धर्म नहीं,धर्म के नाम पर धंधा चिंता का विषय...
आस्था के केंद्रों में बढ़ती व्यावसायिकता पर गंभीर मंथन की आवश्यकता !
भारत को धर्म, अध्यात्म और संस्कृति की भूमि कहा जाता है। यहां करोड़ों लोग अपनी आस्था और श्रद्धा के साथ मंदिरों, तीर्थस्थलों और पवित्र नदियों के घाटों पर पहुंचते हैं। वे ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने, मन की शांति पाने और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने के उद्देश्य से इन स्थानों का रुख करते हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि अनेक धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं को भक्ति से अधिक व्यवस्था के नाम पर आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ता है।
देश के कई प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर यह आम शिकायत सुनने को मिलती है कि स्थानीय पंडे-पुजारी और उनसे जुड़े कुछ लोग धर्म को सेवा के बजाय कमाई का साधन बना चुके हैं। हरिद्वार हो ऋषिकेश हो सौरों जी हो या वाराणसी हो यहां के गंगा घाटों पर स्नान करने, पितरों की अस्थियां विसर्जित करने, धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने अथवा गंगा आरती में सम्मिलित होने के लिए श्रद्धालुओं पर धन देने का दबाव बनाया जाता है। धन न देने पर श्रद्धालुओं के साथ गाली गलौज हाता-पाई तक की जाती है। उनका अपमान किया जाता है! कई स्थानों पर ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि बिना पैसे दिए व्यक्ति अपने धार्मिक कर्तव्यों का निर्वहन भी नहीं कर ही नहीं सकता। इसका तात्पर्य तो यह होता है कि जिसके पास पैसा नहीं है वह तो इन स्थानों पर अपने धार्मिक अनुष्ठान पूरे ही नहीं कर सकता यानी की गंगा जी में डुबकी तक नहीं लग सकता तो फिर इन स्थानों पर वह क्यों जाएगा ?
स्थिति केवल घाटों तक सीमित नहीं है। अनेक मंदिरों में भी वीआईपी दर्शन और सामान्य दर्शन के बीच ऐसा अंतर दिखाई देता है, जिससे आम श्रद्धालु स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है। कहीं दर्शन के नाम पर विशेष शुल्क लिया जाता है तो कहीं-कहीं मनमर्जी के हिसाब से वाहन पार्किंग कपड़े बदलने का पैसा सामान रखने का पैसा लिया जाता है यह भी एक प्रकार का श्रद्धालुओं के साथ शोषण करने जैसा ही है! देव दर्शन के लिए पैसे देने वालों को प्राथमिकता देकर एवं अन्य भक्तों को लंबी कतारों में घंटों खड़ा रखा जाता है। कई बार श्रद्धालुओं की शिकायत होती है कि यदि उन्होंने किसी को दक्षिणा या अतिरिक्त धन नहीं दिया तो उनके साथ असम्मानजनक व्यवहार किया गया।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या धर्म का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है या उन्हें आर्थिक आधार पर विभाजित करना? क्या ईश्वर तक पहुंचने के लिए किसी विशेष शुल्क या सिफारिश की आवश्यकता होनी चाहिए? आस्था का संबंध मन और विश्वास से होता है, न कि व्यक्ति की आर्थिक क्षमता से।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाएं केवल श्रद्धालुओं को ही आहत नहीं करतीं, बल्कि धर्म की छवि को भी नुकसान पहुंचाती हैं। जब किसी व्यक्ति को धार्मिक स्थल पर सम्मान और आध्यात्मिक संतोष के बजाय शोषण और अपमान का अनुभव होता है, तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से निराशा उत्पन्न होती है। परिणामस्वरूप वह दोबारा ऐसे स्थानों पर जाने से बचता है और समाज में भी नकारात्मक संदेश प्रसारित होता है।
यह भी सत्य है कि कुछ व्यक्तियों के अनुचित आचरण के आधार पर पूरे धर्म या सभी पुजारियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देश में आज भी अनेक संत, महात्मा और पुजारी निस्वार्थ भाव से समाज और धर्म की सेवा कर रहे हैं। किंतु जो लोग धर्म और आस्था का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत लाभ कमाने में लगे हैं, उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक है।
समाज के प्रबुद्ध वर्ग, धार्मिक संस्थाओं और प्रशासन को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें श्रद्धालुओं के अधिकार सुरक्षित हों। धार्मिक स्थलों पर पारदर्शी व्यवस्था, निर्धारित शुल्कों की स्पष्ट जानकारी, शिकायत निवारण तंत्र और दान राशि के उपयोग का सार्वजनिक लेखा-जोखा सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जो लोग श्रद्धालुओं का शोषण करते हैं, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
धर्म समाज को जोड़ने, नैतिकता का मार्ग दिखाने और मानवता को सशक्त बनाने का माध्यम है। यदि धर्म के नाम पर स्वार्थ, लालच और व्यापार हावी हो जाएगा, तो सबसे बड़ा नुकसान स्वयं धर्म को ही होगा। इसलिए समय की मांग है कि आस्था के केंद्रों को शोषण-मुक्त बनाया जाए, ताकि श्रद्धालु बिना किसी भय, दबाव या आर्थिक बोझ के अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकें और धर्म अपनी मूल भावना,सेवा, सद्भाव और मानव कल्याण, के साथ आगे बढ़ सके।


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