विपक्ष का सिर्फ एक ही काम हर निर्णय में कमी निकालो,आरोप लगाओ और भाग जाओ ...
शिक्षा पर आंदोलन सिर्फ राजनीति है,समाधान या सुझाव कुछ भी नहीं,सवालों के घेरे में विपक्ष की मंशा !
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करना हर नागरिक का अधिकार है। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता होती है या पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई और व्यवस्था में सुधार की मांग स्वाभाविक है। लेकिन जब किसी आंदोलन का केंद्र केवल किसी एक मंत्री का इस्तीफा बन जाए और व्यवस्था सुधार के ठोस सुझाव पीछे छूट जाएं, तब आंदोलन की मंशा पर प्रश्न उठना भी स्वाभाविक हो जाता है।
जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान बार-बार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रमुखता से उठाई गई। सवाल यह है कि यदि उद्देश्य वास्तव में छात्रों का हित और परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाना था, तो क्या केवल इस्तीफा ही समाधान था? क्या प्रदर्शनकारियों और उनका समर्थन कर रही राजनीतिक पार्टियों ने परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने, तकनीकी सुधार, जवाबदेही तय करने या भविष्य में पेपर लीक रोकने के लिए कोई ठोस मांग रखी, व्यवस्था में सुधार के लिए विपक्षी पार्टीयों ने कौन-कौन से सुझाव दिए यह भी देश को बताना चाहिए।
पेपर लीक जैसी घटनाएं अक्सर एक जटिल प्रशासनिक और आपराधिक नेटवर्क से जुड़ी होती हैं। यदि किसी जांच में सिस्टम के भीतर बैठे लोग दोषी पाए जाते हैं, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई होना आवश्यक है। ऐसे में केवल राजनीतिक जिम्मेदारी तय करने की मांग के साथ-साथ संस्थागत सुधार की मांग भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए। यदि किसी मंत्री के इस्तीफे के बाद भी व्यवस्था में सुधार नहीं होता, तो छात्रों की मूल समस्या जस की तस बनी रहती है।
आंदोलन के दौरान हिंसा, पत्थरबाजी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तथा पुलिस और मीडिया कर्मियों पर हमले जैसी घटनाएं भी सामने आईं। यदि कोई व्यक्ति शांतिपूर्ण विरोध के नाम पर हिंसा करता है, तो कानून के अनुसार उसके विरुद्ध कार्रवाई होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे मामलों में दोषियों का राजनीतिक संरक्षण नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और न्याय होना चाहिए।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन विरोध और अराजकता के बीच एक स्पष्ट रेखा भी है। छात्रों की वास्तविक समस्याओं को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनाने से सबसे अधिक नुकसान उन्हीं युवाओं का होता है, जिनके भविष्य की बात की जाती है। यदि कोई भी राजनीतिक दल वास्तव में शिक्षा सुधार चाहता है, तो उसे केवल विरोध नहीं, बल्कि ठोस नीति सुझाव, जवाबदेही की व्यवस्था और दीर्घकालिक सुधार का रोडमैप भी प्रस्तुत करना चाहिए।
देश के सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आंदोलनों के लिए यह एक सीख है कि छात्रों की भावनाओं का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए नहीं होना चाहिए। शिक्षा, रोजगार और युवाओं का भविष्य दलगत राजनीति से ऊपर का विषय है। यदि आंदोलन जनहित का है तो वह समाधान-केंद्रित होना चाहिए, न कि केवल टकराव-केंद्रित।
चेतावनी भी और सीख भी....
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान है, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति और कानून व्यवस्था को चुनौती देने का कोई औचित्य नहीं हो सकता। जो भी व्यक्ति या संगठन लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में अराजकता फैलाने का प्रयास करेगा, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होना आवश्यक है। वहीं सभी राजनीतिक दलों के लिए यह भी संदेश है कि युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर राजनीति से अधिक प्राथमिकता समाधान, जवाबदेही और व्यवस्था सुधार को दी जानी चाहिए।



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