G News 24 : इस्तीफे की राजनीति में सिर्फ नेताओं का है फायदा,तो फिर आम आदमी क्यों बन रहा है मोहरा !

 मुद्दे का समाधान संवैधानिक संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया से होना है, उसके लिए सड़क  पर हंगामा... 

इस्तीफे की राजनीति में सिर्फ नेताओं का है फायदा,तो फिर आम आदमी क्यों बन रहा है  मोहरा !

देश में इन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनावी मतदाता सूची के SIR (Special Intensive Revision) को लेकर राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन तेज हैं। विपक्षी दल और कुछ संगठन इसे लोकतंत्र तथा मतदाता अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बता रहे हैं और इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग इन आरोपों और प्रक्रिया को लेकर अपना पक्ष रख रहा है।आम जनता से सवाल,जिस मुद्दे का समाधान संवैधानिक संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया से होना है, उसके लिए सड़क पर उतरकर अपना समय और ऊर्जा क्यों गंवाएं?

लोकतंत्र में विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। सरकार, चुनाव आयोग अथवा किसी भी संवैधानिक संस्था से सवाल पूछना भी लोकतंत्र की स्वस्थ प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल आम आदमी से है...

क्या हर राजनीतिक विरोध में आम जनता का सड़क पर उतरना जरूरी है?

क्या एक मजदूर, किसान, दुकानदार, नौकरीपेशा व्यक्ति, विद्यार्थी या छोटा व्यापारी अपना रोजमर्रा का काम छोड़कर किसी राजनीतिक दल की मांग के समर्थन में आंदोलन करे?

आखिर उसका सीधा हित क्या है?

यदि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के आचरण पर सवाल हैं, तो उसके लिए देश में संसद, न्यायपालिका, संवैधानिक प्रक्रियाएं और कानून मौजूद हैं। किसी अधिकारी के इस्तीफे की मांग करना राजनीतिक दलों का अधिकार हो सकता है, लेकिन उस मांग को सफल बनाने के लिए आम नागरिक को राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बनाना क्या वास्तव में उसकी आवश्यकता है?

जनता को भावनाओं से नहीं, तथ्यों से फैसला करना चाहिए...

SIR को लेकर विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव से वास्तविक मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करना आवश्यक है। इस विवाद में कौन-सा दावा कितना सही है, इसका फैसला तथ्यों, दस्तावेजों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए,सिर्फ नारों और राजनीतिक भाषणों से नहीं।

आम नागरिक को सबसे ज्यादा सावधान रहने की आवश्यकता है...

किसी भी राजनीतिक दल के आह्वान पर सड़क पर उतरने से पहले तीन सवाल जरूर पूछिए—

  1. पहला -मुद्दा वास्तव में मेरा है या किसी राजनीतिक दल की रणनीति का हिस्सा है?
  2. दूसरा-मेरे आंदोलन में शामिल होने से मेरे अधिकार और हित मजबूत होंगे या केवल किसी राजनीतिक अभियान को ताकत मिलेगी?
  3. तीसरा-क्या इस विषय के समाधान के लिए संवैधानिक और कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं?

राजनीति करें नेता, लोकतंत्र की चिंता करे जनता !!!

राजनीतिक दलों का काम है आंदोलन करना, सरकार पर दबाव बनाना, चुनाव आयोग से सवाल करना और न्यायालय का दरवाजा खटखटाना। लेकिन आम नागरिक की भूमिका केवल भीड़ बन जाना नहीं है। जनता की असली ताकत उसका विवेक, उसका वोट और उसका सवाल पूछने का अधिकार है।

यदि किसी को लगता है कि उसका नाम मतदाता सूची से गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे अपनी व्यक्तिगत स्थिति की जांच करनी चाहिए और उपलब्ध शिकायत एवं अपील की प्रक्रिया का इस्तेमाल करना चाहिए। इसी तरह यदि किसी राजनीतिक दल के आरोप सही हैं, तो उन्हें प्रमाण, दस्तावेज और संस्थागत जांच के माध्यम से सामने लाना चाहिए।

विरोध हो, लेकिन देश का काम क्यों रुके?

भारत पहले ही बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, रोजगार और आर्थिक विकास जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में यदि हर राजनीतिक विवाद को सड़क के आंदोलन में बदल दिया जाएगा और आम नागरिक को भी उसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाएगा, तो नुकसान अंततः उसी आम नागरिक का होगा।

  • दुकान बंद होगी तो दुकानदार का नुकसान होगा।
  • काम छूटेगा तो मजदूर की मजदूरी जाएगी।
  • यात्रा बाधित होगी तो आम यात्री परेशान होगा।
  • बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी तो नुकसान परिवार का होगा।
  • और सरकारी व्यवस्था में लगातार राजनीतिक टकराव बढ़ेगा तो उसका प्रभाव विकास और प्रशासन पर भी पड़ सकता है।

आम आदमी किसी राजनीतिक दल का मोहरा नहीं...!

राजनीति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जनता राजनीति की संपत्ति नहीं है।किसी भी दल को यह अधिकार नहीं कि वह जनता की भावनाओं को अपने राजनीतिक लक्ष्य के लिए इस्तेमाल करे। 

  • जनता को भी यह समझना होगा कि हर नारे के पीछे चलना नागरिक कर्तव्य नहीं है।
  • यदि मुद्दा आपके मताधिकार से सीधे जुड़ा है,तो जागरूक रहिए।
  • यदि आपका नाम मतदाता सूची में है या नहीं,तो जांचिए।
  • यदि कोई गलती है,तो शिकायत कीजिए।
  • यदि किसी संस्था के निर्णय पर संदेह है,तो तथ्य मांगिए।
  • यदि आरोप गंभीर हैं,तो जांच और न्यायिक प्रक्रिया की मांग कीजिए।
  • लेकिन बिना तथ्य जाने केवल राजनीतिक नारे के आधार पर आंदोलन का हिस्सा बन जाना लोकतांत्रिक जागरूकता नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा बन सकता है।

जनता के लिए संदेश...

  1. लोकतंत्र में चुप रहना जरूरी नहीं है, लेकिन सोच-समझकर बोलना और कदम उठाना जरूरी है।
  2. आप किसी भी दल के समर्थक हों या किसी के नहीं,आप सबसे पहले भारत के नागरिक हैं।
  3. इसलिए किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले यह मत देखिए कि कौन बुला रहा है।
  4. यह देखिए कि मुद्दा क्या है, प्रमाण क्या हैं और समाधान का संवैधानिक रास्ता क्या है।
  5. देश की प्रगति के लिए जनता का जागरूक होना जरूरी है, हर राजनीतिक संघर्ष में जनता का सड़क पर उतरना नहीं। सवाल पूछिए, तथ्य मांगिए, अपने अधिकारों की रक्षा कीजिए—लेकिन अपने विवेक को किसी राजनीतिक नारे के हवाले मत कीजिए।

नेताओं का काम आंदोलन करना है...

आम आदमी का काम अपने परिवार, रोजगार और देश का भविष्य संभालना है।

हर आंदोलन में भीड़ बढ़ाना नागरिक कर्तव्य नहीं,किस मुद्दे पर खड़ा होना है, यह तय करना नागरिक विवेक है।”


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