दानपात्र से बड़ा है मानवता का पात्र...
आस्था को आस्था ही रहने दें, धर्म का धंधा न बनने दें !
दान भारतीय संस्कृति की महान परंपरा है। लेकिन दान का सर्वोच्च स्वरूप वह है जो किसी भूखे के पेट तक पहुंचे, किसी गरीब बच्चे की शिक्षा बने, किसी बीमार की दवा बने, किसी असहाय परिवार का सहारा बने। यदि समाज का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा हो, यदि हमारी आस्था किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान नहीं ला पा रही, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना चाहिए। आखिर ईश्वर भी उसी हृदय में बसते हैं, जहां करुणा, दया और सेवा का वास होता है।
आज देश में करोड़ों लोग आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। अनेक परिवार दो समय की रोटी, शिक्षा और इलाज जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे समय यदि समाज का बड़ा आर्थिक योगदान केवल धार्मिक परिसरों तक सीमित रह जाए और जरूरतमंद उपेक्षित रह जाएं, तो यह स्थिति धर्म की आत्मा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
यह किसी धार्मिक संस्था का विरोध नहीं है।
देश में अनेक धार्मिक ट्रस्ट शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, गौसेवा, आपदा राहत और मानव सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। ऐसे प्रयास समाज के लिए प्रेरणा हैं। किंतु जहां दान के उपयोग को लेकर प्रश्न उठते हों, वहां पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है जितनी श्रद्धा। धर्म मनुष्य को जोड़ने के लिए बना था, लेकिन यदि वही धर्म धीरे-धीरे दिखावे, चढ़ावे और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनने लगे, तो समाज को आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए। आस्था कभी बिकाऊ नहीं होती, लेकिन जब हर धार्मिक स्थल पर श्रद्धा से अधिक चढ़ावे की चर्चा होने लगे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं धर्म का मूल उद्देश्य पीछे तो नहीं छूट रहा?
ईश्वर को सोने-चांदी के मुकुटों से अधिक प्रसन्न वह व्यक्ति करता है, जो किसी जरूरतमंद की आंखों के आंसू पोंछ देता है। भगवान के द्वार पर चढ़ाया गया फूल श्रद्धा का प्रतीक है, लेकिन किसी भूखे को खिलाई गई रोटी मानवता का उत्सव है। धर्म केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं, बल्कि सेवा, करुणा, संवेदना और लोककल्याण का मार्ग है।
समय आ गया है कि समाज दान की परिभाषा को थोड़ा व्यापक बनाए। धार्मिक स्थलों पर श्रद्धा अवश्य अर्पित करें, लेकिन अपने आसपास मौजूद गरीब, बीमार, वृद्ध, अनाथ और जरूरतमंद लोगों को भी अपनी आस्था का हिस्सा बनाएं। यदि हर श्रद्धालु अपने धार्मिक दान का एक हिस्सा प्रत्यक्ष मानव सेवा में लगाए, तो हजारों परिवारों की जिंदगी बदल सकती है।
मंदिर हो, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च—हर धार्मिक स्थल श्रद्धा, शांति और आत्मिक ऊर्जा का केंद्र है। वहां पहुंचने वाला व्यक्ति ईश्वर से सौदा करने नहीं, बल्कि मन की शांति पाने जाता है। किंतु जब प्रवेश से लेकर निकास तक दानपात्र, विशेष चढ़ावे, वीआईपी दर्शन और आर्थिक अपीलें प्रमुख दिखाई देने लगें, तो यह चिंता का विषय बन जाता है कि कहीं आस्था पर व्यवस्था नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था हावी तो नहीं हो रही।
भारतीय संस्कृति में दान को महादान कहा गया है, लेकिन शास्त्रों ने यह भी कहा है कि सबसे श्रेष्ठ दान वही है, जो किसी पीड़ित के जीवन में आशा का दीप जलाए। किसी भूखे की थाली भरना, किसी निर्धन छात्र की पढ़ाई का खर्च उठाना, किसी रोगी का उपचार कराना, किसी असहाय परिवार का सहारा बनना—यही वह दान है, जो केवल पुण्य नहीं, बल्कि समाज को भी मजबूत बनाता है।
यह केवल व्यवस्था का नहीं, समाज की संवेदनशीलता का भी प्रश्न है...
- भगवान को नोटों की नहीं, इंसान को रोटी की जरूरत ज्यादा है।
- दानपात्र भरते रहें और गरीब की थाली खाली रहे, तो यह केवल व्यवस्था का नहीं, समाज की संवेदनशीलता का भी प्रश्न है।
- क्या धार्मिक संस्थानों में प्राप्त दान के उपयोग की पारदर्शी और सार्वजनिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
- क्या श्रद्धालुओं को प्रत्यक्ष रूप से गरीब, बीमार और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए अधिक प्रेरित नहीं किया जाना चाहिए?
- क्या धर्म का सबसे बड़ा संदेश सेवा, करुणा और मानव कल्याण नहीं है?
- क्या आस्था का सम्मान तभी पूर्ण होगा, जब उसके साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा हो?
ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग दानपात्र नहीं है...
- धर्म का उद्देश्य मनुष्य को जोड़ना है, उसकी जेब का भार बढ़ाना नहीं।
- आस्था की पवित्रता तभी सुरक्षित रहेगी, जब श्रद्धा के साथ सेवा और दान के साथ मानवता भी जुड़ेगी।
- ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग दानपात्र नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के चेहरे पर लाई गई मुस्कान है।


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