संसद चलेगी या सिर्फ राजनीति होगी ...
हंगामा,वॉकआउट और संसद ठप,तय हो जवाबदेही,संसद न चलने पर सांसदों की क्यों न कटे सैलरी ?
देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद केवल सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव का मंच नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की उम्मीदों का सदन है। यहीं कानून बनते हैं, यहीं सरकार से जवाब मांगा जाता है और यहीं देश के भविष्य की दिशा तय होती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ वर्षों में संसद की कार्यवाही का बड़ा हिस्सा हंगामे, नारेबाजी, वेल में आने और वॉकआउट की राजनीति की भेंट चढ़ता रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि संसद का समय आखिर किसका है? क्या यह किसी राजनीतिक दल की निजी जागीर है, या देश की जनता की अमानत?
सांसदों को मिलने वाला वेतन, भत्ते, सरकारी आवास, सुरक्षा, यात्रा और अन्य सुविधाएं किसी दल के खजाने से नहीं, बल्कि देश के करोड़ों करदाताओं की मेहनत की कमाई से मिलती हैं। जनता उन्हें इसलिए चुनकर संसद भेजती है कि वे बहस करें, कानून बनाएं, सरकार से जवाब मांगें और जनता की आवाज़ बनें। लेकिन यदि पूरा सत्र हंगामे में निकल जाए और सांसद सदन से वॉकआउट कर दें, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश को होता है।
देश का कोई भी कर्मचारी यदि बिना काम किए कार्यालय छोड़ दे, बार-बार कामकाज बाधित करे या अपनी जिम्मेदारी निभाने से इंकार कर दे, तो उसके वेतन में कटौती होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। फिर सांसदों के मामले में अलग व्यवस्था क्यों? क्या जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सामान्य कर्मचारियों से कम होनी चाहिए?
लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध का सबसे प्रभावी माध्यम संसद के भीतर तर्क, तथ्य और बहस है। यदि हर मुद्दे का समाधान केवल हंगामा और कार्यवाही ठप करना बन जाए, तो लोकतंत्र का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा। विरोध का अधिकार बना रहना चाहिए, लेकिन संसद को निरंतर बाधित करने की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
अब समय आ गया है कि संसद की कार्यवाही में अनावश्यक व्यवधान डालने वाले सांसदों के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं। यदि किसी दिन हंगामे या अनुशासनहीनता के कारण सदन का काम नहीं हो पाता, तो उस अवधि के वेतन और भत्तों पर प्रभाव डालने जैसे प्रावधानों पर गंभीर विचार होना चाहिए। साथ ही, ऐसे मामलों में निष्पक्ष संसदीय प्रक्रिया और सभी दलों के लिए समान नियम लागू हों।
पूछता है देश...
- संसद चलेगी या सिर्फ नारे गूंजेंगे?
- जनता के टैक्स से मिलने वाले वेतन की जवाबदेही कौन तय करेगा?
- यदि कर्मचारी काम न करे तो वेतन कटता है, फिर सांसदों के लिए अलग नियम क्यों?
- संसद का समय बर्बाद करने की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?
- लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्य भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, और संसद की गरिमा बनाए रखना सत्ता तथा विपक्ष—दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
- संसद ठप तो वेतन भी बंद: लोकतंत्र में जवाबदेही कब तय होगी?
- जनता का पैसा, जनता की संसद... फिर काम रोकने की कीमत कौन चुकाए?
"जनता ने संसद में बहस करने भेजा था, लेकिन यदि बहस की जगह केवल हंगामा ही होगा, तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा नुकसान जनता का ही होगा।"
संसद लोकतंत्र का मंदिर है। यहाँ असहमति भी हो, तीखी बहस भी हो और सरकार से कड़े सवाल भी पूछे जाएं, यही लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन यदि संसद का बहुमूल्य समय लगातार बाधित होता है, तो उसकी जवाबदेही तय होना भी उतना ही आवश्यक है। जनता का धन, जनता का समय और जनता का विश्वास तीनों की रक्षा करना प्रत्येक जनप्रतिनिधि का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।



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