G News 24 : भारत के युवाओं में बढ़ रहा RSS का क्रेज? आंकड़े दे रहे गवाही !

 नया भारत. युवाओं का भारत. बात उस भारत की जो अब सवाल पूछता है...

भारत के युवाओं में बढ़ रहा RSS का क्रेज? आंकड़े दे रहे गवाही !

आरएसएस का फोकस लगातार युवा पीढ़ी पर है. चाहे 100 शहरों में युवाओं के साथ बातचीत करना हो या फिर शाखाओं का आयोजन. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर क्यों युवाओं में आरएसएस का क्रेज बढ़ रहा है. चलिए जानते हैं.

नया भारत,युवाओं का भारत,बात उस भारत की जो अब सवाल पूछता है.

पुराने ढर्रे को हटाकर अपना रास्ता खुद बनाना चाहता है. पिछले दिनों जंतर-मंतर पर युवाओं का जोश हर किसी ने देखा. खुद पीएम मोदी ने इंस्टाग्राम पर आकर युवाओं से बात की. तो दूसरी ओर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा कि आज का युवा सवाल पूछता है और इसमें कुछ गलत नहीं है. इस वक्त आरएसएस युवाओं के बीच अपनी पहुंच लगातार बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. ये वो युवा हैं, जो 1997 से लेकर 2012 और 2013 से लेकर 2025 के बीच पैदा हुए हैं. 

एक शताब्दी, नई पीढ़ी के साथ

1925 में कुछ युवाओं ने नागपुर में एक छोटी-सी शाखा से जो शुरुआत की थी, वह 100 साल की यात्रा पूरी कर एक व्यापक वटवृक्ष बन चुकी है. संघ की 100 वर्ष की इस यात्रा को केवल एक संगठन के विस्तार की कहानी के रूप में नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी युवा शक्ति को सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व से जोड़ने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है. युवा ऊर्जा केवल परिवर्तन की शक्ति नहीं, राष्ट्र निर्माण की शक्ति भी है. जरूरत केवल यह तय करने की है कि उस ऊर्जा को किस दिशा में लगाया जाए.

RSS की स्थापना के समय बड़ी संख्या में जुड़े थे युवा 

आज युवा शक्ति के सामने तकनीक, उद्यम और नवाचार के नए अवसर हैं. डिजिटल इंडिया, भारतनेट और यूपीआई जैसी पहलों ने गांवों और छोटे शहरों के युवाओं के लिए नए रास्ते खोले हैं. स्मार्टफोन के माध्यम से युवा ऑनलाइन कारोबार, कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स से जुड़ रहे हैं. यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फ्रीलांसिंग जैसे माध्यम उन्हें वैश्विक बाजार से जोड़ रहे हैं. युवा शक्ति को केवल विरोध और आक्रोश की दृष्टि से देखना उसके व्यापक सामर्थ्य को सीमित करना होगा. लोकतंत्र में गलत नीतियों और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना अधिकार है, लेकिन उसी ऊर्जा को शिक्षा, तकनीक, उद्यम, सेवा और राष्ट्र निर्माण में लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

हालांकि, आरएसएस ने इसे किसी खास वर्ग से नहीं जोड़ा है 

अगस्त 2026 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 100 शहरों के 2000 युवाओं से चर्चा की. साल 2025 का आरएसएस का डेटा दिखाता है कि आरएसएस के ट्रेनिंग प्रोग्राम के 2.22 लाख प्रतिभागियों में से 1.63 लाख युवाओं की उम्र 14-25 वर्ष थी. हालांकि, आरएसएस ने इसे किसी खास वर्ग से नहीं जोड़ा, उसने कहा कि युवाओं ने इस ट्रेनिंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. 

यानी युवाओं को आरएसएस पसंद है. ऐसा हम नहीं कह रहे, बल्कि आंकड़े बोल रहे हैं !

RSS के शताब्दी वर्ष के दौरान समाज में, खासकर युवाओं में RSS के प्रति दिलचस्पी काफी बढ़ी है और वे संघ की गतिविधियों से जुड़ने के इच्छुक हैं. 'Join RSS' ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए, जनवरी और जुलाई 2025 के बीच 55,423 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया, जबकि 2026 की इसी अवधि में 1,23,287 लोगों ने RSS से जुड़ने में दिलचस्पी दिखाई. इसी तरह, जुलाई 2025 में 9,718 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया. जुलाई 2026 में यह संख्या 24,086 थी. दिलचस्पी दिखाने वालों में से 65% से ज्यादा लोग 30 साल से कम उम्र के हैं, जबकि लगभग 85% लोग 40 साल से कम उम्र के हैं. ये आंकड़े युवा पीढ़ी के बीच RSS की सकारात्मक सामाजिक पहलों में बढ़ती दिलचस्पी को दिखाते हैं.

युवाओं की तरफ आरएसएस का जोर 

केशव बलिराम हेडगेवार सिर्फ 36 साल के थे, जब उन्होंने सितंबर 1925 में आरएसएस की नींव रखी थी. एमएस गोलवलकर की उम्र सिर्फ 34 साल थी, जब वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक बने थे. दीनदयाल उपाध्याय सिर्फ 35 साल के थे, जब वह 1951 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक महासचिव बने थे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की उम्र सिर्फ 34 साल की थी, जब वह 1934 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने थे और 50 साल की उम्र यानी 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी. 51 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई थी. अटल बिहारी वाजपेयी 32 साल के थे, जब साल 1957 में वह पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए थे. नरेंद्र मोदी 22 साल के थे, जब 1972 में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने थे.

ये लोग पुरानी जनरेशन से ज्यादा ईमानदार और देशभक्त हैं

इसे पढ़कर आप यह तो समझ गए होंगे कि संघ से आते हैं या उससे जो लोग जुड़े रहे हैं, उन्होंने बेहद कम उम्र में ही काम शुरू कर दिया था.आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जब मुंबई में युवाओं से बातचीत की थी. तब उन्होंने कहा था कि मौजूदा युवाओं को बाकी की पीढ़ी की तरह नहीं मानना चाहिए. ना ही उससे उनकी तुलना होनी चाहिए. उन्होंने उनका बचाव करते हुए कहा था कि ये लोग पुरानी जनरेशन से ज्यादा ईमानदार और देशभक्त हैं.

क्यों युवाओं का बढ़ रहा आरएसएस को लेकर रुझान?

जॉइन आरएसएस मुहिम की बात करें तो 2012 से इस पहल के जरिए 25 लाख से ज्यादा लोग जुड़े हैं. इनमें से 11 प्रतिशत 22 साल से कम उम्र के हैं, लगभग 62 प्रतिशत 22-35 साल की उम्र के हैं और 18 प्रतिशत 36-50 साल की उम्र के हैं. हर साल, एक लाख से ज्यादा छात्र RSS के कम समय वाले रेजिडेंशियल ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लेते हैं, जो हर एक हफ़्ते से ज्यादा समय तक चलते हैं. 

अकेले पिछले साल, देश भर में 20,000 से ज़्यादा युवाओं ने ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया

अकेले पिछले साल, देश भर में 20,000 से ज़्यादा युवाओं ने इसके लंबे रेजिडेंशियल ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया, जो दो से चार हफ्ते तक चले. इन आंकड़ों से RSS को यह धारणा बदलने में मदद मिलती है कि यह संगठन सिर्फ पुरानी पीढ़ी के लोगों का है. ये आंकड़े युवा नेतृत्व (तरुण स्वयंसेवकों) की लगातार मौजूदगी को दिखाते हैं, जो संगठन के जमीनी नेटवर्क को बनाए रखते हैं. संघ की तरफ से चलाए जा रहे कार्यक्रमों में युवा प्रतिभागियों को समकालीन सामाजिक अभियानों की तरफ तेजी से प्रेरित किया जा रहा है, जैसे कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता, पारिवारिक मूल्य और स्थानीय समुदाय की सेवा (पंच परिवर्तन).

क्या चीज है जो युवाओं को आरएसएस की ओर आकर्षित कर रही है

अब सवाल उठता है कि क्या चीज युवाओं को आरएसएस की ओर आकर्षित कर रही है.RSS युवाओं को आकर्षित करने के लिए भारतीय इतिहास, विरासत और पहचान को पश्चिमी मॉडलों के बजाय आत्मनिर्भरता (स्वदेशी) और स्वदेशी विकास मॉडलों को गर्व के नजरिए से पेश करता है.युवाओं को यह चीज काफी लुभाती है. युवा लोग अपनी ज्यादातर जिंदगी सोशल जिंदगी ऑनलाइन बिताती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि असल दुनिया में किसी समुदाय का हिस्सा बनने की चाहत खत्म हो जाती है. शाखा एक ऐसा समुदाय है, जहां लोग असल में मिलते-जुलते हैं. एक-दूसरे से मिलना, साथ में कसरत करना, मुद्दों पर चर्चा करना और गतिविधियों में हिस्सा लेना. हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि RSS में किशोरों और युवाओं के लिए अलग-अलग शाखाएं हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर दिन आरएसएस की करीब 83000 शाखा लगती हैं। 

पूरे भारत में हर हफ्ते 32000 मीटिंग्स होती हैं

पूरे भारत में हर हफ्ते 32000 मीटिंग्स होती हैं. इसके अलावा,  RSS से जुड़ी गतिविधियों की रिपोर्टों से पता चलता है कि अब पारंपरिक वैचारिक विषयों पर ही निर्भर रहने के बजाय AI, टेक्नोलॉजी और समकालीन मुद्दों जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है. संगठन ने 15-30 साल के युवाओं के लिए खास तौर पर प्रोग्राम भी तैयार किए हैं.

आरएसएस ने बदल दी रणनीति

वहीं युवा पीढ़ी स्थापित विचारों पर सवाल उठाने और अपनी राय खुलकर रखने के लिए जानी जाती है, ऐसे में आरएसएस ने उनसे जुड़ने के तरीकों में बदलाव किया है. जैसे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि युवा तर्क और बातचीत चाहते हैं. वह वही नहीं करेंगे, जो उनसे करने के लिए कहा जाएगा. उन्होंने 100 शहरों में युवाओं से जुड़कर बातचीत की. यह उस संगठन के लिए बेहद अहम है, जो पारंपरिक रूप से अनुशासन और एक व्यवस्थित पदानुक्रम से जुड़ा रहा है. यानी आरएसएस लगातार युवाओं से जुड़ने, उनके विचारों को जानने के लिए काम कर रही है. 

आपको एक दिलचस्प बात बता दें कि सार्वजनिक मंचों पर दिखने वाले कई RSS पदाधिकारी काफी उम्रदराज लगते हैं, लेकिन युवा कार्यकर्ताओं को जोड़ने पर संगठन के लगातार ध्यान देने की वजह से RSS स्वयंसेवक की औसत उम्र घटकर 28 साल हो गई है. लक्ष्य इस औसत उम्र को 25 साल से कम करना है.

अगर संगठन की रीढ़ माने जाने वाले पूर्णकालिक RSS कार्यकर्ताओं, जिन्हें 'प्रचारक' कहा जाता है, पर नजर डालें तो ऐसे कई छात्र हैं, जिन्होंने हाल ही में कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है और पूर्णकालिक RSS कार्यकर्ता के तौर पर सेवा करते हुए राष्ट्र-निर्माण में अपने जीवन के कुछ साल समर्पित करने का फैसला किया है.

संघ की परंपरा इन युवाओं को संगठन के लिए पूर्णकालिक काम करते हुए अपनी हायर एजुकेशन जारी रखने के लिए भी प्रोत्साहित करती है. शुरुआत में उन्हें 'विस्तारक' के तौर पर शामिल किया जाता है, जिन्हें एक या दो साल तक पूर्णकालिक काम करने की जिम्मेदारी दी जाती है. इस अवधि के बाद, कुछ लोग पारिवारिक जीवन जीने के लिए लौट जाते हैं, जबकि कई अन्य काम जारी रखते हैं और अपना पूरा जीवन राष्ट्र-निर्माण के लिए समर्पित कर देते हैं.

चुनावों में दिखेगा युवाओं का बड़ा असर

एक सवाल यह भी उठता है कि क्या RSS का युवाओं पर फोकस सिर्फ संगठन को बढ़ाने के बारे में है या फिर आने वाले सालों में इसका BJP और बड़े राजनीतिक माहौल पर भी कोई व्यापक असर पड़ सकता है? दरअसल, इस कोशिश के नतीजे सिर्फ RSS की सदस्यता बढ़ाने से कहीं ज्यादा हो सकते हैं. इसका असर इस बात पर पड़ सकता है कि BJP कैसे प्रचार करती है. संघ परिवार अपनी अगली पीढ़ी की लीडरशिप कैसे तैयार करता है, और यहां तक कि दूसरी पार्टियां युवा वोटरों से कैसे बातचीत करती हैं.

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2025 की वोटर लिस्ट में 18-29 साल की उम्र के 21.7 करोड़ मतदाता हैं.2024 में भारत के कुल मतदाताओं में इस आयु वर्ग की हिस्सेदारी 22.78% थी. अनुमान है कि 2029 तक 1997-2012 के बीच पैदा हुए लोग भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी बन जाएगी, जिसमें 18 से 32 साल की उम्र के लगभग 38 करोड़ लोग शामिल होंगे. हाल ही में युवाओं के नेतृत्व में हुए विरोध-प्रदर्शनों से यह भी पता चला है कि यह पीढ़ी नौकरी, परीक्षा, शिक्षा और सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए तेजी से एकजुट हो सकती है.इसलिए संघ इन पर तेजी से फोकस और खुद से जोड़ने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा है.

क्या कहते हैं संघ के पदाधिकारी?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख सुनील आंबेकर ने प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा कि संघ शताब्दी वर्ष के दौरान में समाज में आरएसएस के प्रति आकर्षण काफी बढ़ रहा है। संघ की वेबसाइट पर 'जॉइन आरएसएस' के माध्यम से वर्ष 2025 में जनवरी से जुलाई के बीच 55,423 लोगों ने संघ से जुड़ने के लिए पंजीकरण करवाया था, जबकि 2026 में इसी अवधि के दौरान संख्या ढाई गुना बढ़कर 1,23,287 हो गई है। जुलाई 2025 में संख्या 9,718 रही, जबकि जुलाई 2026 में 24,086 लोगों ने इच्छा व्यक्त की है। इनमें 30 वर्ष से कम आयु के युवा लगभग 65 प्रतिशत हैं और 40 वर्ष से कम आयु के लोग 85 प्रतिशत हैं। प्रेस ब्रीफिंग के दौरान दक्षिण मध्य क्षेत्र के सह संघचालक दूसी रामकृष्ण, अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी उपस्थित रहे।

क्या बोले संघ की सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़ी पुस्तकें प्रकाशित करने वाली संस्था सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली ने जी न्यूज से बात करते हुए कहा, युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ऊर्जा होती है. यही ऊर्जा सही दिशा में चले तो निर्माण करती है और नकारात्मकता से प्रभावित हो, तो टकराव को जन्म दे सकती है. इसलिए सवाल युवा शक्ति का नहीं, उसकी दिशा का है. भारत की परंपरा में स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए प्रेरणा रहे हैं. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खान, अब्दुल हमीद, सावरकर और वीर गोकुला जैसे राष्ट्रनायकों ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि युवा शक्ति व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित हो सकती है.


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