जबलपुर और ग्वालियर में दिखा गुस्सा...
VIP कल्चर से परेशान जाम में फंसे लोगों ने,सीएम मोहन यादव का काफिला निकलने तक बजाए हॉर्न !
ग्वालियर। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दौरे के दौरान वीआईपी कल्चर को लेकर आम लोगों की नाराजगी खुलकर सामने आई। जबलपुर और ग्वालियर में मुख्यमंत्री के काफिले के गुजरने तक ट्रैफिक रोके जाने से परेशान लोगों ने अनोखे तरीके से विरोध दर्ज कराया। जाम में फंसे लोगों ने लगातार अपनी गाड़ियों के हॉर्न बजाए और वीआईपी संस्कृति खत्म करने की मांग उठाई। दोनों शहरों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं और इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है।
जबलपुर में काफिले के दौरान रुका ट्रैफिक
घटना 1 जुलाई 2026 की है, जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जबलपुर दौरे पर पहुंचे थे। उनके दो सरकारी कार्यक्रम निर्धारित थे। एक कार्यक्रम से दूसरे कार्यक्रम के लिए जाते समय रानीताल गेट नंबर-2 के पास सुरक्षा कारणों से पुलिस ने ट्रैफिक रोक दिया। कई मिनट तक सड़क पर वाहनों की लंबी कतार लग गई और लोग अपने-अपने जरूरी कामों के लिए इंतजार करते रहे। इसी दौरान अचानक कई वाहन चालकों ने अपनी गाड़ियों के हॉर्न बजाने शुरू कर दिए। यह किसी अव्यवस्था या झुंझलाहट का सामान्य प्रदर्शन नहीं था, बल्कि लोगों ने इसे वीआईपी कल्चर के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध बताया।
ग्वालियर में भी सामने आया ऐसा ही विरोध
जबलपुर की तरह ग्वालियर में भी मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान ट्रैफिक रोकने पर लोगों की नाराजगी देखने को मिली। यहां एक युवक का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह पुलिस से कहता नजर आया कि उसका बेटा उसका इंतजार कर रहा है, लेकिन वीआईपी काफिले के कारण उसे आगे नहीं जाने दिया जा रहा। वीडियो में आसपास मौजूद कई लोग भी लगातार अपनी गाड़ियों के हॉर्न बजाते दिखाई दिए। युवक ने पुलिसकर्मियों से सवाल किए और पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कर दिया।
पुलिस ने बताई मजबूरी
घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने लोगों को समझाने की कोशिश की कि वे केवल सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कर रहे हैं। उनका कहना था कि वीआईपी ड्यूटी के दौरान उच्च अधिकारियों के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है और जब तक वीआईपी का काफिला सुरक्षित नहीं निकल जाता, तब तक आम ट्रैफिक को रोका जाता है। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि यह व्यवस्था मुख्यमंत्री सहित अन्य संरक्षित व्यक्तियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।
"नेताओं को भी आम लोगों की तरह चलना चाहिए"
जाम में फंसे स्थानीय निवासी सचिन गुप्ता ने बताया कि उन्हें एक जरूरी काम से तत्काल कहीं पहुंचना था, लेकिन मुख्यमंत्री के काफिले के कारण ट्रैफिक रोक दिया गया। उनका कहना था कि लोगों ने बिना किसी नारेबाजी या हंगामे के सिर्फ हॉर्न बजाकर अपनी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में नेताओं को भी आम नागरिकों की तरह सामान्य ट्रैफिक व्यवस्था का पालन करना चाहिए। बार-बार वीआईपी मूवमेंट के कारण आम लोगों का समय और काम प्रभावित होता है।
आखिर इतना बड़ा क्यों होता है वीआईपी काफिला?
भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा वीआईपी सुरक्षा को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इन प्रोटोकॉल के अनुसार मुख्यमंत्री के काफिले में सुरक्षा स्तर और परिस्थिति के अनुसार वाहनों की संख्या तय की जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार न्यूनतम सुरक्षा व्यवस्था में 8 से 10 वाहनों का काफिला पर्याप्त माना जा सकता है। हालांकि व्यवहारिक रूप से मुख्यमंत्री के आधिकारिक काफिले में लगभग 30 से 35 वाहन शामिल रहते हैं। यदि इसमें मंत्रियों, विधायकों, पार्टी पदाधिकारियों और अन्य अधिकारियों के वाहन भी जुड़ जाएं तो यह संख्या 50 से 60 तक पहुंच जाती है। इतने बड़े काफिले को तेज गति से निकालने के लिए कई प्रमुख मार्गों पर कुछ समय के लिए ट्रैफिक रोकना पड़ता है, जिससे आम नागरिकों को असुविधा होती है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
जबलपुर और ग्वालियर की घटनाओं के वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर वीआईपी कल्चर को लेकर बहस तेज हो गई है। कई लोगों का कहना है कि सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन इसके लिए आम जनता को लंबे समय तक परेशान नहीं किया जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और सुरक्षा एजेंसियों को तय प्रोटोकॉल का पालन करना ही पड़ता है।
सुरक्षा और सुविधा के बीच संतुलन की जरूरत
यह घटनाक्रम एक बार फिर उस पुराने सवाल को सामने लाता है कि वीआईपी सुरक्षा और आम नागरिकों की सुविधा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सुरक्षा एजेंसियों के लिए मुख्यमंत्री और अन्य संरक्षित व्यक्तियों की सुरक्षा सर्वोच्च जिम्मेदारी होती है, वहीं नागरिक चाहते हैं कि सुरक्षा व्यवस्था ऐसी हो जिससे सामान्य जनजीवन पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
जबलपुर और ग्वालियर में हॉर्न बजाकर किया गया यह विरोध किसी राजनीतिक प्रदर्शन से अधिक नागरिक असुविधा के खिलाफ उठी आवाज के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में प्रशासन के सामने चुनौती यही रहेगी कि सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करते हुए आम जनता की परेशानियों को भी यथासंभव कम किया


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