भारत की सबसे महंगी पेंटिंग होने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है...
167 करोड़ में बिकी मां यशोदा और लाडले कन्हैया की ये पेंटिंग !
मुंबई। मां यशोदा और उनके लाडले की बनाई एक सुंदर पेंटिंग सेफ्रॉन आर्ट की नीलामी में 167 करोड़ रुपये में बिकी है. राजा रवि वर्मा की इस पेंटिंग ने नया इतिहास रच दिया है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और एमडी साइरस एस पूनावाला ने ये पेंटिंग खरीदी. इस पेंटिंग की कीमत ने मशहूर चित्रकार एमएफ हुसैन की तस्वीर का रिकॉर्ड तोड़ दिया, जो पिछले साल 118 करोड़ रुपये में नीलाम हुई थी. राजा रवि वर्मा की इस मशहूर पेंटिंग में यशोदा और कन्हैया एक शांत अवस्था में खड़े दिखाई दे रहे हैं. कान्हा अपनी मां से लिपटे हुए खड़े हुए हैं और मां यशोदा गाय का दूध निकाल रही है. कन्हैया का ये बाल स्वरूप लोगों को खूब भाया.
1890 के दशक में राजा रवि वर्मा ने करियर के चरम पर ये पेंटिंग बनाई थी और ये हमेशा सुर्खियों में रही है. मुंबई में नीलामी घर सैफ्रॉन आर्ट की नीलामी में ये पेंटिंग 17,9 करोड़ डॉलर में बिकी. यह भारतीय कला जगत की सबसे महंगी पेंटिंग है. इस पेंटिंग की बिक्री से पहले के 80-120 करोड़ रुपये की बोली लगने का अनुमान था, लेकिन इसने उम्मीद से दोगुना ज्यादा कीमत वसूली.
यशोदा और कृष्ण की पेटिंग को खरीदने वाले सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष साइरस पूनावाला ने इसे अपना सौभाग्य बताया है. कोरोना के वक्त कोविशील्ड वैक्सीन के सह उत्पादन को लेकर पूनावाला काफी चर्चा में आए थे. उन्हें इस पेंटिंग को राष्ट्रीय धरोहर बताया और कहा कि ये जनता के दर्शन के लिए उपलब्ध रहेगी.
1848 में केरल के किलिमानूर में जन्मे रवि वर्मा भारत के सबसे मशहूर कलाकारों में से एक रहे, जो तेल चित्रों के माध्यम से भारतीय पौराणिक विषयों को जीवंत रूप देने के लिए जाने जाते हैं. शकुंतला, द्रौपदी, सीता, दमयंती जैसी पौराणिक महिला पात्रों पर उनकी पेंटिंग आज के कलाकारों को भी प्रेरित करती हैं.
त्रावणकोर के पूर्व शाही परिवार की पूयम थिरुनाल गौरी पार्वती ने साइरस पूनावाला द्वारा ये पेंटिंग खरीदे जाने पर खुशी जताई है. पार्वती ने कहा, उनके परदादा को वह सम्मान मिल रहा है जिसके वे हकदार हैं. 20वीं शताब्दी में एक समय उन्हें पोस्टर चित्रकार कहकर उपहास उड़ाया जाता था, लेकिन अब उनकी विरासत और कौशल को सम्मान मिलता है. उन्होंने आलोचकों या खरीदारों को खुश करने के लिए चित्रकारी नहीं की. साड़ी को लोकप्रिय बनाने और उत्तम आभूषणों को संरक्षित करने में उनका अमिट योगदान है.


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