G News 24 : 16 जिलों के 213 'अटैच' दफ्तरों में बाबूगीरी करने वाले शिक्षक लौटेंगे अपने स्कूलों की ओर ...

 विधानसभा में सवाल उठा तो सरकार की खुली आंखें !

16 जिलों के 213 'अटैच' दफ्तरों में बाबूगीरी करने वाले शिक्षक लौटेंगे अपने स्कूलों की ओर ...

एक शिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है, लेकिन मध्य प्रदेश की व्यवस्था ने वर्षों तक कई शिक्षकों को "राष्ट्र निर्माता" नहीं, बल्कि कार्यालयों का बाबू बनाकर रखा। कहीं कलेक्टर कार्यालय, कहीं एसडीएम कार्यालय, कहीं जिला पंचायत, कहीं निर्वाचन शाखा और कहीं जनप्रतिनिधियों के कार्यालय, यानी ब्लैकबोर्ड छोड़कर फाइलों के बीच गुरुजी की ड्यूटी लग गई। उधर सरकारी स्कूलों में बच्चे शिक्षक का इंतजार करते रहे और इधर कार्यालयों में सरकारी व्यवस्था "अटैचमेंट संस्कृति" का आनंद लेती रही।

30 जुलाई 2025 को विधानसभा में सिरोंज से भाजपा विधायक उमाकांत शर्मा के सवाल के आधार पर हुई जिला स्तरीय समीक्षा के बाद की गयी है। शिक्षा विभाग की लिस्ट के अनुसार कई शिक्षक विधायक ऑफिसों में निजी सहायक (पीए) के रूप में कलेक्टर कार्यालयों, जिला पंचायत, निर्वाचन कार्यालय, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, जनपद पंचायत, एसडीएम कार्यालय और अन्य प्रशासनिक कार्यालयों में सालों से अटैच होकर काम कर रहे थे। अब सभी को मूल स्कूलों में कार्यभार ग्रहण करने के लिये तत्काल रिलीव करने के आदेश जारी किये गये है।

16 जिलों के 213 शिक्षक स्कूल के अलावा कार्यालय में तैनात

लोक शिक्षण संचालनालय की समीक्षा में उज्जैन, देवास, नीमच, शहडोल, दतिया, ग्वालियर, भिंड, श्योपुर, रीवा, कटनी, गुना, सिंगरौली, सतना, राजगढ़ और मंडला समेत 16 जिलों के 213 शिक्षकों के संलग्नीकरण का विवरण सामने आया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि सभी को उनके मूल विद्यालयों में वापिस भेजा जाये। ताकि स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था प्रभावित न हो।

विधायक से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक लगे थे शिक्षक

विधायक कार्यालयों में निजी सहायक (पीए) के रूप में कलेक्टर कार्यालय,  जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, जिला पंचायत, जनपद पंचायत, एसडीएम कार्यालय, जिला निर्वाचन कार्यालय, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कार्यालय, सीईओ जनपद कार्यालय, अन्य प्रशासनिक कार्यालय।

विधानसभा में सवाल के बाद हुई कार्रवाई

पिछले विधानसभा सत्र में स्कूलों से बाहर संलग्न शिक्षकों का मुद्दा तारांकित प्रश्न क्रमांक-1108 के माध्यम से उठाया गया था। इसके बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने सभी जिलों से जानकारी मंगाई। मानसून सत्र शुरू होने से पहले संचालनालय ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को संलग्नीकरण समाप्त कर संबंधित शिक्षकों को मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में वापस भेजने के निर्देश दिए हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार को यह सच्चाई पहले दिखाई नहीं दे रही थी?

अगर शिक्षक का काम दफ्तर में फाइलें संभालना था, तो फिर शिक्षक की भर्ती क्यों हुई? और अगर उसका काम बच्चों को पढ़ाना है, तो वर्षों तक उसे स्कूल से दूर किसने रखा?

सच तो यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब, ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों ने इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत चुकाई। जिनके पास निजी स्कूल का विकल्प नहीं था, उनके हिस्से का शिक्षक वर्षों तक किसी न किसी कार्यालय की शोभा बढ़ाता रहा।

सरकार का यह निर्णय स्वागत योग्य है, लेकिन यह सुधार की शुरुआत तभी माना जाएगा जब ऐसी व्यवस्था दोबारा न बनने दी जाए और हर सरकारी स्कूल में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हों।

"गुरुजी की नई पाठशाला"

ब्लैकबोर्ड की जगह फाइलें...चॉक की जगह नोटशीट... और बच्चों की जगह अधिकारी...

और फिर सवाल—सरकारी स्कूलों का रिजल्ट खराब क्यों है?

पूछता है मध्य प्रदेश

  • जब स्कूलों में शिक्षकों की कमी थी, तब उन्हें कार्यालयों में किस आधार पर अटैच किया गया?
  • जिन अधिकारियों ने वर्षों तक इस व्यवस्था को जारी रखा, क्या उनकी जवाबदेही तय होगी?
  • क्या पूरे प्रदेश में ऐसे सभी मामलों की समीक्षा होगी, या कार्रवाई केवल 213 शिक्षकों तक सीमित रहेगी?
  • क्या भविष्य में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि शिक्षक केवल शिक्षण कार्य के लिए ही तैनात रहें?
  • जिन विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हुई, उनके नुकसान की भरपाई कैसे होगी?
सरकारी शिक्षक की असली पहचान किसी कार्यालय की कुर्सी नहीं, बल्कि विद्यालय की कक्षा है...

जिस दिन शिक्षा व्यवस्था से "अटैचमेंट संस्कृति" पूरी तरह समाप्त हो जाएगी, उसी दिन सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल

"सरकार ने 213 शिक्षकों को स्कूल भेज दिया... लेकिन क्या उन वर्षों का हिसाब भी होगा, जब विद्यार्थियों के हिस्से का शिक्षक दफ्तरों में बैठा रहा?"

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