सिद्धांत बनाम सत्ता के इस दौर में ...
राजनीति अब विचारधारा की नहीं, बल्कि अवसरवाद की प्रयोगशाला बनती जा रही है !
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां राजनीति अब विचारधारा की नहीं, बल्कि अवसरवाद की प्रयोगशाला बनती जा रही है। चुनावों के दौरान जो नेता और पार्टियां एक-दूसरे पर तीखे हमले करते हैं, वही सत्ता के समीकरण बनते ही गले मिलते नजर आते हैं। जनता के सामने सिद्धांतों की दुहाई देने वाले ये दल, पर्दे के पीछे सत्ता की गणित में इतने लिप्त होते हैं कि उनके कथित “विरोध” की असलियत उजागर हो जाती है।
हाल ही में की राजनीति में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इस सच्चाई को फिर उजागर कर दिया है। जिन दलों को कल तक कट्टर विरोधी बताया जा रहा था, आज वे एक मंच पर आने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। यह केवल एक राज्य की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति का आईना है, जहां सिद्धांतों का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है।
राजनीतिक दलों के इस बदलते चरित्र ने मतदाताओं को सबसे अधिक भ्रमित किया है। चुनावी रैलियों में एक-दूसरे को भ्रष्ट, अयोग्य और जनविरोधी बताने वाले नेता, सत्ता की कुर्सी के लिए उसी “विरोधी” के साथ समझौता कर लेते हैं। सवाल यह है कि यदि विरोध केवल दिखावा था, तो जनता को गुमराह क्यों किया गया? और यदि विरोध वास्तविक था, तो फिर ऐसे समझौते किस नैतिकता के आधार पर किए जाते हैं?
दरअसल, यह पूरा खेल सत्ता प्राप्ति का है। लोकतंत्र में सत्ता तक पहुंचने के लिए गठबंधन कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब गठबंधन सिद्धांतों को कुचलकर केवल अवसरवाद के आधार पर बनते हैं, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। ऐसे में जनता का विश्वास डगमगाने लगता है और राजनीति के प्रति आक्रोश जन्म लेता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मतदाता केवल पार्टी के नाम या चुनावी नारों के आधार पर निर्णय न लें। उन्हें उम्मीदवार की विश्वसनीयता, उसके काम और उसके चरित्र का मूल्यांकन करना होगा। लोकतंत्र की असली ताकत जनता के वोट में है, और यदि यह वोट सोच-समझकर नहीं डाला गया, तो यही अवसरवादी राजनीति बार-बार हावी होती रहेगी।
राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, यह बात अक्सर कही जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सिद्धांतों को पूरी तरह त्याग दिया जाए। यदि राजनीति केवल सत्ता का खेल बनकर रह जाएगी, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य—जनहित, कहीं पीछे छूट जाएगा।
अब समय आ गया है कि जनता सतर्क हो, सवाल पूछे और नेताओं को जवाबदेह बनाए। क्योंकि अगर जनता जागरूक नहीं होगी, तो सत्ता के इस खेल में वही बार-बार ठगी जाती रहेगी।
@रवि यादव


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