G News 24 : विपक्ष का एजेंडा:झूठ फैलाओ,संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाओ और युवाओं को सड़कों पर उतार दो !


 शिकायतों की राजनीति नहीं ये है सत्ता परिवर्तन की साजिश !

विपक्ष का एजेंडा:झूठ फैलाओ,संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाओ और युवाओं को सड़कों पर उतार दो !

लेकिन विपक्षी शायद ये भूल गए हैं,देश चलाना है तो विकल्प दीजिए,

इस्तीफे मांगने और हंगामा करने से सत्ता नहीं मिलती!

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार है। सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों का विरोध करना और उसके निर्णयों को चुनौती देना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि जब राजनीति का केंद्र जनसमस्याओं के समाधान के बजाय आरोप-प्रत्यारोप, इस्तीफों की मांग, संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल और सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन बन जाए, तब इसे लोकतंत्र की मजबूती माना जाए या राजनीतिक हताशा का प्रदर्शन?

आज देश की राजनीति में एक बड़ा सवाल यही है कि क्या विपक्ष जनता के सामने कोई ठोस विकल्प प्रस्तुत कर रहा है, अथवा उसकी राजनीति का उद्देश्य केवल वर्तमान सरकार को घेरना और किसी भी तरह सत्ता परिवर्तन का माहौल तैयार करना रह गया है?

कांग्रेस हो या कोई नया राजनीतिक संगठन, यदि उनके पास सरकार के विरुद्ध ठोस तथ्य हैं तो उन्हें जनता और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। लोकतंत्र में आरोप लगाने से अधिक महत्वपूर्ण है आरोपों को प्रमाणित करना और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना।

सवाल यह नहीं कि विपक्ष सरकार का विरोध क्यों करता है, सवाल यह है कि विरोध के नाम पर देश की व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश आखिर किसके हित में है?

विपक्ष की शिकायतें अनेक हैं,लेकिन इनके पास समाधान एक का भी नहीं !

राजनीति में असहमति स्वाभाविक है। वर्तमान सरकार से हर व्यक्ति संतुष्ट हो, यह आवश्यक नहीं। किसी नागरिक को महंगाई की शिकायत हो सकती है, किसी को बेरोजगारी की, किसी को सरकारी नीति से असहमति हो सकती है और किसी को अपने राजनीतिक विचारों के कारण सरकार पसंद न हो। लेकिन सरकार से असंतुष्ट होना और देश की व्यवस्था को अस्थिर करने का प्रयास करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

किसी भी राजनीतिक दल को जनता के बीच जाकर अपनी बात रखने, आंदोलन करने और सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार है। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श बार-बार संस्थाओं के प्रमुखों के इस्तीफे की मांग तक सिमट जाए, तब यह पूछना जरूरी हो जाता है कि आखिर देश की व्यवस्थाएं चलेंगी कैसे?

यदि किसी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल है तो उसके समाधान के लिए कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाएं मौजूद हैं। यदि किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई पर आपत्ति है तो उसे न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। यदि किसी सरकारी निर्णय से असहमति है तो उसके विरुद्ध लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाई जा सकती है।

लेकिन हर असहमति का अंतिम निष्कर्ष इस्तीफा ही क्यों?

क्या लोकतंत्र का अर्थ यह है कि जो अधिकारी, संस्था या संवैधानिक पदाधिकारी किसी राजनीतिक दल की अपेक्षाओं के अनुरूप निर्णय न ले, उसे तत्काल पद छोड़ देना चाहिए? यदि यही राजनीति का सिद्धांत बन गया तो देश की संस्थाओं की स्वतंत्रता और स्थिरता का क्या होगा?

कॉकरोच पार्टी की राजनीति,विरोध के नाम पर व्यवस्था को चुनौती?

राजनीतिक गलियारों में कुछ नए संगठनों और आंदोलनों को लेकर भी बहस चल रही है। ऐसे संगठनों के समर्थक उन्हें जनता की आवाज बताते हैं, जबकि उनके आलोचक उनकी कार्यशैली और राजनीतिक उद्देश्यों पर सवाल उठाते हैं। यहां एक कथित संगठन को लेकर व्यंग्यात्मक रूप से इस्तेमाल किए जा रहे नाम 'कॉकरोच पार्टी' के संदर्भ में भी कुछ प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

यदि कोई संगठन स्वयं को राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है, तो उसे सबसे पहले अपनी पहचान, संगठनात्मक स्वरूप, वैधानिक स्थिति और राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट करने चाहिए। यदि उसके पंजीकरण को लेकर कोई दावा किया जा रहा है, तो उसकी पुष्टि निर्वाचन आयोग के आधिकारिक अभिलेखों से होनी चाहिए। केवल आरोप या व्यंग्य के आधार पर किसी संगठन की कानूनी स्थिति को अंतिम रूप से तय नहीं किया जा सकता।लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है। क्या किसी संगठन को केवल इसलिए लोकतांत्रिक आंदोलन का नाम दे दिया जाना चाहिए क्योंकि वह सरकार के विरोध में नारे लगाता है?

क्या जनता के नाम पर राजनीति करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि उसकी मांगें क्या हैं, उसके समाधान क्या हैं और देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा तथा विकास के लिए उसका अपना रोडमैप क्या है?

यदि किसी संगठन के पास केवल विरोध है, लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं; केवल आरोप हैं, लेकिन प्रमाण नहीं; केवल इस्तीफों की मांग है, लेकिन व्यवस्था चलाने की योजना नहीं, तो जनता को उसके राजनीतिक दावों की समीक्षा अवश्य करनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी संगठन की परीक्षा उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके विचारों, तथ्यों, कार्यशैली और जवाबदेही से होनी चाहिए।

संवैधानिक संस्थाएं किसी दल की निजी संपत्ति नहीं, देश की धरोहर हैं!

भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। इसकी मजबूती उन संस्थाओं पर भी निर्भर करती है, जो संविधान और कानून के दायरे में अपनी जिम्मेदारियां निभाती हैं।

चुनाव आयोग, न्यायपालिका, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, पुलिस और अन्य संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा सकते हैं। किसी संस्था से गलती हो तो उसकी आलोचना भी होनी चाहिए और जहां आवश्यक हो, वहां सुधार तथा जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। लेकिन आलोचना और संस्थाओं को बदनाम करने के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है।

यदि किसी चुनाव में गड़बड़ी का आरोप है तो सबूत सामने आने चाहिए। यदि किसी जांच में पक्षपात का आरोप है तो तथ्यों के आधार पर उसकी जांच होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसके विरुद्ध निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन बिना पर्याप्त प्रमाण के पूरे संस्थागत ढांचे को अविश्वसनीय बताना क्या जनता के मन में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अनावश्यक अविश्वास पैदा नहीं कर सकता?

इसी तरह भारतीय सेना और सुरक्षा बलों की भूमिका पर चर्चा करते समय भी तथ्य, जिम्मेदारी और राष्ट्रीय हित का ध्यान रखना आवश्यक है।

सेना, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की जवाबदेही पर सवाल उठाना निषिद्ध नहीं है। लेकिन किसी भी संस्था की आलोचना तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए।

संस्थाओं से सवाल पूछना लोकतंत्र है, लेकिन सवालों के नाम पर हर संस्था को कटघरे में खड़ा कर देना अपने आप में लोकतांत्रिक जिम्मेदारी नहीं बन जाता।

देश की संस्थाएं किसी एक सरकार, दल या नेता की नहीं हैं। वे देश की जनता की हैं। आज एक दल सत्ता में है, कल दूसरा आ सकता है; लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का महत्व हर सरकार के लिए समान रहना चाहिए।

राहुल गांधी और विपक्ष आरोपों के साथ प्रमाण और समाधान भी दीजिए!

विपक्ष के बड़े नेताओं को यह समझना होगा कि उनकी कही गई हर बात का व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव पड़ता है। यदि कोई नेता चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, किसी संवैधानिक पदाधिकारी पर आरोप लगाता है या किसी संस्था की निष्पक्षता पर संदेह व्यक्त करता है, तो जनता उससे प्रमाण और स्पष्टीकरण की अपेक्षा करती है।

  • राहुल गांधी हों या कोई अन्य विपक्षी नेता, किसी को भी सवाल पूछने से रोका नहीं जाना चाहिए। लेकिन सवाल पूछने का अधिकार किसी को तथ्यों से परे जाकर निष्कर्ष घोषित करने का अधिकार नहीं देता।
  • यदि वोट चोरी हुई है तो उसके प्रमाण प्रस्तुत कीजिए। यदि चुनाव प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं तो उन्हें स्पष्ट कीजिए। यदि कोई अधिकारी अपने कर्तव्य से विमुख हुआ है तो उसके विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया अपनाइए।
  • यदि आरोप लगाए जाएं, संस्थाओं की निष्पक्षता पर लगातार संदेह पैदा किया जाए और प्रमाण मांगने पर राजनीतिक बयानबाजी ही सामने आए, तो जनता को भी सवाल पूछने का अधिकार है।
  • आखिर आरोप लगाने वाले की जवाबदेही कौन तय करेगा? क्या राजनीति में केवल आरोपित व्यक्ति या संस्था को ही प्रमाण देने होंगे, आरोप लगाने वाला किसी जवाबदेही से मुक्त रहेगा? यह सिद्धांत सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
  • विपक्ष की जिम्मेदारी केवल सत्ता की कमियां गिनाना नहीं है। उसे यह भी बताना चाहिए कि यदि उसे शासन का अवसर मिला तो वह उन कमियों को दूर कैसे करेगा।
  • जनता को केवल यह जानने में रुचि नहीं है कि कौन-सा नेता किसका इस्तीफा मांग रहा है। जनता यह भी जानना चाहती है कि उसके बच्चों को रोजगार कौन देगा, शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी, महंगाई से राहत कैसे मिलेगी और देश के विकास को गति कैसे मिलेगी।

हर अधिकारी का इस्तीफा मांगेंगे तो देश की व्यवस्था कौन संभालेगा?

राजनीति में इस्तीफा मांगना आसान है, लेकिन किसी व्यवस्था को संचालित करना कठिन।कल्पना कीजिए कि किसी संस्था का प्रमुख विपक्ष की मांग पर इस्तीफा दे देता है। उसके बाद क्या होगा? क्या उससे संबंधित विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा? क्या सभी आरोप अपने आप प्रमाणित हो जाएंगे? क्या उस संस्था के प्रति जनता का विश्वास तत्काल बहाल हो जाएगा?निश्चित रूप से ऐसा जरूरी नहीं है।

किसी पदाधिकारी के विरुद्ध गंभीर आरोप हों तो जांच होनी चाहिए। दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन केवल राजनीतिक दबाव में किसी को पद छोड़ने के लिए मजबूर करना किसी स्वस्थ संस्थागत व्यवस्था का आदर्श नहीं हो सकता।यही बात न्यायपालिका, चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, पुलिस और प्रशासन के संदर्भ में भी लागू होती है।

यदि हर राजनीतिक असहमति के बाद इस्तीफे की मांग होने लगे, तो संस्थाओं की स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ सकता है। अधिकारी अपने निर्णय कानून और तथ्यों के बजाय राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखकर लेने लगें, तो इसका नुकसान पूरे देश को हो सकता है।

  • राजनीतिक दल अपनी मांगों को प्रमाणों, कानून और स्थापित प्रक्रियाओं के आधार पर रखें।
  • देश किसी एक नेता की इच्छा से नहीं, बल्कि संविधान, कानून और संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से चलता है।
  • विरोध प्रदर्शन में आगे कौन? नेताओं के परिवार या आम युवाओं के बच्चे?
  • यह इस पूरे राजनीतिक विमर्श का सबसे गंभीर और संवेदनशील पहलू है।

जब कोई बड़ा नेता आंदोलन का आह्वान करता है, सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने की अपील करता है या अपने समर्थकों से टकरावपूर्ण प्रदर्शन करने को कहता है, तब उसे अपने शब्दों और आह्वान के परिणामों के प्रति भी जिम्मेदार होना चाहिए।

किसी भी राजनीतिक आंदोलन में शामिल होना अपने आप में गलत नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, कानून हाथ में लेना या सुरक्षा बलों के साथ मारपीट करना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

अब युवाओं से एक सीधा सवाल है...

जब नेता आंदोलन का आह्वान करते हैं, तब क्या आपने कभी विचार किया है कि आपके साथ आंदोलन में शामिल होने वाले लोगों में कितने लोग अपने परिवारों की सहमति से आए हैं? कितने लोग अपने भविष्य की जिम्मेदारी समझते हुए आए हैं? और कितने लोग बिना पूरी जानकारी के किसी के राजनीतिक आह्वान पर वहां पहुंच जाते हैं?

यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या आंदोलन का आह्वान करने वाले नेताओं के अपने परिजन भी उसी जोखिम को उठाते हैं, जिसका सामना सड़कों पर उतरने वाले सामान्य युवाओं को करना पड़ सकता है?

हर नेता के परिवार के बारे में बिना प्रमाण कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना अवश्य है कि राजनीतिक नेतृत्व को युवाओं को किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले उसके उद्देश्य, तरीके और संभावित परिणामों के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। नेताओं के भाषण कुछ मिनटों के होते हैं, लेकिन उनके प्रभाव में लिया गया गलत निर्णय किसी युवा के जीवन पर वर्षों तक असर डाल सकता है।

चंद रुपयों, भीड़ या राजनीतिक नारों के लिए अपना भविष्य दांव पर मत लगाइए!

देश के युवाओं के सामने आज रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास और अपने परिवार को बेहतर जीवन देने की बड़ी चुनौतियां हैं। किसी युवा ने वर्षों मेहनत करके पढ़ाई की है, किसी ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की है, किसी ने अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष किया है। ऐसे में यदि वह बिना उद्देश्य समझे किसी के बहकावे में आकर हिंसक गतिविधि में शामिल हो जाता है, तो उसका नुकसान केवल उसी तक सीमित नहीं रहता।

यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है या हिंसा में शामिल होता है, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई हो सकती है। उसका भविष्य किन परिणामों से प्रभावित होगा, यह घटना कीह प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून पर निर्भर करता है। ऐसी परिस्थितियों में परिवार को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

जरा सोचिए...

जिस मां ने अपने बेटे को पढ़ाने के लिए अपनी जरूरतों का त्याग किया, जिस पिता ने मेहनत-मजदूरी करके उसकी फीस जुटाई, जिस परिवार ने उसके बेहतर भविष्य के सपने देखे, उस परिवार पर क्या बीतेगी यदि उनका बेटा किसी राजनीतिक उपद्रव में फंस जाए?

क्या उसके माता-पिता ने उसे इसलिए पढ़ाया था कि वह अपना भविष्य बनाने के बजाय किसी दूसरे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का मोहरा बन जाए?

क्या उसके परिवार की उम्मीदें इतनी सस्ती हैं कि उन्हें कुछ नारों, कुछ घंटों के हंगामे या किसी संभावित आर्थिक प्रलोभन के बदले दांव पर लगा दिया जाए?

याद रखिए...

आपकी जिंदगी किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। आपका भविष्य आपकी जिम्मेदारी है और आपके माता-पिता के सपनों की कीमत किसी राजनीतिक नारे से कहीं अधिक है।

यदि आपको किसी सरकार से शिकायत है तो तथ्यों के साथ सवाल उठाइए। यदि किसी नीति से असहमति है तो शांतिपूर्ण विरोध कीजिए। यदि किसी अन्याय का सामना कर रहे हैं तो कानूनी सहायता लीजिए।लेकिन हिंसा, तोड़फोड़ और गैरकानूनी गतिविधियों से दूर रहिए।

  • राजनीतिक जागरूक बनिए, राजनीतिक मोहरा नहीं!
  • नेताओं को भी समझनी होगी आंदोलन की नैतिक जिम्मेदारी
  • यह जिम्मेदारी केवल प्रदर्शन में शामिल युवाओं की नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी उससे कहीं अधिक है।

जो नेता जनता से सड़कों पर उतरने की अपील करते हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहे, कानून का पालन हो और किसी व्यक्ति की जान-माल या भविष्य को अनावश्यक खतरा न पहुंचे। राजनीतिक दलों को अपने समर्थकों को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि लोकतांत्रिक विरोध का अर्थ हिंसा नहीं है।

यदि कोई आंदोलन किसी मांग को लेकर शुरू होता है, तो उसके आयोजकों को उस मांग की स्पष्टता, उसके समाधान और आगे की कार्ययोजना पर भी बात करनी चाहिए।

केवल भीड़ जुटाना उपलब्धि नहीं है। भीड़ को जिम्मेदार नागरिकों की तरह व्यवहार करने के लिए प्रेरित करना भी नेतृत्व की परीक्षा है।

यदि किसी आंदोलन में हिंसा होती है, तो जिम्मेदारी का निर्धारण तथ्यों और कानून के अनुसार होना चाहिए। न तो प्रत्येक प्रदर्शनकारी को अपराधी मानना उचित है और न ही राजनीतिक समर्थन के नाम पर किसी की हिंसक गतिविधि को उचित ठहराना।

लोकतंत्र में अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं। 

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल...

विपक्ष का उद्देश्य सत्ता में आने की इच्छा रखना गलत नहीं है। लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल को चुनाव लड़ने, जनसमर्थन प्राप्त करने और सरकार बनाने का अधिकार है। लेकिन सत्ता प्राप्त करने का रास्ता जनता का विश्वास जीतने से होकर गुजरता है।

यदि विपक्ष वास्तव में देश की जनता के हित में काम करना चाहता है, तो उसे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, कृषि, उद्योग, महिला सुरक्षा और राष्ट्रीय विकास जैसे विषयों पर स्पष्ट कार्यक्रम प्रस्तुत करना चाहिए।

उसे यह बताना चाहिए कि वह वर्तमान व्यवस्था से बेहतर क्या करेगा और उसके प्रस्तावों को लागू करने के लिए संसाधन कहां से आएंगे।

उसे यह भी बताना चाहिए कि यदि किसी संवैधानिक संस्था पर आरोप है तो उसके समाधान के लिए कौन-सी वैधानिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

केवल यह कहना कि वर्तमान सरकार गलत है, अपने आप में पर्याप्त नहीं है। जनता यह भी जानना चाहती है कि विकल्प क्या है।

सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन देश के सामने विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना उसकी राजनीतिक जिम्मेदारी है।

और यही कसौटी सत्तारूढ़ दल पर भी लागू होती है। सरकार को भी आलोचना सुननी चाहिए, अपनी नीतियों का हिसाब देना चाहिए और जहां कमियां हों, वहां सुधार करना चाहिए।

लोकतंत्र किसी एक पक्ष की जवाबदेही से नहीं, बल्कि सभी पक्षों की जवाबदेही से मजबूत होता है।

देशहित सर्वोपरि: न अंधसमर्थन, न अंधविरोध!

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद होना स्वाभाविक है। यहां अलग-अलग विचारधाराओं, भाषाओं, क्षेत्रों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग रहते हैं। ऐसे देश में राजनीतिक असहमति को शत्रुता में बदल देना खतरनाक हो सकता है।

सरकार का समर्थक होना किसी नागरिक को सरकार की हर नीति का समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं करता। इसी प्रकार विपक्ष का समर्थक होना किसी व्यक्ति से विपक्ष के प्रत्येक आरोप को बिना जांच स्वीकार करने की अपेक्षा नहीं करता।

एक जागरूक नागरिक को हर मुद्दे पर तथ्य देखने चाहिए, प्रमाणों की जांच करनी चाहिए और फिर अपना निष्कर्ष निकालना चाहिए।

यदि सरकार अच्छा काम करती है तो उसकी प्रशंसा कीजिए। यदि वह गलती करती है तो सवाल पूछिए। यदि विपक्ष सही मुद्दा उठाता है तो उसका समर्थन कीजिए। यदि विपक्ष गलत तथ्य प्रस्तुत करता है तो उससे भी सवाल पूछिए।

देशहित का अर्थ किसी दल के प्रति अंधसमर्पण नहीं, बल्कि संविधान, कानून, नागरिक अधिकारों और राष्ट्रीय हित के प्रति प्रतिबद्धता है। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है और यही जिम्मेदार नागरिकता की पहचान है।

आपके पास शिकायतें हजार हैं,उनका समाधान भी एक भी नहीं है,समाधान भी बताना होगा !

इस्तीफा इनका चाहिए,उनका इस्तीफा चाहिए से काम नहीं चलने वाला क्योंकि सभी से इस्तीफा तो लिया नहीं जा सकता ! जवाबदेही दूसरों से चाहिए और सत्ता भी आपको ऐसा नहीं चलेगा !

कभी चुनाव आयोग पर सवाल, कभी जांच एजेंसियों पर आरोप, कभी संवैधानिक पदाधिकारियों से इस्तीफे की मांगलेकिन जब जनता पूछे कि रोजगार कैसे देंगे, महंगाई कैसे घटाएंगे और देश की व्यवस्थाएं कैसे चलाएंगे, तब जवाब कहां है?

याद रखिए, देश केवल हंगामे से नहीं चलता। देश चलाने के लिए नीति, नीयत, योग्यता और जवाबदेही चाहिए।राजनीति में विरोध कीजिए, लेकिन देश की व्यवस्थाओं को केवल विरोध का अखाड़ा मत बनाइए!

युवाओं के नाम अंतिम संदेश...

देश के नौजवानों! आप किसी भी राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हों, किसी भी दल को पसंद करते हों या किसी भी सरकार से असंतुष्ट हों आपको अपने विचार रखने का पूरा अधिकार है।

लेकिन किसी नेता के भाषण को सुनकर अपनी बुद्धि को विराम मत दीजिए। किसी के आह्वान पर कदम उठाने से पहले यह जरूर सोचिए कि उस कदम का परिणाम आपके परिवार और भविष्य पर क्या पड़ेगा।

नेता आज सत्ता में है तो कल विपक्ष में हो सकता है। आज कोई आंदोलन सफल हो जाए तो कल उसका राजनीतिक स्वरूप बदल सकता है। लेकिन आपके जीवन का महत्वपूर्ण समय वापस नहीं आएगा।

अपनी ऊर्जा शिक्षा, रोजगार, कौशल, उद्यमिता, सामाजिक सेवा और देश के विकास में लगाइए। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाइए, लेकिन कानून के दायरे में रहकर। सरकार से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों के आधार पर। आंदोलन कीजिए, लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से।

किसी राजनीतिक दल के लिए आपकी उपयोगिता उसकी भीड़ बढ़ाने तक सीमित हो सकती है, लेकिन आपके परिवार के लिए आप उनकी उम्मीद, उनका सहारा और उनका भविष्य हैं।

इसलिए किसी के बहकावे में आकर ऐसा कदम मत उठाइए, जिसका खामियाजा आपको और आपके परिवार को वर्षों तक भुगतना पड़े।

सत्ता की लड़ाई नेताओं की,आपके अपने खुद के भविष्य की जिम्मेदारी आपकी हैं!

भारत का लोकतंत्र किसी एक सरकार, किसी एक विपक्षी दल या किसी एक नेता से बड़ा है। इसकी मजबूती के लिए सरकार को जवाबदेह होना चाहिए, विपक्ष को जिम्मेदार होना चाहिए, संवैधानिक संस्थाओं को स्वतंत्रता और कानून के अनुरूप काम करना चाहिए तथा नागरिकों को जागरूक होना चाहिए।

यदि किसी संस्था पर आरोप है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो। यदि कोई अधिकारी दोषी है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो। यदि सरकार गलत है तो जनता उसे चुनाव में बदल सकती है। लेकिन किसी भी राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए हिंसा, अराजकता या गैरकानूनी गतिविधियों को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

याद रखिए...

लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल आते-जाते हैं, नेता सत्ता में आते हैं और सत्ता से बाहर भी होते हैं; लेकिन देश की जनता और उसके युवाओं का भविष्य सबसे महत्वपूर्ण है।

क्योंकि जब किसी राजनीतिक आंदोलन की कीमत एक युवा का भविष्य और उसके परिवार की खुशियां बन जाएं, तब उस आंदोलन के उद्देश्य, तरीके और नेतृत्व तीनों पर सवाल पूछना जरूरी हो जाता है।

  • नेताओं को सत्ता की राजनीति करने दीजिए, लेकिन अपने विवेक को उनके हाथों गिरवी मत रखिए।
  • देश को हंगामे की नहीं, समाधान की राजनीति चाहिए।
  • देश के युवाओं को उकसावे की नहीं, अवसरों की जरूरत है।

भारत को ऐसी राजनीति चाहिए, जिसमें सत्ता से बड़ा संविधान, दल से बड़ा देश और नारे से बड़ा नागरिक का भविष्य हो- रवि यादव 

Reactions

Post a Comment

0 Comments