दुनिया पर मंडराया बड़ा खतरा, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी...
इंसानी भूल से दशकों पुराना 'जानलेवा जहर' समुद्र में हुआ लीक !
अटलांटिक महासागर की 15,000 फीट गहराई में दफन 2 लाख से ज्यादा रेडियोएक्टिव बैरलों में रिसाव की पुष्टि वैज्ञानिकों ने की है. फ्रांसीसी रिसर्चर्स के NODSSUM प्रोजेक्ट ने खुलासा किया है कि जंग खा चुके इन डिब्बों से खतरनाक परमाणु कचरा समुद्री अब बाहर आ रहा है, जो पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन रहा है.
समुद्र में मिला 2 लाख बैरल रेडियोएक्टिव कचरा
अटलांटिक महासागर की गहराइयों में दशकों से दफन एक ऐसा खतरा अब सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है. 20वीं सदी में जिस रेडियोएक्टिव कचरे को समुद्र के अथाह पानी में यह सोचकर फेंक दिया गया था कि वह अपने आप नष्ट हो जाएगा, आज वही इंसानी भूल महासागर के इकोसिस्टम के लिए बड़ा खतरा बन चुका है. 15,000 फीट से ज्यादा की गहराई में जंग खा चुके लोहे के बैरल अब धीरे-धीरे फटने लगे हैं और उनसे निकलने वाला जानलेवा जहर चुपचाप समुद्री जिंदगी में घुल रहा है.
फ्रांस के रिसर्च प्रोजेक्ट NODSSUM के तहत चलाए गए एक अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने समुद्र की तलहटी में 200,000 से ज्यादा रेडियोएक्टिव कचरे के बैरल खोजे हैं. जांच में खुलाया हुआ है कि कई बैरल इतने ज्यादा जंग खा चुके हैं कि उनका खतरनाक कचरा आसपास के कीचड़ में फैल चुका है.
15,400 फीट की गहराई में हुई खोज
27 मई से 28 जून 2026 के बीच चले इस प्रोजेक्ट में पोर्कवा पा? जहाज पर सवार करीब 30 वैज्ञानिकों की टीम ने भाग लिया. टीम ने नॉटिल नाम की सबमर्सिबल यानी पनडुब्बी के जरिए समुद्र में 15,400 फीट से ज्यादा गहराई में 20 बार गोता लगाया. दशकों बाद पहली बार डिब्बों को इतने करीब से देखा गया है.
रेडियोएक्टिव तत्वों का बढ़ा स्तर
समुद्र के अंदर ली गई रीडिंग में बैकग्राउंड लेवल से ज्यादा रेडियोन्यूक्लाइड्स पाए गए हैं. इनमें कोबाल्ट-60 और नियोबियम-94 की मौजूदगी सबसे बड़ा सबूत है कि यह कचरा न्यूक्लियर प्लांट का ही हिस्सा है, क्योंकि यह सामान्य पर्यावरणीय फॉलआउट में नहीं मिलते. इनके साथ ही सीजियम-137 और अमेरिशियम-241 भी रिकार्ड किए गए हैं, हालांकि इनका संबंध पुराने परमाणु परीक्षणों या दुर्घटनाओं से भी हो सकता है.
बैरल पर बस गई समुद्री दुनिया
चौंकाने वाली बात यह भी है कि जहां तक नजर जाए, समुद्री तलहटी में सिर्फ नरम कीचड़ है. ऐसे में इन लोहे के बैरलों ने समुद्री जीवों के लिए चट्टान जैसा ठोस सहारा दे दिया है. एनीमोन, स्पंज और केकड़ों जैसे जीवों ने इन डिब्बों पर अपना घर बना लिया है.
क्या यह समुद्री जीव इस रेडियोएक्टिव कचरे को सोख रहे हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए वैज्ञानिकों ने बैरल के पास के पानी, मिट्टी, छोटे जीवों और समुद्री जीवों के सैंपल लिए हैं. इनकी तुलना आसपास के प्राकृतिक चट्टानी इलाकों से मिले सैंपल से की जाएगी.
कचरा लीक होना ही थी पुरानी रणनीति
रिसर्च के अनुसार यह कम तीव्रता वाला कचरा था, जिसे कंक्रीट या बिटुमेन के साथ मिलाकर धातु के डिब्बों में सील किया गया था. जानकारों का मनना है कि उस दौर में इसे हमेशा के लिए बंद रखने का इरादा नहीं था. तब की प्लानिंग यह थी कि कचरा धीरे-धीरे लीक होगा और समुद्र के विशाल पानी में मिलकर बेअसर हो जाएगा.
किसने फेंका इतना कचरा?
फ्रांसीसी राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र यानी CNRS के रिकार्ड के अनुसार अकेले फ्रांस ने 1967 और 1969 के दो अभियानों में 46,000 से ज्यादा बैरल समुद्र में डुबाए थे. हालांकि, इस डंपिंग ग्राउंड का इस्तेमाल कई दूसरे यूरोपीय देशों ने भी किया था, इसलिए रिसर्चर्स अब यह भी पता लगा रहे हैं कि कौन सा बैरल किस देश का है.
इससे पहले पिछले साल युलिक्स नाम के रोबोट ने मैपिंग सर्वे करके 3,355 डिब्बों की सटीक लोकेशन खोजी थी. उसने 5,000 लीटर पानी, 345 सेडिमेंट कोर और 34 मछलियों व केकड़ों के सैंपल जुटाए थे, जिसकी सहायता से 2026 के इस अभियान में वैज्ञानिक सीधे खास बैरलों तक पहुंच सके.
अब आगे क्या?
क्लेरमोंट ओवरन्यू यूनिवर्सिटी के पैट्रिक शार्दों और पेरिस स्थित ईएनएस के जावियर एस्कार्टिन इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं. एस्कार्टिन के मुताबिक बड़ा सवाल था कि क्या रेडियोन्यूक्लाइड्स बाहर निकले हैं और किस रूप में हैं. इसका आधा जवाब मिल चुका है, कचरे का रिसाव कंफर्म हो गया है. अब आने वाले महीनों में लैब जांच से यह साफ होगा कि यह रिसाव किस रूप में है और कितना फैल चुका है.
नॉर्थ-ईस्ट अटलांटिक की सुरक्षा पर नजर रखने वाली संस्था ओस्पार कन्वेंशन इस प्रोजेक्ट के शुरुआती नतीजों का इस्तेमाल अपने पुराने डंपिंग साइट्स के डेटा को अपडेट करने के लिए कर रही है.



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