निर्वाध रूप से बिजली तो दे नहीं पा रहे,सुविधा के नाम पर जनता पर नया बोझ डाला जा रहा है !
स्मार्ट मीटर बनाम स्मार्ट तरीके से जनता का पैसा लूटना !
देश के कई राज्यों में स्मार्ट मीटर लगाने का अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। सरकार और बिजली कंपनियां इसे बिजली क्षेत्र में सुधार, पारदर्शिता और उपभोक्ता सुविधा की दिशा में बड़ा कदम बता रही हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर एक बड़ा सवाल लगातार उठ रहा है,जब लाखों घरों में पहले से सही हालत में इलेक्ट्रॉनिक मीटर लगे हुए हैं, तो आखिर स्मार्ट मीटर लगाने की इतनी जल्दबाजी क्यों है?
जनता का तर्क सीधा और स्पष्ट है। यदि पुराने इलेक्ट्रॉनिक मीटर इतने खराब थे कि उन्हें बदलना आवश्यक हो गया, तो फिर करोड़ों रुपये खर्च कर उन्हें लगाया ही क्यों गया था? और यदि वे आज भी सही तरीके से काम कर रहे हैं, तो उन्हें हटाकर नए स्मार्ट मीटर लगाने का औचित्य क्या है?
सबसे बड़ी चिंता उन शिकायतों को लेकर है जो विभिन्न राज्यों से लगातार सामने आ रही हैं। अनेक उपभोक्ताओं का आरोप है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली बिलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। कहीं रिचार्ज की तकनीकी समस्याएं हैं, कहीं बैलेंस कटने की शिकायतें हैं और कहीं उपभोक्ताओं को अपनी खपत की स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही है। ऐसे में स्वाभाविक है कि जनता के मन में अविश्वास पैदा हो।
सरकारी दावों में कहा जाता है कि स्मार्ट मीटर स्वेच्छा से लगाए जा रहे हैं और किसी पर कोई दबाव नहीं है। लेकिन कई स्थानों से उपभोक्ताओं की शिकायत है कि उन्हें मीटर बदलवाने के लिए लगातार दबाव का सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि मना करने पर बिजली काटने, जुर्माना लगाने अथवा अन्य प्रशासनिक कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है। यदि ऐसी शिकायतें वास्तव में सामने आ रही हैं तो सरकार और बिजली विभाग को उनकी निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।
लोकतंत्र में किसी भी बड़े बदलाव की सफलता जनता के विश्वास पर निर्भर करती है, न कि केवल सरकारी आदेशों पर। यदि स्मार्ट मीटर वास्तव में उपभोक्ताओं के हित में हैं तो सरकार को सबसे पहले उनकी विश्वसनीयता सिद्ध करनी होगी। पारदर्शी ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएं, स्वतंत्र एजेंसियों से जांच कराई जाए, उपभोक्ताओं की शिकायतों का त्वरित समाधान हो और सबसे महत्वपूर्ण बात—जनता की सहमति और विश्वास हासिल किया जाए।
सरकार को यह समझना होगा कि बिजली उपभोक्ता कोई प्रयोगशाला का विषय नहीं हैं। वे करदाता हैं, मतदाता हैं और लोकतंत्र के वास्तविक मालिक हैं। उनकी आशंकाओं को "विरोध" कहकर खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है। यदि जनता सवाल पूछ रही है तो जवाब देना सरकार और विभाग की जिम्मेदारी है।
स्मार्ट मीटर का मुद्दा अब केवल तकनीक का नहीं रह गया है, बल्कि यह जनता के विश्वास और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है। सरकार को चाहिए कि वह जनता की आवाज सुने, संवाद स्थापित करे और किसी भी प्रकार की कथित जबरदस्ती की शिकायतों को गंभीरता से ले। अन्यथा यह अभियान सुधार के बजाय जन असंतोष का कारण बन सकता है।
जनता सुविधा चाहती है, पारदर्शिता चाहती है, लेकिन उसके नाम पर थोपी गई व्यवस्था नहीं। लोकतंत्र में किसी भी योजना की असली सफलता जनता की स्वीकृति से तय होती है, केवल सरकारी घोषणा से नहीं।
1."कई राज्यों में उपभोक्ताओं ने स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली बिलों में वृद्धि की शिकायतें दर्ज कराई हैं। हालांकि बिजली कंपनियों का कहना है कि स्मार्ट मीटर वास्तविक खपत का अधिक सटीक रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हैं।"
2."कुछ क्षेत्रों में उपभोक्ता संगठनों ने आरोप लगाया है कि स्मार्ट मीटर लगाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। वहीं संबंधित बिजली कंपनियां इन आरोपों से इनकार करते हुए कहती हैं कि प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित की जा रही है।"
3."स्मार्ट मीटरों की कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न राज्यों में शिकायतें और विवाद सामने आए हैं, जिनकी जांच संबंधित विभागों और नियामक संस्थाओं द्वारा की जा रही है।"


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