G News 24 : नौकरी की कमी का दोष आरक्षित वर्ग पर मढ़ना आसान है, लेकिन क्या यही वास्तविकता है !

 आरक्षण बनाम बेरोजगारी...

नौकरी की कमी का दोष आरक्षित वर्ग पर मढ़ना आसान है, लेकिन क्या यही वास्तविकता है !

भारत में आरक्षण का सवाल जब भी उठता है, बहस अक्सर एक ही दिशा में पहुंच जाती है“आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग, विशेषकर सवर्ण समाज के युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं।” लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत की बेरोजगारी का वास्तविक कारण आरक्षण है?

अगर आरक्षण ही बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण है, तो फिर...

  1. एक दूसरा सवाल भी उतनी ही गंभीरता से पूछा जाना चाहिए, आरक्षित वर्ग के लाखों युवा आज भी बेरोजगार क्यों हैं?
  2. क्या आरक्षित वर्ग के हर युवा को सरकारी नौकरी मिल रही है? 
  3. क्या आरक्षण का लाभ मिलने मात्र से नौकरी सुनिश्चित हो जाती है? यदि ऐसा नहीं है, तो फिर बेरोजगारी की पूरी समस्या का ठीकरा आरक्षण पर क्यों फोड़ा जाता है?

नौकरी कम हैं या आरक्षण ज्यादा है?

भारत की वास्तविक समस्या केवल आरक्षण नहीं, बल्कि रोजगार के अवसरों की पर्याप्त उपलब्धता है।सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है। प्रतियोगिता अत्यधिक है। लाखों युवा एक-एक पद के लिए परीक्षा देते हैं। ऐसे में चयन न होने की निराशा को किसी एक सामाजिक वर्ग के माथे मढ़ देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता।एक अभ्यर्थी के असफल होने का अर्थ यह नहीं कि किसी दूसरे वर्ग ने उसकी नौकरी “छीन” ली।

असल सवाल यह होना चाहिए कि ...

  1. हर साल जितने युवा रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं, उनके अनुपात में रोजगार के अवसर कितने पैदा हो रहे हैं?
  2. यही वह सवाल है जिससे राजनीतिक और सामाजिक बहस बार-बार बचती दिखाई देती है।

आरक्षण किसी एक वर्ग की कृपा नहीं, संवैधानिक व्यवस्था है...

  • भारत का संविधान सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को अवसर उपलब्ध कराने के लिए विशेष प्रावधान करता है।
  • इसलिए आरक्षण को किसी वर्ग के खिलाफ व्यक्तिगत दुश्मनी की तरह देखना संविधान की मूल भावना को समझने में चूक होगी।
  • लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि आरक्षण की नीति पर तथ्य आधारित समीक्षा और स्वस्थ बहस होती रहे।
  • किस वर्ग को कितना लाभ मिला? कौन-से समुदाय अभी भी पीछे हैं? आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से किन लोगों तक पहुंच रहा है? शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसरों में वास्तविक असमानता कितनी है?
  • इन सवालों के जवाब आंकड़ों और पारदर्शी अध्ययन से आने चाहिए, न कि सोशल मीडिया के नारों से।

क्या सामान्य वर्ग की बेरोजगारी का कारण केवल आरक्षण है?

यदि कोई कहता है कि सामान्य वर्ग के युवाओं को नौकरी इसलिए नहीं मिल रही क्योंकि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी नौकरी ले जा रहे हैं, तो उससे भी एक सरल सवाल पूछा जाना चाहिए...

क्या पर्याप्त संख्या में नौकरियां मौजूद हैं?

यदि किसी भर्ती में 100 पद हैं और लाखों आवेदन आते हैं, तो बाकी अभ्यर्थियों के बेरोजगार रहने का कारण केवल आरक्षण नहीं हो सकता।

और यदि आरक्षण समाप्त भी कर दिया जाए, तो क्या 100 पद अचानक 10,000 पद बन जाएंगे? नहीं।

इसलिए बेरोजगारी की मूल समस्या रोजगार सृजन, शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल, उद्योगों के विस्तार और सरकारी भर्ती की गति से जुड़ी हुई है।

फिर आरक्षण के नाम पर समाज क्यों लड़ता है?

यहीं से असली चिंता शुरू होती है...

जब बेरोजगार युवा अपने ही जैसे बेरोजगार दूसरे युवा को अपना प्रतिस्पर्धी और शत्रु समझने लगता है, तब समस्या केवल रोजगार की नहीं रहती,वह सामाजिक विभाजन का रूप ले लेती है।

एक तरफ सामान्य वर्ग का बेरोजगार युवा है, दूसरी तरफ आरक्षित वर्ग का बेरोजगार युवा।

दोनों परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। दोनों रोजगार चाहते हैं। दोनों अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं। दोनों व्यवस्था से अवसर चाहते हैं।

फिर दोनों एक-दूसरे के दुश्मन क्यों बनें?क्या दोनों का साझा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ...

  • देश में रोजगार के पर्याप्त अवसर क्यों नहीं पैदा हो रहे?
  • सवाल सरकार से भी होना चाहिए
  • सरकारी रिक्तियां समय पर क्यों नहीं भरी जातीं?
  • भर्ती परीक्षाओं में देरी क्यों होती है?
  • युवाओं को रोजगार देने के लिए पर्याप्त नए अवसर क्यों नहीं पैदा होते?

निजी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण और सम्मानजनक रोजगार कैसे बढ़े?

  • शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कैसे कम होगी?
  • क्या देश की आर्थिक वृद्धि के अनुपात में रोजगार भी बढ़ रहा है?
  • इन सवालों से बचकर केवल आरक्षण को निशाना बनाना बेरोजगारी की वास्तविक समस्या से ध्यान भटकाना हो सकता है।

सत्ता और व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का सवाल भी जरूरी...

यदि यह दावा किया जाता है कि आरक्षण के कारण सामान्य वर्ग को हर क्षेत्र में अवसर नहीं मिल रहे, तो फिर इसका जवाब भावनात्मक नारों से नहीं बल्कि आंकड़ों से दिया जाना चाहिए।

देश के महत्वपूर्ण मंत्रालयों, उच्च प्रशासनिक पदों, सार्वजनिक संस्थानों, न्यायिक व्यवस्था, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में सामाजिक प्रतिनिधित्व की वास्तविक स्थिति क्या है?

इसका समाधान अनुमान नहीं, पारदर्शी आंकड़े और सार्वजनिक रिपोर्ट हैं।

जरूरत हो तो सूचना के अधिकार के माध्यम से संबंधित विभागों से जानकारी मांगी जानी चाहिए और फिर समाज के सामने तथ्य रखे जाने चाहिए।

क्यों न बहस आंकड़ों पर हो?

संविधान पर सवाल उठाने से पहले संविधान को समझना होगा,भारत का संविधान केवल किसी एक वर्ग का दस्तावेज नहीं है। वह हर भारतीय के अधिकारों और स्वतंत्रता की आधारशिला है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर समानता के अधिकार तक और न्याय पाने के अधिकार से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन तक,हर नागरिक संविधान से मिले अधिकारों का उपयोग करता है।

इसलिए संविधान और उसके निर्माताओं को लेकर असहमति या आलोचना का अधिकार लोकतंत्र में है, लेकिन ऐतिहासिक और संवैधानिक योगदान को अपमानित करने वाली भाषा समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ती है।

संविधान की आलोचना हो सकती है, सुधार की मांग हो सकती है, आरक्षण की समीक्षा की मांग हो सकती है—लेकिन यह बहस तथ्य, तर्क और संवैधानिक मर्यादा के भीतर होनी चाहिए।

जाति की दीवारें किसके हित में हैं?सबसे बड़ा सवाल यही है...

भारत को आगे बढ़ना है तो क्या हमें जाति की पहचान को और मजबूत करना चाहिए या नागरिक की पहचान को?

क्या हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि...“तुम किस जाति से हो?”या फिर...

  • “तुम्हारे पास क्या योग्यता है, तुम्हें क्या अवसर चाहिए और देश के विकास में तुम क्या योगदान दे सकते हो?”
  • जातीय असमानता की ऐतिहासिक वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन उसका समाधान भी सामाजिक संघर्ष को स्थायी बनाना नहीं हो सकता।
  • हिंदू समाज हो या भारतीय समाज,उसकी शक्ति उसकी विविधता में है। यदि सामाजिक समूह एक-दूसरे के खिलाफ खड़े कर दिए गए तो नुकसान किसी एक जाति का नहीं, पूरे देश का होगा।

आरक्षण पर बहस हो,लेकिन ईमानदार बहस हो...

  • आरक्षण की समीक्षा चाहिए तो हो।
  • आरक्षण के लाभार्थियों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अध्ययन होना चाहिए।
  • क्रीमी लेयर, आर्थिक पिछड़ापन, शिक्षा, अवसर और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे विषयों पर व्यापक राष्ट्रीय बहस हो।

लेकिन एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—...

  1. आरक्षण की आलोचना और आरक्षित वर्ग के व्यक्ति का अपमान,दो अलग बातें हैं।
  2. आरक्षण की नीति पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है।
  3. लेकिन किसी गरीब, बेरोजगार या मेहनतकश व्यक्ति को केवल उसकी जाति के कारण यह कहना कि “तुम्हारी वजह से मेरी नौकरी गई”, न तो तथ्यपूर्ण है और न ही सामाजिक न्याय की दिशा में कोई कदम।

देश के युवाओं से हमारा सवाल है...

अगर सामने वाला भी बेरोजगार है और आप भी बेरोजगार हैं, तो आपका असली संघर्ष किससे है,एक-दूसरे से या उस व्यवस्था से जो पर्याप्त अवसर पैदा नहीं कर पा रही? अगर नौकरी 100 हैं और उम्मीदवार 1 लाख, तो समस्या केवल यह नहीं कि किसे नौकरी मिली।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि 99,900 युवाओं के लिए अवसर कहां हैं?

  • यही सवाल हमें जातीय टकराव से निकालकर रोजगार और विकास की वास्तविक बहस में ले जा सकता है।
  • आरक्षण पर बहस बंद नहीं होनी चाहिए,लेकिन आरक्षण को बेरोजगारी का एकमात्र कारण बताने वाली राजनीति भी बंद होनी चाहिए।

जब भारत का युवा बेरोजगार होता है,तब उसके हाथ में जाति का झंडा नहीं, रोजगार और सम्मानजनक भविष्य की उम्मीद होनी चाहिए।

बेरोजगार दो युवा हैं,एक सामान्य वर्ग का, दूसरा आरक्षित वर्ग का...

  • दोनों के पास नौकरी नहीं है।
  • फिर भी दोनों को समझाया जा रहा है कि तुम्हारा दुश्मन सामने बैठा दूसरा बेरोजगार है।
  • सवाल यह है,इस लड़ाई में नौकरी किसे मिलेगी और फायदा किसका होगा?”

पूछता है भारत...

  • बेरोजगारी के आंकड़ों पर राष्ट्रीय बहस कब होगी?
  • सरकारी रिक्तियां कब समय पर भरेंगी?
  • रोजगार के अवसर बढ़ाने की जवाबदेही कौन लेगा?
  • और कब हमारा युवा जाति के बजाय अपने भविष्य के लिए सवाल पूछेगा?


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