नई दिल्ली ने दी,सहमति जीत की,परीक्षा अभी बाकी...
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने नई दिल्ली से बहुध्रुवीय विश्व का दिया संदेश !
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने नई दिल्ली से बहुध्रुवीय विश्व का संदेश दिया। आम नागरिक के लिए असली प्रश्न यह है कि घोषणाएँ खेत, बाजार और रसोई तक कब पहुँचेंगी। रविवार शाम भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का पटाक्षेप हुआ। दो दिन में 11 सदस्य देशों के नेता एक मंच पर बैठे,मूल पाँच देशों के साथ मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात। समूह अब विश्व की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है। कागज पर यह शक्ति प्रभावशाली है। स्वतंत्र दृष्टि से देखें तो दिल्ली की असली उपलब्धि आकार नहीं, सहमति है और असली परीक्षा अब क्रियान्वयन की है।
पहला दिन रात चार बजे तक चली बातचीत का परिणाम था। पश्चिम एशिया के युद्ध ने समूह को दो खेमों के पास खड़ा कर दिया था। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान तक नहीं निकाल सकी थी। भारत की अध्यक्षता में ‘अधिकतम संयम’ और नागरिक बुनियादी ढाँचे व परमाणु सुविधाओं पर हमलों की चिंता वाली भाषा निकल आई किसी देश का नाम लिए बिना। यह संतुलन आसान नहीं था। यह भारत की कूटनीति की सफलता है, पर यह भी याद रहे कि नाम न लेना समझौता है, समाधान नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समूह को नियम-निर्माता बनाने और ग्लोबल साउथ को पीछे की पंक्ति से आगे लाने की बात कही। दिशा सही है। विकासशील देश व्यापार, जलवायु वित्त और सुरक्षा परिषद में पर्याप्त आवाज नहीं रखते। ब्रिक्स अगर उस शून्य को भरता है तो यह उपयोगी मंच है। भारत ने बार-बार कहा कि यह पश्चिम-विरोधी गठबंधन नहीं है। यह व्यावहारिक रुख है। भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी पश्चिमी बाजारों, पूँजी और तकनीक से जुड़ी है। वैकल्पिक व्यवस्था बनाना और पश्चिम से कट जाना—दो अलग बातें हैं।
अर्थव्यवस्था, तकनीक, सतर्कता
रविवार का स्वर अधिक आर्थिक रहा। मोदी ने तकनीक और क्रिटिकल मिनरल्स के ‘हथियारीकरण’ के खिलाफ चेतावनी दी। संदेश साफ था,आपूर्ति श्रृंखला को दबाव का औजार न बनाया जाए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उपस्थिति में यह बात संयोग नहीं लगती। चीन दुर्लभ धातुओं और कई रणनीतिक खनिजों की प्रसंस्करण श्रृंखला में निर्णायक स्थिति रखता है। शी ने ‘ग्रेटर ब्रिक्स’ के तहत एआई ओपन सोर्स जोन, व्यापार-निवेश, डिजिटल उद्योग और स्मार्ट विनिर्माण के प्रस्ताव रखे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत और चीन की यूक्रेन शांति वार्ता की पेशकश का स्वागत किया। चीन अगले वर्ष अध्यक्षता संभालेगा।
भारत-चीन द्विपक्षीय मुलाकात गलवान के बाद पहली औपचारिक शीर्ष बैठक,संबंधों में नरमी का संकेत है। उड़ानें, वीजा और व्यापार धीरे-धीरे खुल रहे हैं। फिर भी सीमा पर स्थायी शांति अभी घोषणापत्र का विषय नहीं बनी। नरमी और समाधान में फर्क है। उसे भुलाना कूटनीति नहीं, आत्मसंतोष होगा।
घोषणापत्र क्या कहता है, क्या नहीं कहता
नई दिल्ली घोषणापत्र 140 पैराग्राफ का विस्तृत दस्तावेज है। उसमें एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं की आलोचना है, विश्व व्यापार संगठन को मजबूत करने का आह्वान है, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान प्रणालियों के तालमेल का समर्थन है, तथा न्यू डेवलपमेंट बैंक में स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण बढ़ाने की बात है। आतंकवाद की निंदा में पहलगाम हमले का उल्लेख है। कृषि में किसान-केंद्रित एग्रीन नेटवर्क, डिजिटल कृषि, एग्रोइकोलॉजी केंद्र और खाद्य सुरक्षा के प्रस्ताव हैं। एआई शासन, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर रिपॉजिटरी और स्टार्टअप इनोवेशन फंड भी शामिल हैं।
जो नहीं कहा गया, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समूह ने साझा ब्रिक्स मुद्रा का विचार खारिज रखा। यह व्यावहारिक था। डॉलर का विकल्प रातोंरात नहीं बनता। रूस-यूक्रेन पर घोषणापत्र लगभग मौन है। ईरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव का हल नहीं निकला, केवल भाषा निकली। यहीं स्वतंत्र पाठक को सावधानी रखनी चाहिए। शिखर सम्मेलन अक्सर महत्वाकांक्षा लिखते हैं; इतिहास क्रियान्वयन लिखता है।
आम आदमी के लिए इसका अर्थ
शिखर सम्मेलन की भाषा खेत और दुकान से दूर लगती है। फिर भी अगर ये पहल जमीन पर उतरें तो असर दिख सकता है। लाभ तुरंत नहीं, शर्तों के साथ आएगा।
किसान...
डिजिटल कृषि नेटवर्क एआई, जियोस्पेशियल तकनीक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को खेत से जोड़ने का वादा करता है। जलवायु अनुकूल बीज, एग्रोइकोलॉजी और बीज प्रणालियों में किसानों के अधिकार—ये विषय सही हैं। लाभ तभी होगा जब पहुँच सस्ती हो, भाषा सरल हो और मध्यस्थों का जाल न खड़ा हो। खाद्य आपूर्ति स्थिर रही तो रसोई की महँगाई पर कुछ राहत संभव है। नहीं तो यह एक और पायलट योजना रह जाएगी।
व्यापारी और छोटे उद्योग: स्थानीय मुद्रा में निपटान से लेनदेन लागत और डॉलर की अस्थिरता का जोखिम घट सकता है। भारत-रूस व्यापार पहले से काफी हद तक रुपये-रूबल में चल रहा है। भुगतान प्रणालियाँ जुड़ें और चालान-डिस्काउंटिंग काम करे तो निर्यातक को कार्यशील पूँजी अपेक्षाकृत आसानी से मिल सकती है। ऊर्जा और खनिज आपूर्ति स्थिर रहे तो कारखाने की लागत,और अंततः उपभोक्ता कीमत,पर असर पड़ेगा।
युवा और स्टार्टअप: इनक्यूबेटर नेटवर्क तथा प्रस्तावित इनोवेशन फंड नए दरवाजे खोल सकते हैं। एआई सहयोग अगर केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रहा तो समावेशन का दावा खोखला रहेगा। स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि में स्थानीय समाधान तभी बनेंगे जब आँकड़े, कंप्यूटिंग और कौशल छोटे शहरों तक पहुँचें।
नागरिक सुविधाएँ...
न्यू डेवलपमेंट बैंक यदि स्थानीय मुद्रा में अधिक ऋण देता है तो सड़क, ऊर्जा और शहरी परियोजनाएँ मुद्रा जोखिम से कुछ बच सकती हैं। संक्रामक रोगों की पूर्व चेतावनी प्रणाली और डिजिटल स्वास्थ्य सहयोग महामारी के सबक से जुड़े हैं। ये लाभ तब दिखेंगे जब ऋण शर्तें पारदर्शी हों और परियोजनाएँ समय पर पूरी हों।
सबसे बड़ा संभावित लाभ अप्रत्यक्ष है। यदि विकासशील देश व्यापार, जलवायु वित्त और वैश्विक संस्थानों में बेहतर शर्तें हासिल करते हैं, तो विकास की लागत कम हो सकती है। यह लंबी दौड़ है। ब्रिक्स अभी वैकल्पिक व्यवस्था के प्रारंभिक चरण में है, पूरी व्यवस्था नहीं।
दिल्ली सम्मेलन ने दिखाया कि गहरे मतभेदों के बावजूद बातचीत संभव है। भारत ने अध्यक्ष के रूप में संतुलन साधने की क्षमता दिखाई। चीन की अध्यक्षता अगला अध्याय लिखेगी। आम नागरिक को 140 पैराग्राफ नहीं चाहिए। उसे अपेक्षाकृत स्थिर ईंधन, भरोसेमंद अनाज, सस्ता भुगतान और ऐसी तकनीक चाहिए जो उसके काम आए।
ब्रिक्स यदि केवल मंच बना रहता है तो इतिहास में एक और बैठक रह जाएगा। यदि आपूर्ति श्रृंखला, कृषि और भुगतान सचमुच सरल हुए तो ग्लोबल साउथ की आवाज का अर्थ खेत और बाजार में समझ में आएगा। यही इस सम्मेलन की कसौटी होनी चाहिए। घोषणापत्र की स्याही सूख चुकी है। अब परीक्षा काम की है।




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