G News 24 : पीतांबरा इस्टेट एफ-ब्लॉक के मामले में न.नि. द्वारा निर्धारित कानूनी प्रावधानों की उड़ाई गई धज्जियां !

 'सत्ता-सेठ' के गठजोड़ ने निगला बच्चों का पार्क,न.नि.के नियम सिर्फ कागजों तक रह गए सीमित...

पीतांबरा इस्टेट एफ-ब्लॉक के मामले में न.नि. द्वारा निर्धारित कानूनी प्रावधानों की उड़ाई गई धज्जियां !

ग्वालियर। शहर के वार्ड 21 (क्षेत्रीय कार्यालय 10) के तहत आने वाली पीतांबरा इस्टेट एफ-ब्लॉक (इंद्रमणि नगर) में इन दिनों एक ऐसा खेल चल रहा है जिसने ग्वालियर के नगर नियोजन (Town Planning) के दावों की पोल खोल दी है। एक रसूखदार बिल्डर और राजनेता के संरक्षण में कॉलोनी के आरक्षित 'पार्क' को भूखंड बनाकर बेच दिया गया है। 

कानून की सरेआम अवहेलना

नगर निगम के नगर निवेशक महेंद्र अग्रवाल और भवन अधिकारी यशवंत मैकले की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर इन कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन है:

  • मध्य प्रदेश नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 की धारा 291/292: किसी भी कॉलोनी के स्वीकृत ले-आउट (Layout) में बदलाव करना या सार्वजनिक उपयोग (पार्क/सड़क) की जमीन को निजी स्वार्थ के लिए बेचना एक दंडनीय अपराध है।
  • मध्य प्रदेश नगर पालिका (कॉलोनाइजर का पंजीकरण, निर्बंधन तथा शर्तें) नियम, 1998: इस नियम के तहत बिल्डर को कुल भूमि का एक निश्चित हिस्सा सार्वजनिक पार्क और सुविधाओं के लिए छोड़ना अनिवार्य है। इसे बेचना 'धोखाधड़ी' की श्रेणी में आता है।
  • IPC की धारा 420 एवं 467/468: रजिस्ट्री में प्लॉट नंबर कुछ और दिखाना और कब्जा पार्क की जमीन पर देना स्पष्ट रूप से 'कूटरचना' और 'जालसाजी' है।

अधिकारियों की 'मौन स्वीकृति' या इसकी उन्हें भनक ही नहीं लगी !

हैरानी की बात यह है कि जहाँ आम आदमी को एक कमरा बनाने पर निगम का अमला नोटिस थमा देता है, वहीं पीतांबरा इस्टेट में अवैध निर्माण धड़ल्ले से जारी है। क्षेत्रीय कार्यालय 10 के जिम्मेदार अधिकारी इस ओर से आंखें मूंद कर बैठे हैं। क्या यह माना जाए कि राजनेता और नगर सेठ के प्रभाव में आकर अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों की तिलांजलि दे दी है?

जनता की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच और ध्वस्तीकरण की कारवाही हो ...

कॉलोनी के निवासियों का कहना है कि पार्क की जमीन पर हो रहे इस अवैध अतिक्रमण को तुरंत रोका जाए। यदि नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारी और जिला प्रशासन इस पर संज्ञान नहीं लेते हैं, तो यह मामला उच्च न्यायालय (High Court) तक जा सकता है, जहाँ अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी।

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