G News 24 : राष्ट्रपति के सामने सबूतों की बात,बाहर निकलते ही दावों का नया संस्करण,आखिर विपक्ष चाहता क्या है?

 तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने की राजनीति!

राष्ट्रपति के सामने सबूतों की बात,बाहर निकलते ही दावों का नया संस्करण,आखिर विपक्ष चाहता क्या है?

जब सत्ता पाने की बेचैनी जनहित पर भारी पड़ने लगे, तो हर संवैधानिक संस्था कटघरे में और हर चुनाव सवालों के घेरे में नजर आने लगता है! राजनीति में सत्ता पक्ष की आलोचना करना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, चुनावी प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायत करना और संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगना भी लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब सवाल पूछने और आरोप लगाने के बीच की रेखा मिटने लगे, तथ्यों की जगह राजनीतिक व्याख्याएं लेने लगें और किसी महत्वपूर्ण बातचीत को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि उसका अर्थ ही बदल जाए।

राहुल गांधी और विपक्ष की राजनीति को लेकर आज सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या लोकतंत्र में आरोपों की गंभीरता सबूतों से तय होगी या फिर किसी नेता के माइक पर आकर दिए गए बयान से?

यदि किसी संवैधानिक संस्था पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उनका परीक्षण तथ्यों, दस्तावेजों और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। केवल आरोप लगा देना और फिर उस आरोप को स्थापित सत्य की तरह प्रचारित करना किसी भी जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

राष्ट्रपति ने सबूत मांगे, तो क्या वह आरोप की पुष्टि हो गई?

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और कथित वोट चोरी के मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति से मुलाकात के संदर्भ में एक बुनियादी सवाल उठता है।

यदि राष्ट्रपति के समक्ष राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया और राष्ट्रपति ने उनसे सबूत प्रस्तुत करने को कहा, तो इस बातचीत का सीधा अर्थ क्या निकलता है?

क्या सबूत मांगना आरोप को स्वीकार करना है? क्या किसी शिकायत को सुनना और शिकायत की पुष्टि करना एक ही बात है? बिल्कुल नहीं!

किसी शिकायत को सुनना संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन उस शिकायत को सही मान लेने के लिए प्रमाण आवश्यक हैं।

 इसलिए राष्ट्रपति के सामने हुई बातचीत के संबंध में कोई भी निष्कर्ष निकालने से पहले वास्तविक बयान, उपलब्ध आधिकारिक विवरण और बातचीत के प्रमाणित संदर्भ को देखना जरूरी है।

यदि किसी नेता के सार्वजनिक बयान में राष्ट्रपति की बात को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि जनता को लगे कि उन्होंने कथित वोट चोरी को स्वीकार कर लिया है, जबकि वास्तविक बातचीत में केवल सबूत मांगे गए हों, तो यह प्रस्तुति गंभीर सवालों के घेरे में आएगी।

हालांकि, राष्ट्रपति के वास्तविक शब्दों और राहुल गांधी के बयान की प्रमाणित रिकॉर्डिंग या आधिकारिक विवरण के बिना यह अंतिम निष्कर्ष देना उचित नहीं होगा कि उन्होंने जानबूझकर तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा।

लेकिन सिद्धांत स्पष्ट है, सबूत मांगने को आरोप की पुष्टि बताना तर्क नहीं, बल्कि तथ्यों की ऐसी व्याख्या है, जिसे प्रमाणों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। और यही कसौटी राहुल गांधी सहित देश के हर राजनीतिक नेता पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

हर संस्था गलत और केवल हम ही सही, यह कैसी लोकतांत्रिक सोच है?

राहुल गांधी और विपक्ष के दूसरे नेताओं की ओर से समय-समय पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

इन संस्थाओं की आलोचना करना अपने आप में गलत नहीं है। यदि कहीं अनियमितता है, पक्षपात है या अधिकारों का दुरुपयोग हुआ है, तो उसकी जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई भी होनी चाहिए।

लेकिन क्या किसी संस्था पर आरोप लगा देना ही उसे दोषी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है?

क्या किसी जांच एजेंसी का निर्णय राजनीतिक विरोध के कारण स्वतः गलत हो जाता है? 

क्या निर्वाचन आयोग के किसी फैसले से असहमति का अर्थ यह है कि पूरी चुनावी व्यवस्था ही अविश्वसनीय हो गई? 

क्या न्यायपालिका के किसी निर्णय से असहमति होने पर बिना पर्याप्त आधार के पूरे संस्थागत ढांचे की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देना उचित है?

संस्थाओं से जवाब मांगिए, लेकिन सवालों को फैसला मत बनाइए। आरोप लगाइए, लेकिन आरोप को प्रमाणित सत्य बताने से पहले प्रमाण भी प्रस्तुत कीजिए।

लोकतंत्र संस्थाओं की अंधभक्ति से नहीं, बल्कि उनकी जवाबदेही, स्वतंत्रता और निष्पक्षता से मजबूत होता है। यही बात विपक्ष पर भी लागू होती है।

यदि विपक्ष के पास ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें देश के सामने रखे। यदि उसे चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी दिखाई देती है, तो संबंधित कानूनी और संवैधानिक माध्यमों का इस्तेमाल करे। लेकिन यदि हर असहमति को षड्यंत्र और हर प्रतिकूल निर्णय को लोकतंत्र पर हमला बताया जाएगा, तो अंततः जनता के मन में भ्रम ही पैदा होगा।

चुनाव हारने का दर्द या व्यवस्था बदलने की वास्तविक लड़ाई?

लोकतंत्र में चुनाव जीतना और हारना राजनीतिक जीवन का हिस्सा है। आज एक दल सत्ता में है, कल दूसरा आ सकता है। जनता किसी सरकार को दोबारा चुन सकती है और किसी दूसरी सरकार को सत्ता से बाहर भी कर सकती है।

चुनाव हारने वाला हर दल गलत नहीं होता और चुनाव जीतने वाला हर दल स्वतः सही भी नहीं हो जाता।

लेकिन चुनावी हार के बाद विपक्ष की असली परीक्षा शुरू होती है। क्या वह अपनी हार के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण करेगा? क्या वह अपनी नीतियों, संगठन, नेतृत्व और जनसंपर्क की कमियों को सुधारेगा? क्या वह जनता के बीच जाकर यह समझने की कोशिश करेगा कि मतदाताओं ने उसे अपेक्षित समर्थन क्यों नहीं दिया?या फिर वह अपनी हर हार के लिए चुनावी व्यवस्था को ही जिम्मेदार ठहराएगा?

यदि चुनाव में गड़बड़ी के वास्तविक प्रमाण हैं, तो उनकी जांच होनी ही चाहिए। लेकिन यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो विपक्ष को अपनी राजनीतिक रणनीति पर भी विचार करना चाहिए। जनता का विश्वास केवल आरोपों से नहीं जीता जाता। जनता का विश्वास काम, विचार, व्यवहार और विश्वसनीय विकल्प से अर्जित होता है।

वोट चोरी का मुद्दा, जनता का सवाल या विपक्ष की राजनीतिक रणनीति?

विपक्ष यदि कहता है कि चुनाव में वोट चोरी हुई है, तो उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि कथित अनियमितता कहां हुई, कितने मत प्रभावित हुए, कौन-से दस्तावेज या आंकड़े उसके दावे का समर्थन करते हैं और कानून के तहत उसने क्या कार्रवाई की मांग की है।

केवल मंचों से आरोप दोहराने से चुनावी अनियमितता साबित नहीं हो जाती।

इसी तरह यह कहना भी गलत होगा कि कथित वोट चोरी से जनता या देश को कोई नुकसान नहीं होता। यदि वास्तव में मताधिकार से छेड़छाड़ होती है, तो यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जनता के अधिकारों के लिए गंभीर विषय है।

यदि किसी राजनीतिक दल को लगता है कि सरकार जनहित के मुद्दों पर विफल रही है, तो वह वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करे। वह जनता को बताए कि सत्ता में आने पर रोजगार कैसे बढ़ाएगा, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में क्या बदलाव करेगा और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए उसकी योजना क्या है।

लेकिन यदि राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा केवल आरोप-प्रत्यारोप, इस्तीफे की मांग और संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने में खर्च होगा, तो जनता यह पूछने के लिए स्वतंत्र है कि उसके वास्तविक मुद्दों पर चर्चा कब होगी।

राहुल गांधी हों या विपक्ष का कोई दूसरा नेता उन्हें इस सवाल का जवाब देना चाहिए।

जनता केवल इसलिए सड़कों पर क्यों उतरे कि किसी राजनीतिक दल को अपनी मांग मनवानी है?

जनता आंदोलन तब करती है, जब उसे अपने अधिकारों, हितों या भविष्य पर वास्तविक संकट दिखाई देता है। क्या राहुल गांधी, और उनके विपक्ष के साथियों  को यह बात समझ में नहीं आती है ?

किसी मुद्दे पर जनता को संगठित करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जनता की भावनाओं का इस्तेमाल केवल राजनीतिक लाभ के लिए करने का आरोप तभी टिकेगा, जब उसके पीछे ठोस तथ्य हों। इसलिए जनता को किसी भी आंदोलन का समर्थन करने से पहले उसके उद्देश्य, प्रमाण और संभावित परिणाम समझने चाहिए।

इस्तीफे की मांग से आगे भी कोई राजनीति है या नहीं?

किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का इस्तीफा मांगना विपक्ष का राजनीतिक अधिकार हो सकता है। लेकिन इस्तीफे की मांग और उस मांग का औचित्य दो अलग-अलग विषय हैं।

यदि किसी पदाधिकारी के विरुद्ध गंभीर आरोप हैं, तो उनके समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत किए जाने चाहिए। संबंधित नियमों और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की मांग की जानी चाहिए।

केवल इसलिए कि कोई पदाधिकारी विपक्ष की मांग के अनुसार निर्णय नहीं ले रहा, उसका इस्तीफा मांगना अपने आप में पर्याप्त तर्क नहीं बन जाता।

देश की संस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी हैं। उनकी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता भी जरूरी है और प्रमाण के बिना किसी को दोषी ठहराने से बचना भी।

विपक्ष यदि निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि किन विशिष्ट प्रक्रियाओं में बदलाव की जरूरत है, कौन-से प्रमाण उसके पास हैं और समस्या का समाधान क्या है।

राजनीति केवल इस्तीफा मांगने का नाम नहीं है। राजनीति समस्या पहचानने, प्रमाण प्रस्तुत करने और समाधान देने का नाम भी है।

कॉकरोच पॉलिटिक्स: राजनीतिक विरोध या सार्वजनिक विमर्श में गंदगी?

आज राजनीतिक बहस में व्यक्तिगत हमले, अपमानजनक उपमाएं और विरोधियों को नीचा दिखाने वाली भाषा तेजी से दिखाई देती है। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं है।

विपक्ष के कुछ सहयोगी दलों या नेताओं की भाषा यदि सार्वजनिक विमर्श को अपमान और कटुता की ओर ले जाती है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन आलोचना विचारों और व्यवहार के आधार पर होनी चाहिए, केवल नाम बिगाड़कर या अपमानजनक विशेषण लगाकर नहीं।

दल कोई भी हो, जनता उसके काम, नीतियों और आचरण के आधार पर उसका मूल्यांकन करती है।

यदि कोई नेता देशहित के मुद्दों पर सार्थक बहस करने के बजाय केवल विवाद खड़ा करता है, तो उसकी राजनीतिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि कोई सत्ताधारी नेता विपक्ष को दबाने के लिए अनुचित भाषा का इस्तेमाल करता है, तो उसे भी आलोचना का सामना करना चाहिए।

लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध जरूरी है, लेकिन विरोध की भाषा इतनी गिर जाए कि मुद्दे पीछे और अपमान आगे आ जाए, तो नुकसान पूरे लोकतांत्रिक विमर्श का होता है।

देश की अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक संपत्ति कोई राजनीतिक खिलौना नहीं !

  1. यदि आरोप ही प्रमाणित नहीं हैं, तो उन्हें स्थापित तथ्य की तरह प्रचारित करना भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना हो सकता है।
  2. इसलिए जनता को दोनों पक्षों से सवाल पूछने चाहिए।
  3. सत्ताधारी दल से भी, कि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी क्यों न मानी जाए?
  4. और विपक्ष से भी, कि आपके आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण कहां हैं?
  5. लोकतंत्र में जनता किसी दल की बंधक नहीं है। वह सत्ता पक्ष से जवाब मांग सकती है और विपक्ष से भी प्रमाण भी मांग सकती है। यही राजनीतिक परिपक्वता है और यही जागरूक नागरिकता की पहचान है।

विपक्ष की राजनीति में जनता कहां है?

  1. देश की आम जनता के सामने आज रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय, छोटे कारोबारियों की समस्याएं, भ्रष्टाचार और बुनियादी सुविधाओं जैसे अनेक महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
  2. एक बेरोजगार युवा जानना चाहता है कि उसके लिए रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे।
  3. एक गरीब परिवार चाहता है कि बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च उसकी पहुंच में रहे।
  4. एक किसान अपनी उपज का उचित मूल्य और खेती की लागत से राहत चाहता है।
  5. एक छोटा व्यापारी चाहता है कि उसका कारोबार सुचारु रूप से चले और नियमों का पालन करते हुए उसे अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।
  6. इन सवालों पर विपक्ष की ठोस कार्ययोजना कहां है?

8 दिन से जिस प्रकार की तस्वीर आ रही है उनसे पता लगता है कि यह किस प्रकार का आंदोलन है...

किसी भी आंदोलन का अधिकार लोकतंत्र में सुरक्षित है। शांतिपूर्ण विरोध, धरना, प्रदर्शन और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं। पिछले 2 दिन से जिस प्रकार की तस्वीर आ रही है उनसे पता लगता है कि यह किस प्रकार का आंदोलन है कहीं प्रियंका पुलिसकर्मी को कोहनी मार रही है, तो कहीं कांग्रेसी नेता पुलिस वाले को लात मार रहा है यह आंदोलन है, शर्म आनी चाहिए...

लेकिन विरोध के नाम पर हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचना या आम नागरिकों के जीवन को जानबूझकर बाधित करना किसी भी पक्ष के लिए उचित नहीं ठहराया जा सकता।

राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सड़कें, सार्वजनिक परिवहन, सरकारी भवन और अन्य सार्वजनिक संसाधन किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। वे जनता के संसाधन हैं और उनकी क्षति का बोझ भी अंततः जनता को ही उठाना पड़ता है। 

ऊपर से राहुल गांधी के जो मन में आया वही सही है बाकी सब गलत! 

ऊपर से राहुल गांधी के जो मन में आया वही सही है बाकी सब गलत!  फिर चाहे धरातल पर कुछ भी ना हो, वह तो कहते हैं मेरे नाम 100 fir होना चाहिए! फिर वही सवाल कि अपने ऊपर  100 fir के लिए सड़क पर उतरेंगे, उससे निपटने के लिए सरकार उनकी ही सुरक्षा के लिए संसाधनों का कितना फिजूल खर्च किया जाता है ? इसका भी जनता जवाब चाहती है! 

उनकी नजरों में कानून संविधान कुछ भी नहीं है इससे तो यही लगता है क्योंकि जब आम व्यक्ति पर एक फिर हो जाती है,तो उसकी रातों की नींद गायब हो जाती है। और यह सीना तान के एफ आई आर  करवाना चाहते हैं! कारण है कि सजा नहीं मिलती है। कोर्ट और अदालत को भी सोचना होगा कि जब यह काम आदमी को सामान्य से कैस सजा और जुर्माना हो सकती है, इन पर रहम क्यों ?

किसी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ की संख्या से नहीं आंकी जा सकती है !

इसीलिए किसी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, लोकतांत्रिक मर्यादा और परिणाम से मापी जानी चाहिए।

सरकार की आलोचना होनी चाहिए, लेकिन आलोचना के नाम पर देश की व्यवस्था को ठप करना कोई स्थायी समाधान नहीं है। इसी तरह सरकार को भी विरोध के अधिकार का सम्मान करना चाहिए और असहमति रखने वालों को केवल विरोधी होने के कारण गलत नहीं ठहराना चाहिए।

जनता के  विपक्ष से सीधे सवाल ...

  1. यदि चुनाव में वोट चोरी हुई है, तो उसके समर्थन में ठोस और सत्यापन योग्य प्रमाण क्या हैं? 
  2. क्योंकि आपके हारने से वोट चोरी साबित नहीं हो जाती है? जनता आपको वोट आपका व्यवहार और कार्य को देख कर देती है केवल खोकली राजनीति के सारे वोट नहीं मिलते !
  3. यदि संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल हैं, तो उनके समाधान के लिए विपक्ष ने कौन-से ठोस कदम उठाए हैं?
  4. रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की समस्याओं पर विपक्ष की वैकल्पिक कार्ययोजना क्या है?
  5. क्या विपक्ष अपनी चुनावी हार के कारणों का आत्ममंथन करने के लिए तैयार है, या हर हार का दोष व्यवस्था पर डालता रहेगा?
  6. यदि विपक्ष को सत्ता मिलती है, तो वह वर्तमान समस्याओं को दूर करने के लिए कौन-सी समयबद्ध और जवाबदेह नीतियां लागू करेगा?
  7. इन सवालों के जवाब किसी एक नेता से नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक राजनीतिक दल से मांगे जाने चाहिए।
  8. जनता क्या सिर्फ आपको सत्ता दिलाने के लिए  सड़क पर उतरे, और वह ऐसा क्यों करें ?
  9. राहुल गांधी ने अभी तक देश के लिए क्या किया है यह बताएं ? 
  10. जो कॉकरोच पार्टी देश में हुड़दंग मचा रही है उसने देश के लिए क्या किया है अपना काम बताएं?

राहुल गांधी और विपक्ष को यह समझना होगा कि जनता केवल राजनीतिक नारों से प्रभावित होकर अपना भविष्य तय नहीं करती। आज का मतदाता सवाल पूछता है, जानकारी जुटाता है और नेताओं के दावों को उनके काम से मिलाकर देखता है। 

यदि विपक्ष को समस्याओं पर ठोस समाधान प्रस्तुत करना चाहिए,ना कि राजनीति ...

यदि विपक्ष को लगता है कि जनता उसके साथ है, तो उसे जनता के बीच जाकर वास्तविक मुद्दों पर काम करना चाहिए। उसे बेरोजगार युवाओं की आवाज बनना चाहिए, किसानों की समस्याओं पर ठोस समाधान प्रस्तुत करना चाहिए, महंगाई और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों पर सरकार को जवाबदेह बनाना चाहिए और जहां भी अनियमितता हो, उसके विरुद्ध प्रमाणों के साथ लड़ना चाहिए।

उसे यह भी समझना होगा कि सत्ता किसी राजनीतिक परिवार, किसी दल या किसी नेता की स्थायी जागीर नहीं है। सत्ता जनता देती है और जनता ही वापस ले सकती है। इतना हल्ला मचाने के बाद भी उपचुनावों का नतीजा क्या रहा आज सारे देश ने देखा, औरैया नतीजा सिर्फ जागरूक जनता की वजह से ही आया।

लेकिन जनता का विश्वास हासिल करने के लिए केवल सरकार का विरोध पर्याप्त नहीं है, विपक्ष को यह भी साबित करना होगा कि वह सरकार से बेहतर विकल्प दे सकता है।

यदि किसी नेता की हर राजनीतिक लड़ाई का केंद्र केवल सत्ता परिवर्तन, इस्तीफे की मांग और संस्थाओं पर आरोप बनकर रह जाए, तो जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि उसकी अपनी समस्याओं का समाधान उस राजनीति में कहां है ?

राहुल गांधी हों या कोई अन्य विपक्षी नेता,देश को केवल विरोध करने वाले नेताओं की नहीं, बल्कि प्रमाणों के साथ सवाल उठाने वाले, जनता की समस्याओं का समाधान देने वाले और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही के लिए गंभीरता से काम करने वाले विपक्ष की जरूरत है।

याद रखिए, विपक्ष का कमजोर होना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन विपक्ष का केवल आरोपों और अविश्वास की राजनीति तक सीमित हो जाना भी लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता।

देश को ऐसा विपक्ष चाहिए जो सरकार से कठिन सवाल पूछे, लेकिन अपने दावों के प्रमाण भी दे। जो सत्ता की गलतियों को उजागर करे, लेकिन खुद भी जवाबदेही से न भागे। जो जनता को आंदोलन के लिए बुलाने से पहले जनता के हितों को समझे और जो राजनीतिक लाभ से ऊपर राष्ट्रहित को रखे।

राहुल गांधी और समूचे विपक्ष के लिए संदेश स्पष्ट है...

जनता को भ्रमित करने के आरोपों से बचिए, अपने दावों को प्रमाणों से साबित कीजिए, संस्थाओं की आलोचना तथ्यों के आधार पर कीजिए और जनता के वास्तविक मुद्दों पर अपनी कार्ययोजना प्रस्तुत कीजिए।

क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल यह नहीं देखती कि कौन सत्ता में है,वह यह भी देखती है कि सत्ता पाने के लिए कौन क्या कर रहा है, और देश चलाने के लिए किसके पास क्या योजना है।

राहुल जी सत्ता की राजनीति बहुत हो चुकी—अब जनहित की राजनीति करके दिखाइए!

-रवि यादव 


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