राज्य दर राज्य छात्रों के दर्द पर बदलती सियासी आवाज़ें ...
खुद की सुल्तानी में बेईमानी और दूसरे के सुल्तानी में सेम मुद्दों पर जंग,लंबे समय तक नहीं चल सकती !
छात्रों की गूंज का राजनीतिकरण हो गया है. राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के राहुल गांधी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी के लिए अब अडानी को भी लेकर आ गए हैं. बीजेपी, आरएसएस तो पहले से ही उनके निशाने पर थे. अब प्रयागराज में इसके लिए अडानी को भी दोषी बता दिया है.छात्र आंदोलन पर 20 दिन तक संसद नहीं चलने दी.राहुल गांधी केवल जंतर-मंतर के संसद मार्च में छात्रों पर पुलिस बर्बरता पर ही गृह मंत्री का जवाब चाहते हैं. छात्रों के लिए ना सवाल का मतलब है ना ही जवाब से कोई समाधान होगा. समाधान की तरफ कोई भी बढ़ता दिखाई नहीं पड़ रहा है. अभी तक कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस या अन्य किसी दल की ओर से शिक्षा और परीक्षा सुधार के लिए रिफॉर्म का कोई भी सुझाव पब्लिक प्लेटफॉर्म पर नहीं आया है. दिल्ली का आंदोलन नीट पेपर लीक पर था. तो झारखंड का भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी पर केंद्रित है. प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक हो रहे हैं, तो भर्ती परीक्षाओं में सरकारों की मिलीभगत से पद बेचे जा रहे हैं. करोड़ों का लेनदेन हो रहा है. राज्यों में पब्लिक सर्विस कमीशन और दूसरे चयन अयोगों में जो भी नियुक्तियां होती है, वहीं से घोटाले की शुरुआत होती है.
कभी विशेषज्ञता और योग्यता को इसमें प्राथमिकता नहीं मिलती. हर सरकार अपने चाहतों को उपयुक्त करती है. सरकार नियुक्तियों में अपनी मर्जी चलाना चाहती है. पर्ची पर नियुक्तियां कराना कमाई का माध्यम बन गया है. प्राइवेट एजेंसियों को पूरी परीक्षा प्रक्रिया ऑनलाइन के नाम पर दे दी जाती है. यह एजेंसी ही सरकार से मिलकर भर्तीयों में घोटाले और बंदरबांट करती है.
झारखंड के लिए यह कोई नई बात नहीं है, पहले भी वहां भर्ती परीक्षाएं रद्द हुई हैं. जब से यह नया राज्य बना है तब से ही वहां नियुक्तियों में घोटाले साफ-साफ उजागर हुए हैं. सीएम, मंत्रियों और बड़े अफसर के भाई-भतीजे पीएससी में सेलेक्ट हो जाते हैं. नौकरियां मिल-जुलकर अपने परिवार में बांट ली जाती हैं. पहले भी कई परीक्षाएं रद्द हुई हैं. सीबीआई जांच भी हुई, अब फिर इसको लेकर आंदोलन हो रहा है. आंदोलनकारी विधानसभा का घेराव कर रहे हैं. सीएम हेमंत सोरेन छात्रों से बात करते दिख जरूर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वह अपनी सरकार के घोटाले की जांच केंद्रीय एजेंसी सीबीआई को सौंपना नहीं चाहते हैं. सभी परीक्षाओं को रद्द नहीं करना चाहते हैं.
झारखंड में बीजेपी विपक्ष में है. जो भी जहां भी विपक्ष में है, वह छात्रों के साथ खड़ा हो जाता है. जहां उस दल की सुल्तानी है, वहां छात्रों के मुद्दों पर बेईमानी होती है. सीजेपी छात्र आंदोलन का प्रतीक दिल्ली में बनी तो झारखंड के आंदोलन में राज्य के छात्रों में इसे गैर राजनीतिक मंच के रूप में प्रभावशाली ढंग से अंजाम देने में सफलता प्राप्त की.
सीजेपी, बीजेपी सरकार के खिलाफ़ उतरी थी, तो विपक्षी दल के गठबंधन की सरकार के खिलाफ़ खुलकर आना नहीं चाहती. केवल रील और वीडियो में समर्थन दे रहे हैं. राहुल गांधी छात्रों की गूंज को अपना हथियार बनाए हुए हैं, लेकिन झारखंड में उनकी भागीदारी की सरकार चल रही है. दिल्ली और रांची के छात्र आंदोलन में राहुल गांधी का अलग-अलग रुख उनके पूरे अभियान को ही एक्सपोज़ कर रहा है.
छात्रों के सामने समस्याएं अपार हैं, नेता विपक्ष के रूप में राहुल गांधी छात्रों की गूंज के कार्यक्रम जिस भी शहर में करते हैं, वहां छात्रों की भारी भीड़ होती है. प्रयागराज में भी उनका पूरा इवेंट काफी सफल रहा. राहुल गांधी ने जो भी वहां कहा उसमें पहली बार छात्रों के दर्द डेटा से कमाई के लिए अडानी को भी जिम्मेदार बताया.
छात्रों के मुद्दों पर भी वह बिना राजनीति के बढ़ नहीं पा रहे हैं. इस गैर राजनीतिक मुद्दे पर अगर वह अपना अभियान बिना राजनीति के चलाने में सफल हो जाते हैं, तो उसका राजनीतिक लाभ तो हर हालत में कांग्रेस को मिलता. कांग्रेस सांसद शशि थरूर राहुल गांधी के अभियान पर ही अप्रत्यक्ष सवाल खड़े करते हैं. उनका कहना है, कि खुद पर भी झांकना जरूरी है. इसका मतलब है कि आज देश में जो भी शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था है, उसका फाउंडेशन कांग्रेस ने ही रखा है. राहुल गांधी उसकी जितनी बुराई करेंगे वह कांग्रेस की ही बुराई से जुड़ेगा.
यह बात सही है कि केंद्र में बीजेपी की सरकार को लंबा समय हो गया है, लेकिन सिस्टम में सुधार एक सीमा तक ही हो सकता है. अगर कोई फाउंडेशन ही गलत स्थापित है तो फिर तो पहले उसको डिस्मेंटल करना होगा फिर नया निर्माण किया जा सकेगा.
प्रवेश परीक्षाओं से ज्यादा भर्ती परीक्षा में धांधलियों और घोटालों का मामला गंभीर है. अगर नौकरियां सरकार द्वारा मिलजुल कर बेची जाएंगी तो फिर योग्य छात्रों को तो मौका ही नहीं मिलेगा. जब से ऑनलाइन का प्रोसेस चालू हुआ है, तब से यह घोटाले संस्थागत रूप से बढ़ते हुए दिखाई पड़ते है.छात्रों की सियासी रहनुमाई अब शायद नहीं चल पाएगी. हर दल को अपनी सरकारों में छात्रों के दर्द और घाव पर मरहम लगाना पड़ेगा. केवल सियासी दांव के लिए उनका उपयोग काउंटर प्रोडक्टिव रहेगा.
खुद की सुल्तानी में बेईमानी और दूसरे के सुल्तानी में सेम मुद्दों पर जंग की रवानी लंबे समय तक नहीं चल सकती. जो राजनेता इस पर सियासी सोच रखते हैं वह GenZ की फीलिंग से कोसों दूर हैं. युवा हर रंग पहचानता है, वह असली और रंग सियार में अंतर करना बखूबी जानता है.



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