G News 24 : कानून का पैमाना आम आदमी के लिए और राजनीति के लिए अलग !

सियासत में अपराधियों की बे-धड़क होती एंट्री देखकर लगता है कि ...

कानून का पैमाना आम आदमी के लिए और राजनीति के लिए अलग !

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की ताकत केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि उन लोगों के चरित्र, नीयत और सार्वजनिक जीवन की विश्वसनीयता में भी होती है जिन्हें जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है।आज एक गंभीर सवाल देश के सामने खड़ा है,आम आदमी पर चरित्र प्रमाण में मामूली मुकदमा भी भारी, और राजनीति के दरवाजे पर गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड हल्का पड़ जाता है ! तो जो नेता है इन ब्यूरोक्रेट्स से व्यवस्था को चलवाता है, उस नेता के मामले में चरित्र सत्यापन क्यों नहींहोता है ? उस नेता का भी चरित्र सत्यापन होना चाहिए और यदि वह क्रिमिनल या अपराधी है,उसके नाम से कोर्ट में कोई मामला दर्ज है,तो उसे पाक-साफ क्यों मान लिया जाता है ! क्यों नहीं उसके राजनीतिक कैरियर पर ब्रेक लगता है !

एक सामान्य नागरिक को नौकरी पाने, किसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए चयनित होने अथवा किसी संस्थान में संवेदनशील पद पर नियुक्ति से पहले पुलिस वेरिफिकेशन और चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। उसके खिलाफ दर्ज पुराना आपराधिक मामला भी सामने आ जाए तो कई बार उसकी नियुक्ति पर सवाल खड़े हो जाते हैं।

लेकिन दूसरी ओर, राजनीति में ऐसे लोगों के प्रवेश के उदाहरण सामने आते हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, जो जेल जा चुके हैं, जिनका आपराधिक इतिहास रहा है या जो अदालतों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। हाल ही में पंजाब में 47 आपराधिक मामलों का सामना कर चुके पूर्व गैंगस्टर गुरप्रीत सिंह सेखों के आम आदमी पार्टी में शामिल होने की खबर ने इसी बहस को फिर सामने ला दिया है।

यह किसी एक दल या एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय राजनीति की उस संस्कृति का प्रश्न है, जिसमें चुनाव जीतने की क्षमता को कभी-कभी सार्वजनिक जीवन की मर्यादा से ऊपर रख दिया जाता है।

वोट बैंक के सामने चरित्र क्यों हार जाता है?

राजनीतिक दलों का तर्क हो सकता है कि जब तक अदालत किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं करती, तब तक वह चुनाव लड़ने के लिए कानूनी रूप से अयोग्य नहीं है। यह कानूनी स्थिति अपनी जगह सही है। लेकिन सवाल कानून से आगे का है।

क्या लोकतंत्र केवल कानूनी पात्रता का नाम है, या फिर नैतिक पात्रता भी उसका हिस्सा होनी चाहिए?

राजनीतिक दल यदि किसी ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार बनाते हैं जिसके खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप लंबित हैं, तो उन्हें जनता के सामने यह बताना चाहिए कि आखिर उसी व्यक्ति को टिकट देने की क्या मजबूरी थी? क्या पार्टी में साफ-सुथरी छवि वाला कोई दूसरा व्यक्ति उपलब्ध नहीं था?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद राजनीतिक दलों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की जानकारी सार्वजनिक करने के साथ यह भी बताना होता है कि ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार क्यों चुना गया और बिना आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को क्यों नहीं चुना गया।

क्या केवल जानकारी प्रकाशित कर देना पर्याप्त है?

चुनाव आयोग ने मतदाताओं को उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए व्यवस्था बनाई है। आयोग के KYC ऐप पर भी उम्मीदवार के आपराधिक मामलों और उनके स्वरूप की जानकारी देखी जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र में मतदाता को केवल यह जानकारी देना पर्याप्त नहीं है कि उम्मीदवार पर कितने मुकदमे हैं।

जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक व्यवस्था ऐसी हो जिसमें स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिले और गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को राजनीतिक दल टिकट देने से पहले सार्वजनिक जवाबदेही के कठघरे में खड़े हों। क्योंकि लोकतंत्र में सांसद या विधायक केवल कानून बनाने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह स्वयं कानून व्यवस्था, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं का प्रतिनिधि होता है।

गंभीर अपराध और राजनीतिक शक्ति का गठजोड़ लोकतंत्र के लिए खतरा

यदि किसी व्यक्ति के पास धन, बाहुबल और राजनीतिक संरक्षण तीनों एक साथ आ जाएं, तो आम नागरिक के मन में कानून के प्रति विश्वास कमजोर हो सकता है,और यही सबसे बड़ा खतरा है। जब जनता यह देखने लगे कि सामान्य नागरिक के लिए मामूली आपराधिक रिकॉर्ड भी नौकरी और प्रतिष्ठा के रास्ते में बाधा बन सकता है, लेकिन राजनीति में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि भी टिकट पाने में बाधा नहीं बनती, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेगा ...

  • क्या कानून सबके लिए समान है?
  • क्या राजनीति अपराधियों के लिए पुनर्वास का रास्ता बन रही है?
  • क्या वोट बैंक की मजबूरी लोकतांत्रिक मूल्यों से बड़ी हो गई है?

सवाल राजनीतिक दलों से भी, व्यवस्था से भी...

यहां केवल चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करना समाधान नहीं है। चुनाव आयोग ने अपनी ओर से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के संबंध में प्रकटीकरण की व्यवस्था लागू की है। अब राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे 'जीत सकता है या नहीं' से ऊपर उठकर यह प्रश्न पूछें, 'क्या यह व्यक्ति जनता का प्रतिनिधित्व करने योग्य है?'

संसद की जिम्मेदारी है कि वह चुनावी और राजनीतिक सुधारों पर गंभीरता से विचार करे...

न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई में अनावश्यक देरी न हो। अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई एक स्थिति रिपोर्ट में बड़ी संख्या में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों का उल्लेख हुआ और ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए विशेष अदालतों तथा समयबद्ध सुनवाई जैसे सुझाव भी सामने आए। जनता की भी जिम्मेदारी है कि वह जाति, धर्म, क्षेत्र, डर, लालच और दलगत निष्ठा से ऊपर उठकर उम्मीदवार के चरित्र और उसके सार्वजनिक रिकॉर्ड को देखे।

अब समय केवल प्रकटीकरण का नहीं, सुधार का है,देश को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें...

  1. गंभीर आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों के चयन पर राजनीतिक दलों से वास्तविक और सार्वजनिक स्पष्टीकरण लिया जाए।
  2. जनप्रतिनिधियों से जुड़े गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए प्रभावी समयबद्ध व्यवस्था हो।
  3. चुनाव आयोग द्वारा उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी मतदाताओं तक सरल भाषा में पहुंचाई जाए।
  4. राजनीतिक दल अपने टिकट वितरण में स्वच्छ छवि को वास्तविक प्राथमिकता दें, केवल चुनावी नारा न बनाएं।
  5. संसद को व्यापक चुनाव सुधारों पर राजनीतिक सहमति बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण...

किसी व्यक्ति को केवल आरोप लगने भर से अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोष सिद्ध करने का अधिकार अदालत को है। लेकिन राजनीतिक दलों को यह नैतिक अधिकार भी नहीं मिल जाना चाहिए कि वे गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि को केवल 'चुनाव जीतने की क्षमता' के नाम पर नजरअंदाज कर दें।

पूछता है भारत...

  • अगर एक सामान्य नागरिक को नौकरी के लिए चरित्र प्रमाण-पत्र देना पड़ता है…
  • अगर पुलिस वेरिफिकेशन में उसका पुराना रिकॉर्ड सामने आने पर उसकी नियुक्ति प्रभावित हो सकती है…
  • तो फिर जनता का प्रतिनिधि बनने वाले व्यक्ति के लिए नैतिक और सार्वजनिक चरित्र की कसौटी इतनी कमजोर क्यों हो?
  • राजनीति सेवा का माध्यम है या सत्ता हासिल करने का रास्ता?
  • लोकतंत्र जनता की ताकत है या बाहुबलियों की राजनीतिक शरणस्थली?

यह सवाल किसी एक पार्टी से नहीं,पूरी राजनीतिक व्यवस्था से है...

भारत को अपराधीकरण से मुक्त राजनीति चाहिए। ऐसी राजनीति जिसमें टिकट का आधार बाहुबल नहीं, जनबल हो; डर नहीं, विश्वास हो; आपराधिक प्रभाव नहीं, चरित्र हो। अब समय आ गया है कि संवैधानिक संस्थाएं, राजनीतिक दल और सबसे बढ़कर देश का मतदाता मिलकर यह तय करें कि लोकतंत्र की संसद और विधानसभाएं जनता के विश्वास का मंदिर रहेंगी या अपराध और राजनीति के गठजोड़ का नया मंच बनेंगी।क्योंकि लोकतंत्र में जीत महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतंत्र की गरिमा उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

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