G News 24 : दतिया की खाली सीट और नरोत्तम की वापसी का हिसाब !

 रात का न्याय, दिन की राजनीति...

दतिया की खाली सीट और नरोत्तम की वापसी का हिसाब !

मध्य प्रदेश में सियासत अब दिन में नहीं, रात को होती है। 2 अप्रैल की देर रात जब भोपाल सो रहा था, तब विधानसभा सचिवालय के दरवाज़े खुले। प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा ने रात साढ़े दस बजे कार्यालय पहुँचकर एक अधिसूचना जारी की, और दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई। जो काम सुबह होता, वो रात को हुआ। और इसी 'रात' ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया।

27 साल पुराना मामला, 2026 में फैसला...

आरोप पुराना है। 1998 में जब भारती दतिया जिला सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक के अध्यक्ष थे, तब उन पर अपने पिता के नाम की एफडी के दस्तावेजों में हेराफेरी का इल्ज़ाम लगा। ब्याज दरें घटीं, लेकिन भारती ने बैंक कर्मचारी के साथ मिलकर कागज़ात में काट-छाँट कर पुरानी ऊँची दर का फायदा लेते रहे। मामला 2011 में उजागर हुआ। और फिर अदालतों का लंबा सफ़र शुरू हुआ, इतना लंबा कि पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट को खुद यह मामला दिल्ली स्थानांतरित करना पड़ा, ताकि निष्पक्ष सुनवाई हो सके।

2 अप्रैल 2026 को दिल्ली की विशेष एमपी-एमएलए अदालत ने राजेंद्र भारती को तीन साल की सज़ा और एक लाख रुपये जुर्माना सुनाया। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत दो साल या अधिक की सज़ा मिलते ही सदस्यता स्वतः समाप्त होती है। क़ानून तो ठीक है, लेकिन सवाल यह है कि रात को इतनी जल्दी क्यों?

यहाँ राजेंद्र भारती की कहानी ख़त्म नहीं होती, बल्कि नरोत्तम मिश्रा की शुरू होती है...

2023 के विधानसभा चुनाव में राजेंद्र भारती ने भाजपा के कद्दावर नेता और तत्कालीन गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को उन्हीं के गढ़ दतिया में धूल चटाई थी। यह भाजपा के लिए केवल एक सीट की हार नहीं थी, यह एक बड़े नेता का अपमान था।

अब दतिया की सीट खाली है। उपचुनाव होंगे। और राजनीतिक गलियारों में एक ही नाम गूँज रहा है, नरोत्तम मिश्रा। जो 2023 में हारे, वो 2026 में जीतकर 'मोहन कैबिनेट' में वापसी का सपना देख रहे हैं।तो क्या रात को सचिवालय खोलने की असली वजह क़ानून था या मिश्रा जी को जल्द से जल्द रास्ता देना?

कांग्रेस का सवाल, भाजपा का जवाब

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी देर रात सचिवालय पहुँच गए। उन्होंने इस पूरी कार्रवाई को लोकतंत्र का मखौल बताया और आरोप लगाया कि यह भाजपा सरकार के इशारे पर की गई असंवैधानिक कार्रवाई है। उधर सरकार का तर्क है,कि क़ानूनी सलाहकारों से सलाह ली, सब कुछ वैधानिक है।

लेकिन इसी प्रदेश में विधायक लोधी का उदाहरण सामने है,ऐसी ही कार्रवाई हुई, और लोधी हाईकोर्ट से स्टे लेकर वापस विधायक बन गए। क्या दतिया में भी यही होगा? भारती के पास 60 दिन हैं। हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से स्टे मिला तो सदस्यता बहाल, नहीं मिला तो 6 महीने में उपचुनाव।

दतिया का मामला सिर्फ़ एक विधायक की सदस्यता का नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जहाँ अदालत के फ़ैसले के बाद भी असली जंग शुरू होती है,कोर्ट से नहीं, सत्ता के गलियारों से। रात को जो खेल हुआ, उसका परिणाम दिन में नही, दतिया के अगले चुनाव में दिखेगा।

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