खुदी सड़कें, बरसाती गड्ढे और जुलूसों के बीच पिसता शहर...
ग्वालियर जाम है… और व्यवस्था बेखबर !
ग्वालियर। जिस शहर की राजनीतिक धड़कन से मध्य प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा तय होने की बात कही जाती है, आज वही ग्वालियर बदहाल यातायात व्यवस्था के सामने बेबस नजर आ रहा है। शहर में चल रहे विकास कार्यों के नाम पर जगह-जगह खुदी सड़कें, एलिवेटेड रोड का निर्माण, बारिश के बाद गड्ढों में भरा पानी, अस्त-व्यस्त ट्रैफिक और ऊपर से लगातार निकलते जुलूसों ने आम नागरिक की जिंदगी को मानो सड़कों पर ही रोक दिया है। सुबह घर से निकलने वाला व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसे अपने गंतव्य तक पहुंचने में दस मिनट लगेंगे या एक घंटा। सड़कों पर वाहन कम और वाहनों की लंबी कतारें ज्यादा दिखाई देती हैं। हर तरफ हॉर्न का शोर, रेंगता ट्रैफिक और जाम में फंसे परेशान लोग - यह दृश्य अब किसी असाधारण दिन का नहीं, बल्कि ग्वालियर की रोजमर्रा की तस्वीर बनता जा रहा है।
विकास जरूरी है, लेकिन व्यवस्था के साथ
एलिवेटेड रोड और अन्य निर्माण कार्य निश्चित रूप से शहर के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। विकास कार्यों का विरोध कोई समाधान नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि विकास के दौरान वर्तमान यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने की जिम्मेदारी किसकी है? जहां सड़कें खोदी गई हैं, वहां वैकल्पिक मार्ग कितने प्रभावी हैं? जहां गड्ढे हैं, वहां बैरिकेडिंग और सुरक्षा की व्यवस्था क्यों कमजोर है? बारिश के पानी की निकासी की तत्काल व्यवस्था क्यों नहीं की जाती? ट्रैफिक पुलिस की तैनाती और रूट डायवर्जन की प्रभावी योजना जमीन पर क्यों दिखाई नहीं देती? जनता को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जिसमें रोजमर्रा की जिंदगी ही अस्त-व्यस्त हो जाए।
जुलूस और आयोजन भी बन रहे यातायात की चुनौती
मिलाद-उन-नबी जैसे धार्मिक आयोजनों अथवा नेताओं के स्वागत में निकलने वाले जुलूस सामाजिक और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हो सकते हैं। समस्या आयोजन से नहीं, बल्कि यातायात प्रबंधन की कमी से है। जब शहर की प्रमुख सड़कें पहले से निर्माण कार्यों के कारण संकरी हों, तब बड़े जुलूसों और आयोजनों के लिए पहले से वैकल्पिक यातायात मार्ग, समय-निर्धारण और पर्याप्त पुलिस व्यवस्था होना जरूरी है। यदि प्रशासन को पता है कि किसी दिन शहर में बड़े आयोजन होने वाले हैं, तो उसी हिसाब से ट्रैफिक प्लान पहले से सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? जनता को समय रहते यह जानकारी क्यों नहीं दी जाती कि कौन-सा मार्ग बंद रहेगा और कौन-सा वैकल्पिक रास्ता इस्तेमाल किया जा सकता है?
गड्ढों में पानी नहीं, व्यवस्था की तस्वीर दिखाई देती है
बारिश के बाद सड़क के गड्ढों में भरा पानी केवल वाहन चालकों के लिए खतरा नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें सड़क निर्माण और जल निकासी को अलग-अलग समस्याओं की तरह देखा जाता है। पानी से भरे गड्ढे दिखाई नहीं देते और दोपहिया वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का बड़ा कारण बन सकते हैं। पैदल चलने वालों की परेशानी अलग है। कई जगह वाहन चालक गलत दिशा या फुटपाथ का सहारा लेने को मजबूर होते हैं, जिससे जाम और दुर्घटना दोनों का खतरा बढ़ जाता है। सवाल सिर्फ जाम का नहीं, जवाबदेही का है...
सबसे बड़ा सवाल यही है—इस अव्यवस्था की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
- नगर निगम?
- ट्रैफिक पुलिस?
- निर्माण एजेंसियां?
- जिला प्रशासन?
- या फिर इन सभी के बीच समन्वय की कमी?
आम नागरिक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सड़क किस विभाग ने खोदी है। उसे तो बस सुरक्षित और सुगम रास्ता चाहिए। उसे समय पर अपने कार्यालय, दुकान, अस्पताल, स्कूल या घर पहुंचना है। लेकिन जब जिम्मेदारी तय करने के बजाय विभाग एक-दूसरे की ओर देखने लगें, तब भुगतना जनता को ही पड़ता है।
ग्वालियर की पहचान जाम नहीं हो सकती
- ग्वालियर केवल एक शहर नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के राजनीतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण केंद्र है। जिस शहर की राजनीतिक अहमियत इतनी बड़ी हो, उसकी मूलभूत नागरिक व्यवस्थाएं इतनी कमजोर क्यों दिखाई दें—यह सवाल सत्ता और प्रशासन दोनों से पूछा जाना चाहिए।
- शहर को केवल बड़ी परियोजनाओं की जरूरत नहीं है। उसे बेहतर ट्रैफिक प्लानिंग, समयबद्ध निर्माण, मजबूत जल निकासी, सुरक्षित सड़कें और जिम्मेदार प्रशासन की भी उतनी ही आवश्यकता है।
- विकास की तस्वीर तब सुंदर लगेगी, जब उसके बीच आम आदमी की जिंदगी परेशान न हो।
- आज ग्वालियर की सड़कों पर गाड़ियों की कतारें हैं, हवा में हॉर्न का शोर है और लोगों के चेहरों पर बेचैनी। सवाल यह नहीं कि जाम कब खुलेगा। सवाल यह है कि ग्वालियर को इस लगातार बढ़ती अव्यवस्था से कौन मुक्त करेगा?
- क्योंकि जनता विकास के खिलाफ नहीं है। जनता उस विकास पर सवाल उठा रही है, जिसकी कीमत उसे रोज अपने समय, धैर्य और सुरक्षा से चुकानी पड़ रही है।
ग्वालियर पूछ रहा है - सड़कें कब खुलेंगी, रास्ते कब सुधरेंगे और व्यवस्था आखिर कब जागेगी?



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