18 स्वास्थ्य केंद्रों को पीपीपी मॉडल पर डेवलप किया जाएगा...
तीन जिलों के 18 सरकारी स्वास्थ्य केंद्र अब निजी हाथों में सौंपे जाएंगे !
भोपाल। मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और चिकित्सा संसाधनों का किस तरह से अकाल है और चिकित्सकीय सेवाएँ किस तरह लचर ढर्रे पर चल रही हैं, इसका प्रमाण अब है, सरकार ने स्वयं दे दिया है और इसका प्रमाण है सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय। प्रदेश के 3 जिले रीवा, गुना और देवास के लगभग 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पायलट प्रोजेक्ट के तहत निजी हाथों में सौंपा जाएगा। इन 18 स्वास्थ्य केंद्रों को पीपीपी मॉडल पर डेवलप किया जाएगा, जिसके तहत डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य संसाधनों को आउटसोर्स के माध्यम से उपलब्ध कराया जाएगा।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पायलट प्रोजेक्ट के तहत निजी हाथों में सौंपा जाएगा ताकि ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हो सकें। यह निर्णय साफ दर्शाता है कि कहीं न कहीं सरकार मानती है कि निजी हाथों में सौंपने से ही स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो सकती हैं।सरकारी सिस्टम बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में फेल हो चुका है!
कैबिनेट ने फैसला लिया है कि मध्य प्रदेश के 3 जिले रीवा, गुना और देवास के लगभग 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को पायलट प्रोजेक्ट के तहत निजी हाथों में सौंपा जाएगा। इन 18 स्वास्थ्य केंद्रों को पीपीपी मॉडल पर डेवलप किया जाएगा, जिसके तहत डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य संसाधनों को आउटसोर्स के माध्यम से उपलब्ध कराया जाएगा। इस पायलट प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर ही मरीजों को उच्च स्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराना है। यदि प्रयोग सफल रहता है, तो फिर पूरे प्रदेश में यह व्यवस्था लागू की जाएगी। आपको बता दें कि वर्तमान में मध्य प्रदेश में 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। जिनमें से ज्यादातर उचित स्वास्थ्य सेवाएं देने में लचर साबित हो रहे हैं।
उपमुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल का कहना है कि प्रदेश के सीएचसी में मापदंड के अनुसार विशेषज्ञ डॉक्टरों की बेहद कमी है। केवल 75 विशेषज्ञ डॉक्टर हैं। इसी तरह मेडिकल ऑफिसर के 34% पद रिक्त हैं, जबकि प्रदेश की 72% जनसंख्या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर है। 30 बिस्तर की सीएससी में 41 पद की आवश्यकता होती है, आउटसोर्स के माध्यम से मानव संसाधन की व्यवस्था की जाएगी। एजेंसी का चयन खुली निविदा के माध्यम से होगा। 5 साल के लिए यह व्यवस्था लागू की जाएगी। यह जानकारी भी मिली है कि मंत्रियों ने इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए सुझाव दिया है कि आदिवासी क्षेत्रों से यह शुरुआत होनी चाहिए, क्योंकि वहां समस्या ज्यादा गंभीर है।
हालांकि यह व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया कराने के लिए की जा रही है, लेकिन साथ में यह व्यवस्था इस बात पर भी मुहर लगा रही है कि कहीं न कहीं प्रदेश सरकार का स्वास्थ्य विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हुआ है और अब अपनी नाकामियों के चलते ही ग्रामीण क्षेत्र के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी हाथों में देने का फैसला लिया जा रहा है। अब देखना होगा कि पायलट प्रोजेक्ट की तहत इन अठारह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर निजी एजेंसी किस तरह बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं और ग्रामीण अंचल के मरीजों को इस योजना का कितना लाभ मिलता है?


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