संविधान और गठबंधन राजनीति का विरोधाभास...
संविधान की दुहाई और सत्ता का गणित,आखिर जनता कब तक कीमत चुकाएगी !
भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। संविधान इसकी आत्मा है और जनादेश इसकी शक्ति। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति का एक ऐसा स्वरूप उभरकर सामने आया है, जिसने संविधान के नाम पर सत्ता के समीकरणों और राजनीतिक सौदेबाजी के बीच एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। आज देश में एक विचित्र दृश्य दिखाई देता है। कुछ राजनीतिक दल और उनके नेता संविधान की प्रतियां हाथ में लेकर घूमते हैं, संविधान बचाने के नारे लगाते हैं और स्वयं को लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे बड़ा संरक्षक बताते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या संविधान की रक्षा केवल उसकी प्रति हाथ में लेकर की जा सकती है, या फिर उसके मूल उद्देश्यों और भावनाओं का पालन करके?
संविधान और गठबंधन राजनीति का विरोधाभास
संविधान भारत में लोकतांत्रिक शासन की रूपरेखा निर्धारित करता है। वह जनता द्वारा चुनी गई सरकार को शासन चलाने का अधिकार देता है। लेकिन संविधान कहीं भी यह नहीं कहता कि सत्ता के लिए राजनीतिक दल ऐसे समझौते करें जिनका प्राथमिक उद्देश्य जनसेवा नहीं बल्कि पदों का बंटवारा हो। आज कई राज्यों में सत्ता का गणित इस प्रकार तय होता है कि एक दल को मुख्यमंत्री पद मिलेगा तो दूसरे दल को उपमुख्यमंत्री पद। कहीं दो-दो उपमुख्यमंत्री बना दिए जाते हैं, तो कहीं पहले ढाई वर्ष एक दल का मुख्यमंत्री और अगले ढाई वर्ष दूसरे दल का मुख्यमंत्री बनने का फार्मूला तैयार होता है। यह सब संवैधानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का परिणाम है।
लोकतंत्र या सत्ता प्रबंधन?
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि जनता शासन चुनती है। लेकिन जब सरकारों का गठन जनादेश की अपेक्षा राजनीतिक जोड़-तोड़ और सत्ता संतुलन पर अधिक निर्भर होने लगे, तब लोकतंत्र का स्वरूप बदलने लगता है।
मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, विशेष सलाहकार, राजनीतिक नियुक्तियां, सुरक्षा व्यवस्था, सरकारी आवास, कर्मचारियों का स्टाफ और अन्य सुविधाएं—इन सबका खर्च अंततः जनता की जेब से ही निकलता है। जब राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पद सृजित किए जाते हैं, तो उसका वित्तीय भार भी करदाताओं पर ही पड़ता है।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या शासन व्यवस्था जनता के लिए चल रही है या राजनीतिक दलों के बीच सत्ता के संतुलन के लिए?
आर्थिक बोझ की अनदेखी...
एक मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री केवल एक व्यक्ति नहीं होता; उसके साथ पूरा प्रशासनिक ढांचा जुड़ा होता है। सरकारी बंगला, सुरक्षा, वाहन, कार्यालय, स्टाफ, यात्रा और अन्य सुविधाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
यदि किसी राज्य में दो-दो उपमुख्यमंत्री बनाए जाते हैं या कार्यकाल के बीच मुख्यमंत्री बदले जाते हैं, तो इससे प्रशासनिक और वित्तीय दोनों प्रकार की लागत बढ़ती है। पूर्व मुख्यमंत्री को मिलने वाली सुविधाएं अलग जारी रहती हैं। इस प्रकार जनता के कर से प्राप्त धन का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक व्यवस्थाओं को बनाए रखने में खर्च हो सकता है। हालांकि लोकतंत्र में राजनीतिक समझौते और गठबंधन असामान्य नहीं हैं, लेकिन यह बहस अवश्य होनी चाहिए कि उनकी आर्थिक और प्रशासनिक कीमत कितनी है और उसका औचित्य क्या है।
संविधान की भावना क्या कहती है?
संविधान का उद्देश्य कुशल, जवाबदेह और जनहितकारी शासन सुनिश्चित करना है। संविधान की भावना सत्ता के विकेंद्रीकरण, जवाबदेही और लोककल्याण से जुड़ी है। यदि राजनीतिक व्यवस्थाएं केवल पदों के वितरण का माध्यम बन जाएं और जनता को उसके बदले अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श का विषय अवश्य बनता है। संविधान की वास्तविक रक्षा तब होगी जब राजनीतिक दल जनादेश का सम्मान करें, प्रशासनिक खर्चों में पारदर्शिता लाएं और सत्ता को अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी समझें।
जनता का सवाल...
देश का आम नागरिक आज महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में उसका प्रश्न बिल्कुल सीधा है,यदि राजनीतिक दल अपनी सत्ता की जरूरतों के अनुसार नए पद और नई व्यवस्थाएं बना सकते हैं, तो उनकी कीमत आखिर जनता क्यों चुकाए? लोकतंत्र में सत्ता जनता से आती है और उसी के लिए होती है। इसलिए यह आवश्यक है कि संविधान केवल राजनीतिक प्रतीक न बने, बल्कि शासन के हर निर्णय में उसकी आत्मा दिखाई दे।
संविधान की प्रतियां हाथ में लेकर घूमना आसान है, लेकिन संविधान की भावना के अनुरूप शासन चलाना कहीं अधिक कठिन। लोकतंत्र की असली परीक्षा भी वहीं होती है।


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