भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,और इस लोकतंत्र की आत्मा है,संविधान...
राजनीति में अब संविधान को,केवल सत्ता पाने के लिए जेब में रखकर घूमना फैशन बना गया है !
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,और इस लोकतंत्र की आत्मा है,संविधान। यही संविधान देश के हर नागरिक को अधिकार देता है, सरकारों की सीमाएं तय करता है और सत्ता को जवाबदेह बनाता है। लेकिन विडंबना यह है कि आज जिन लोगों के कंधों पर संविधान की रक्षा का दायित्व है, वही लोग अवसर आने पर उसे अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ने और तोड़ने का प्रयास करते दिखाई देते हैं।
आज की राजनीति में संविधान का नाम केवल भाषणों और मंचों तक सीमित होता जा रहा है। नेता सार्वजनिक सभाओं में संविधान बचाने की बातें करते हैं, कानून के सम्मान का पाठ पढ़ाते हैं, लोकतंत्र की रक्षा का दावा करते हैं; लेकिन जब बात व्यक्तिगत स्वार्थ, सत्ता बचाने या राजनीतिक लाभ की आती है, तब वही संविधान सबसे पहले किनारे रख दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो संविधान अब कुछ लोगों के लिए केवल जेब में रखा जाने वाला एक प्रतीक बनकर रह गया हो, जिसका उपयोग केवल राजनीतिक सुविधा के समय किया जाता है।
देश की जनता यह सब देख रही है। वह देख रही है कि किस प्रकार दल बदलते समय नैतिकता गायब हो जाती है, किस प्रकार जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक हथियार की तरह होता है, किस प्रकार कानून की व्याख्या व्यक्ति और परिस्थिति देखकर बदल दी जाती है। विपक्ष में रहते हुए जो नेता किसी फैसले को लोकतंत्र की हत्या बताते हैं, सत्ता में आते ही वही कदम “संवैधानिक प्रक्रिया” घोषित कर देते हैं। यह दोहरा चरित्र लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
सबसे गंभीर बात यह है कि आज राजनीति में सिद्धांतों की जगह स्वार्थ ने ले ली है। संविधान की शपथ लेने वाले ही कई बार संविधान की मूल भावना समानता, निष्पक्षता और जवाबदेही को कमजोर करते दिखाई देते हैं। कानून का पालन आम नागरिक से अपेक्षित है, लेकिन प्रभावशाली लोगों के लिए कानून का व्यवहार अलग नजर आता है। यही कारण है कि आमजन के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है।
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है, संस्थाओं का सम्मान, कानून के प्रति निष्ठा और सत्ता के प्रति संयम। यदि नेता स्वयं को संविधान, कानून और देश से ऊपर मानने लगें, तो यह प्रवृत्ति किसी भी राष्ट्र को अंदर से कमजोर कर सकती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता अहंकार में डूबी है, तब-तब जनता ने परिवर्तन का मार्ग चुना है।
आज आवश्यकता केवल संविधान की दुहाई देने की नहीं, बल्कि उसे व्यवहार में उतारने की है। संविधान किताबों में सुरक्षित रहकर लोकतंत्र नहीं बचा सकता; उसे राजनीतिक आचरण में जीवित रखना होगा। जो लोग स्वयं संविधान की मर्यादा नहीं समझते, वे समाज को लोकतंत्र का पाठ नहीं पढ़ा सकते।
ऐसे समय में देश की युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी सबसे अधिक बढ़ जाती है। युवाओं को किसी दल या व्यक्ति विशेष के अंध समर्थन से ऊपर उठकर संविधान की वास्तविक भावना को समझना होगा। उन्हें प्रश्न पूछने होंगे, जवाब मांगने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि सत्ता में बैठा कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर न हो। क्योंकि यदि लोकतंत्र की रक्षा केवल नेताओं पर छोड़ दी गई, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल संविधान की किताबें मिलेंगी, उसका वास्तविक स्वरूप नहीं। भारत का भविष्य केवल मजबूत सरकारों से नहीं, बल्कि मजबूत संवैधानिक मूल्यों से सुरक्षित होगा।
@रवि यादव


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