजनिक व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास करेगा, उसे यह समझ लेना चाहिए कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।
राजनीति जनसेवा का माध्यम बने, जनअसुविधा का नहीं। विरोध कीजिए, प्रश्न पूछिए, सरकार को घेरिए—लेकिन संविधान और कानून की मर्यादा के भीतर रहकर। क्योंकि लोकतंत्र में अंततः किसी की "मेरी मर्जी" नहीं, बल्कि संविधान की मर्जी चलती है।



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