CJP का छात्रों के साथ छल...
कॉकरोच हिंसक, विपक्ष प्रायोजक !
देश में जब भी किसी परीक्षा को लेकर विवाद होता है, तब सबसे अधिक पीड़ा उस छात्र को होती है जिसने वर्षों तक दिन-रात मेहनत कर अपना भविष्य दांव पर लगाया होता है। यदि परीक्षा में गड़बड़ी हुई है तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और विद्यार्थियों को न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तब खड़ा होता है जब छात्र आंदोलन की आड़ में ऐसा माहौल तैयार किया जाने लगे, जिसका शिक्षा से कम और राजनीति से अधिक संबंध दिखाई देने लगे।
सबसे पहले एक सामान्य प्रश्न उठता है। नीट जैसी परीक्षा में भाग लेने वाले अधिकांश विद्यार्थी 16 से 20 वर्ष की आयु वर्ग के होते हैं। यदि सड़कों पर आंदोलन करने वालों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की दिखाई दे जो इस आयु वर्ग से काफी अधिक प्रतीत हों, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह पूरी भीड़ वास्तव में छात्रों की थी, या फिर छात्र आंदोलन के नाम पर दूसरे लोग भी सक्रिय हो गए थे? इस प्रश्न का उत्तर जांच और तथ्यों से ही मिल सकता है, लेकिन इसे पूछना अनुचित नहीं कहा जा सकता।
यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में सुधार है, तो उसकी आवाज़ परीक्षा प्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही तक सीमित रहनी चाहिए। लेकिन जब आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ अपमानजनक नारे लगाए जाएँ, संसद को चुनौती देने वाली बातें हों, देशविरोधी नारे लगाने के आरोप सामने आएँ, धारा 370 जैसे असंबंधित राजनीतिक मुद्दों को जोड़ा जाए या लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्थिर करने वाली भाषा सुनाई दे, तब यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है कि आखिर यह छात्र आंदोलन है या राजनीतिक मंच?
केंद्रीय शिक्षा मंत्री से जवाब मांगना, परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाना या इस्तीफे की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकारों के दायरे में माना जा सकता है। लेकिन यदि आंदोलन का केंद्र शिक्षा न रहकर सत्ता परिवर्तन, राजनीतिक वैमनस्य और संस्थाओं के प्रति आक्रोश बन जाए, तो उसकी विश्वसनीयता स्वतः संदेह के घेरे में आ जाती है।
लोकतंत्र में विरोध की स्वतंत्रता है, लेकिन लोकतंत्र अराजकता की अनुमति नहीं देता। पुलिस पर हमला, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, कानून-व्यवस्था को चुनौती देना या संसद जैसे लोकतांत्रिक संस्थान के प्रति उग्र भाषा का प्रयोग किसी भी सभ्य आंदोलन की पहचान नहीं हो सकती। यदि ऐसा हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
आज देश के सामने सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब वास्तविक छात्रों की पीड़ा को राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं। यदि किसी छात्र आंदोलन में राजनीतिक कार्यकर्ता, वैचारिक संगठन या अवसरवादी तत्व हावी हो जाएँ, तो सबसे पहले नुकसान उसी छात्र का होता है जिसके भविष्य के नाम पर आंदोलन शुरू हुआ था।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि संसद के भीतर सरकार को घेरने का लोकतांत्रिक अधिकार विपक्ष को है, लेकिन यदि बाहर सड़कों पर आंदोलन और भीतर संसद की कार्यवाही, दोनों का उद्देश्य केवल टकराव बन जाए, तो देश की जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में चिंता विद्यार्थियों के भविष्य की है या फिर सत्ता की राजनीति की?
भारत जैसे लोकतंत्र में छात्र शक्ति परिवर्तन का माध्यम अवश्य हो सकती है, लेकिन विनाश का उपकरण नहीं। विद्यार्थी का हाथ किताब पर अच्छा लगता है, पत्थर पर नहीं। उसकी आवाज़ ज्ञान की होनी चाहिए, अराजकता की नहीं। शिक्षा सुधार की लड़ाई लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर लड़ी जाएगी, तभी उसका नैतिक बल भी रहेगा और जनता का समर्थन भी।
"जब छात्र आंदोलन के मंच पर शिक्षा से अधिक राजनीति दिखाई देने लगे, तब सबसे पहले यह पूछना चाहिए,आखिर असली विद्यार्थी कहाँ हैं?" क्या देश के छात्र आंदोलनों को केवल छात्रों तक सीमित रखने और राजनीतिक दलों की प्रत्यक्ष भागीदारी पर स्पष्ट नियम बनाने का समय आ गया है, ताकि विद्यार्थियों की वास्तविक आवाज़ राजनीति के शोर में दब न जाए ...



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