14 साल पुराने प्रकरण में 1990 से वेतन निर्धारण कर पेंशन संशोधन के निर्देश !
नो वर्क नो पे -कर्मचारी की गलती नहीं होने पर लागू नहीं किया जा सकता: हाईकोर्ट
ग्वालियर। मप्र हाई कोर्ट ने जल संसाधन विभाग से जुड़े एक विवाद में महत्वपूर्ण आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि कर्मचारी की कोई गलती नहीं है और उसे उच्च पद पर कार्य करने से वंचित रखा गया, तो ‘नो वर्क नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति आनंद सिंह बरारावत की सिंगल बेंच ने रघुराज शर्मा एवं अन्य की 2012 से लंबित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
दरअसल, याचिकाकर्ता वर्ष 1979 से दैनिक वेतनभोगी पंप ऑपरेटर के रूप में कार्यरत थे और 1987 में उन्हें नियमित किया गया। वर्ष 1990 में कनिष्ठ एवं समान स्थिति वाले कर्मचारियों को उच्च वेतनमान वाले ट्यूबवेल ऑपरेटर पद पर नियमित कर दिया गया, जबकि याचिकाकर्ताओं को लाभ से वंचित रखा गया।न्यायालय के पूर्व आदेश के पालन में विभाग ने 2012 में याचिकाकर्ताओं को 24 मार्च 1990 से ट्यूबवेल ऑपरेटर पद का लाभ तो प्रदान कर दिया, लेकिन ‘नो वर्क नो पे’ सिद्धांत लागू करते हुए उन्हें उस अवधि के वेतन-एरियर से वंचित रखा।
न्यायालय ने इसे विधि अनुरूप नहीं माना। आदेश में सुप्रीम कोर्ट के के.वी. जानकीरमन प्रकरण सहित अन्य निर्णयों का उल्लेख कर कहा कि जहां कर्मचारी की कोई त्रुटि नहीं हो और विभागीय कारणों से उसे उच्च पद पर कार्य करने से रोका गया हो, वहां ‘नो वर्क नो पे’ लागू नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने कनिष्ठ कर्मचारियों के समान स्थिति में थे और उन्हें भी 24 मार्च 1990 से ही ट्यूबवेल ऑपरेटर के पद का लाभ मिलना चाहिये था। ऐसे में केवल ‘‘नो वर्क नो पे’’ के आधार पर मौट्रिक लाभ से वंचित रखना गलत है। इसी आधार पर न्यायालय ने याचिका का स्वीकार करते हुए राज्य शासन को निर्देशित किया है कि याचिकाकर्ताओं का वर्ष 1990 से ट्यूबवेल ऑपरेटर पद के अनुसार वेतन निर्धारण किया जाये तथा उत्पन्न एरियर का भुगतान किया जाये। चूंकि याचिकाकर्ता सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसलिये उनके पीपीओ एवं जीपीओ का पुनरीक्षण कर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति का लाभ भी संशोधित किया जाये।


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