G News 24 : भारत के कट्टरपंथी मौलाना की सोच,महिला मंच पर आई तो तबाही मचेगी !

मुस्लिम देश किर्गिस्तान में महिलाओं की आजादी और ...

भारत के कट्टरपंथी मौलाना की सोच,महिला मंच पर आई तो तबाही मचेगी !

अभी SCO की बैठक में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किर्गिस्तान में हैं. किर्गिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है. यहां लगभग 90% मुस्लिम आबादी है. लेकिन महिला स्वतंत्रता के मामले में ये देश आधुनिक विचारों वाला है. इसके ख्याल मॉडर्न है, लेकिन हम, एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं. भारत में किसी भी तरह के कट्टरपंथ की कोई इजाजत नहीं है. यहां सबको संविधान के दायरे में रहकर अपने हिसाब से रहने की आजादी है.

फिर भी हमारे यहां भारत में शरिया बचाओ आंदोलन चलाने की तैयारी है. यहां..कट्टरपंथी बेखौफ होकर कह देते हैं कि महिला अगर मंच पर आएगी तो तबाही आ जाएगी. आज हम..ऐसे ही कट्टरपंथियों की वैचारिक मरम्मत करेंगे. लेकिन इससे पहले उन्हें..किर्गिस्तान से इस्लामिक आइना दिखाना जरूरी है.

मित्रों, किर्गिस्तान में महिलाओं का चेहरा ढकना मना है. जब दुनिया के अलग-अलग देशों में मुस्लिम महिलाओं पर बुर्का थोपा जा रहा है, उस समय किर्गिस्तान एक अलग कहानी कहता है. किर्गिस्तान ऐसा देश है जहां नकाब पर बैन है. यहां नकाब लगाने के खिलाफ कानून बना हुआ है. सार्वजनिक स्थानों और सरकारी दफ्तरों में नकाब पहनने पर लगभग 20,000 रुपये जुर्माना लगाया जाता है.

सिर्फ किर्गिस्तान ही नहीं बल्कि मध्य एशिया के मुस्लिम बहुल सभी 5 देशों में महिलाओं को नकाब और बुर्के से आजादी मिली हुई है. उज्बेकिस्तान हो या कजाकिस्तान, तजाकिस्तान हो या तुर्कमेनिस्तान- यहां 70% से लेकर 98% तक मुस्लिम आबादी है. लेकिन इसके बावजूद इन देशों में महिलाओं पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है. सुरक्षा और राष्ट्रीय पहचान के नाम पर यहां की सरकारों ने नकाब और बुर्के पर पाबंदी लगा रखी है.

कजाकिस्तान में तो बुर्के के साथ-साथ हिजाब पहनने पर भी प्रतिबंध है. यहां 70 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है. लेकिन इसके बावजूद कजाकिस्तान की सरकार ने पिछले साल हिजाब और बुर्का पहनने के खिलाफ कानून बनाया. इन देशों में महिलाओं को अकेले घर से बाहर निकलने, काम करने और यात्रा करने की पूरी आजादी है. दफ्तरों में महिलाएं पुरुषों के साथ काम करती हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि इन देशों में मुस्लिम संगठन भी सरकार के इन कदमों का समर्थन करते हैं.

लेकिन भारत के कई मुस्लिम धर्मगुरु और इस्लामिक संगठन महिलाओं की ऐसी आजादी के खिलाफ हैं. महिलाओं की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाने की हिमायत करने वाले ऐसे ही एक शख्स हैं केरलम के ग्रैंड मुफ्ती अबू बकर मुसलियार. इनके मुताबिक महिलाएं सोने के गहने हैं जिन्हें डिब्बे में सुरक्षित रखा जाता है. ये कहते हैं कि महिलाओं को घर के अंदर ही रहना चाहिए और अगर वो बाहर निकलती हैं और सार्वजनिक मंच पर दिखती हैं तो भारी तबाही आ सकती है.

सोचिए..जिस देश में बहुसंख्यक आबादी को महिलाओं में देवी दिखती है, उसी देश में इस मुफ्ती को महिलाओं में तबाही दिखती है. मुफ्ती अबू बकर मुसलियार के संगठन ने हाल ही में महिलाओं के खिलाफ एक सर्कुलर भी जारी किया था. उसमें कहा गया था कि महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर मौजूद नहीं रहना चाहिए. कई संगठनों ने इस सर्कुलर का विरोध किया. लेकिन मुफ्ती अबू बकर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा.

आधुनिक सोच के मामले में अक्सर केरलम का उदाहरण दिया जाता है. दावा किया जाता है कि केरलम में कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं है. यहां की महिलाएं सबसे आजाद हैं. लेकिन मुफ्ती अबू बकर के ये बयान साबित करते हैं कि महिलाओं को पीछे रखने में यहां के धार्मिक नेता सबसे आगे हैं. यहां आपको ये भी जानना चाहिए कि अबू बकर मुसलियार कोई छोटे-मोटे धार्मिक नेता नहीं हैं.

  • - उन्हें केरलम के साथ-साथ भारत और पूरे दक्षिण एशिया में सुन्नी मुसलमानों का बड़ा धार्मिक नेता माना जाता है.
  • - 94 साल के अबू बकर मुसलियार भारत में ग्रैंड मुफ्ती का दर्जा पाने वाले 10वें धार्मिक विद्वान माने जाते हैं.
  • - उनका संगठन समस्थ केरल जमियतुल उलेमा राज्य का एक प्रमुख धार्मिक संगठन है.
  • - ये संगठन केरलम की मुस्लिम राजनीति और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है
  • - केरलम की सत्ता में साझेदार इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से इसके करीबी संबंध हैं.

लेकिन जिस संगठन का दायरा इतना बड़ा है, महिलाओं को लेकर उसकी सोच उतनी ही छोटी है. महिलाओं की आजादी इन्हें पसंद नहीं है. हैरानी की बात ये है कि उनके इस विचार का समर्थन कई और धार्मिक नेता करते हैं.केरलम में ग्रैंड मुफ्ती अबू बकर महिलाओं की आजादी के खिलाफ हैं. वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में शरिया के लिए आंदोलन शुरू होने जा रहा है.

मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने आज इस आंदोलन का एलान किया. इसका नाम रखा गया है संविधान बचाओ, शरिया बचाओ अभियान. सोचिए, जो संगठन एक साल पहले वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ आंदोलन चला रहा था, वो अब शरिया बचाओ के नाम से नया अभियान शुरू करेगा. यही लोग पहले वक्फ के नाम पर खुद को पीड़ित बता रहे थे, अब शरिया के नाम पर खुद को पीड़ित बताएंगे. 

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