असुरक्षित हो रही है हमारे भविष्य की नींव...
समाज में अज्ञानता का अंधेरा मिटाने वाले ही बन बैठे हैं भक्षक !
इंदौर। शिक्षा को हमेशा से समाज की रीढ़ और राष्ट्र के भविष्य की मजबूत नींव माना गया है। यही वह माध्यम है जो अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर उज्ज्वल कल का निर्माण करता है। लेकिन आज विडंबना यह है कि जिस शिक्षा व्यवस्था पर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य टिका है, उसी व्यवस्था के कुछ संचालक उसे खोखला करने में लगे हैं।
आज निजी स्कूलों का एक बड़ा वर्ग शिक्षा को सेवा नहीं, बल्कि मुनाफे का जरिया बना चुका है। “डोनेशन”, “बुक्स”, “यूनिफॉर्म” और अन्य कई नामों पर अभिभावकों से मनमानी वसूली की जा रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि एक आम परिवार के लिए अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना आर्थिक बोझ बनता जा रहा है।
हरदोई में एसपी तिराहा स्थित एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में किताबों को लेकर विवाद सामने आया है। आरोप है कि अभिभावक द्वारा स्कूल से किताबें न खरीदने पर मामला बढ़ गया। नीलम वर्मा ने बताया कि उन्होंने पहले चिन्हित बुक डीलर से किताबें खरीदी थीं, लेकिन बाद में स्कूल की ओर से दबाव डाला गया कि किताबें सीधे स्कूल से ही खरीदी जाएं। इसी बात को लेकर स्कूल परिसर में बहस शुरू हो गई।
नीलम वर्मा का आरोप है कि विरोध करने पर प्रिंसिपल ममता मिश्रा ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया और बच्चों का नाम काटने तक की धमकी दी। घटना के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है और स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। अभिभावक पक्ष ने प्रशासन से कार्रवाई की मांग की है, वहीं स्कूल प्रबंधन की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई स्कूलों ने किताबों और यूनिफॉर्म को भी कमाई का साधन बना लिया है। अभिभावकों को बाध्य किया जाता है कि वे केवल स्कूल द्वारा तय की गई दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदें—वह भी बाजार दर से कहीं अधिक कीमत पर। यह एक तरह से खुली लूट है, जिसे नियमों के बावजूद अनदेखा किया जा रहा है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि संस्कार, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध कराना भी है। जब शिक्षा देने वाले ही लालच और शोषण का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे, तो बच्चों में कौन से मूल्य विकसित होंगे? यह सवाल आज हर जागरूक नागरिक के मन में उठ रहा है।
सरकार ने समय-समय पर निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन इन नियमों का पालन जमीनी स्तर पर कम ही देखने को मिलता है। निरीक्षण की कमी और शिकायतों पर ठोस कार्रवाई न होने के कारण स्कूल संचालकों के हौसले बुलंद हैं।
- अब समय आ गया है कि इस मुद्दे पर सख्त कदम उठाए जाएं।
- शिक्षा संस्थानों की फीस और अन्य वसूली को पारदर्शी बनाया जाए।
- किताबों और यूनिफॉर्म की खरीद में अभिभावकों को स्वतंत्रता दी जाए।
- नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर कड़ी कार्रवाई हो।
अभिभावकों को भी जागरूक होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी होगी। यदि समाज चुप रहेगा, तो यह शोषण और बढ़ेगा और हमारे बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ता जाएगा।
अंततः यह समझना जरूरी है कि शिक्षा कोई व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि इसकी नींव ही लालच और अनियमितताओं से कमजोर हो जाएगी, तो एक मजबूत और समृद्ध समाज की कल्पना करना भी मुश्किल हो जाएगा।


0 Comments