G News 24 : कक्षा के बिगड़ैल बच्चे जैसी होती जा रही विपक्ष की राजनीति !

 बहस के लिए मुद्दे हैनहीं,तो संसद और विधानसभा को ठप करना ही,इनका राजनीतिक मकसद है...

कक्षा के बिगड़ैल बच्चे जैसी होती जा रही विपक्ष की राजनीति !

कक्षा में जिस प्रकार एक बिगड़ैल बच्चा अपनी हरकतों से पूरे समय पढ़ाई का माहौल खराब करता रहता है, शिक्षक की बात नहीं सुनता और दूसरे विद्यार्थियों को भी परेशान करता है, उसी प्रकार आज देश में सत्ता से बाहर बैठी कुछ विपक्षी पार्टियों की राजनीति दिखाई देने लगी है।

इन दलों के पास सरकार को घेरने के लिए कोई ठोस और प्रभावी मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वे ऐसे विषयों को बार-बार उठाने का प्रयास कर रहे हैं, जिन पर सरकार पहले से ही कार्रवाई कर रही है या समाधान की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। इसके बावजूद विपक्षी दल न तो संसद को सुचारु रूप से चलने दे रहे हैं और न ही विधानसभाओं की कार्यवाही को शांतिपूर्वक आगे बढ़ने दे रहे हैं।

यहां सवाल केवल विरोध का नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। विपक्ष को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने, कमियों को उजागर करने, जनता की समस्याओं को सदन तक पहुंचाने और सरकार को जवाबदेह बनाने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब विरोध के नाम पर बार-बार हंगामा किया जाए, नारेबाजी हो, सदन की कार्यवाही बाधित की जाए और बहस का अवसर ही समाप्त कर दिया जाए, तब यह व्यवहार विपक्ष की गंभीरता और उसकी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

यदि किसी मुद्दे पर सरकार पहले से जांच कर रही है, कार्रवाई कर रही है या समाधान की दिशा में कदम उठा चुकी है, तो विपक्ष का दायित्व उस कार्रवाई की निगरानी करना, उसकी कमियों को सामने लाना और बेहतर सुझाव देना होना चाहिए। लेकिन हर मुद्दे को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाकर संसद और विधानसभा को ठप कर देना आखिर किस जनहित की राजनीति है?

संसद और विधानसभा किसी राजनीतिक दल की निजी चौपाल नहीं हैं। ये देश और प्रदेश की जनता की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं। यहां जनता से जुड़े कानूनों पर चर्चा होती है, बजट पर बहस होती है, विकास योजनाओं की समीक्षा की जाती है और सरकार से जवाब मांगा जाता है। जब सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित होती है, तो इन सभी महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा प्रभावित होती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही जनता के टैक्स के पैसे से चलती है। सदन का एक-एक मिनट अत्यंत मूल्यवान होता है। यदि राजनीतिक हंगामे के कारण कार्यवाही बार-बार स्थगित होती है, तो केवल समय ही बर्बाद नहीं होता, बल्कि देश का धन भी व्यर्थ खर्च होता है। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

जनता अपने प्रतिनिधियों को सदन में शोर मचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं पर चर्चा करने, सरकार से जवाब मांगने और समाधान खोजने के लिए चुनकर भेजती है। यदि विपक्ष के पास सरकार की नीतियों के विरुद्ध ठोस तर्क हैं, तो उन्हें सदन में तथ्यों और आंकड़ों के साथ रखा जाना चाहिए। यदि कोई वैकल्पिक नीति है, तो उसे जनता के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। लेकिन केवल विरोध के लिए विरोध और कार्यवाही बाधित करने की राजनीति से न तो जनता का हित होगा और न ही लोकतंत्र मजबूत होगा।

“जब मुद्दों पर बहस करने की तैयारी न हो और जनता को देने के लिए कोई ठोस विकल्प न हो, तब सदन में हंगामा राजनीतिक हथियार बन सकता है; लेकिन उसकी कीमत देश की जनता अपने समय और टैक्स के पैसे से चुकाती है।”

विपक्ष को यह समझना होगा कि सरकार का विरोध करना उसका अधिकार है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी भी है। सरकार से कठोर सवाल पूछे जाएं, उसकी कमियों को उजागर किया जाए, जनहित के मुद्दों पर संघर्ष किया जाए—लेकिन संसद और विधानसभा को बार-बार बाधित करके जनता के समय और धन की बर्बादी करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

पूछता है भारत…

आखिर संसद और विधानसभा को बार-बार बाधित करके विपक्ष क्या सिद्ध करना चाहता है? क्या यह जनता की समस्याओं का समाधान है, या फिर केवल राजनीतिक सुर्खियां बटोरने की रणनीति?

देश को केवल शोर मचाने वाला नहीं, बल्कि गंभीर सवाल पूछने, ठोस सुझाव देने और जनहित के लिए जिम्मेदारी से काम करने वाला विपक्ष चाहिए।

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