2023 में बिल पास हो चुका है,तब राहुल और सोनिया गांधी ने सपोर्ट किया था...
महिला आरक्षण तो पहले ही कानून बन चुका,तो संसद में अब क्या होने जा रहा है !
संसद के विशेष सत्र से ठीक पहले कांग्रेस, आरजेडी और INDIA गठबंधन के घटक दलों ने अलग रणनीति बनाई है. राहुल गांधी वीडियो जारी कर सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. 2023 में बिल पास हो चुका है. तब राहुल और सोनिया गांधी ने खुलकर सपोर्ट किया था. अब उनका तर्क क्या है. कांग्रेस विरोध क्यों कर रही है. संसद में अब क्या होने जा रहा है?
महिला आरक्षण बिल 2023 में ही कानून बन चुका है. अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू किया जाना है. हालांकि, जिस तरह से विपक्ष के नेता कुछ बिंदुओं पर विरोध कर रहे हैं, उससे लोगों के मन में भ्रम है कि जब बिल पहले ही पारित हो चुका है, तो संसद के विशेष सत्र में ऐसा क्या होने जा रहा है, जिसका विरोध शुरू हो गया है. असल में 16 अप्रैल से शुरू हुए संसद के विशेष सत्र में तीन अहम विधेयक पेश किए जाने हैं. इसका मकसद वही 2029 तक महिलाओं के लिए आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करना और लोकसभा में सीटों की संख्या 850 करना है.
दो बिल कानून मंत्री रखेंगे और एक बिल गृह मंत्री. 18 घंटे चर्चा होगी. लोकसभा से पास होने के बाद राज्यसभा में चर्चा होगी. पहले समझिए कि तीनों विधेयकों में क्या है, फिर जानिए विपक्ष को आपत्ति क्यों है?
1. केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 - इसमें राजधानी दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, पुदुचेरी की विधानसभाओं के लिए 33 प्रतिशत महिला आरक्षण तय किया जाना है.
2. 131वां संविधान संशोधन विधेयक 2026 - इसके तहत जनसंख्या की नई परिभाषा तय करने के साथ बढ़ती आबादी के हिसाब से संसद में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी है.
3. परिसीमन विधेयक 2026 - लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाना. सीटों का फिर से निर्धारण.
तीनों बिल से क्या बदल जाएगा?
तीनों विधेयक पास होते ही 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू होने का रास्ता प्रशस्त हो जाएगा. सरकार इसका लाभ अगले लोकसभा चुनाव में दिलाना चाहती है. सरकार का साफ तौर पर कहना है कि तीनों प्रस्ताव महिला आरक्षण से ही जुड़े हैं. हालांकि, कई विपक्षी दलों को आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा होने से राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रभाव और ताकत कम हो जाएगी. दक्षिण के नेता आशंकित हैं. सरकार का तर्क है कि सीटें घटेंगी नहीं, बढ़ेंगी. इस लिहाज से देखें तो आने वाले समय में राजनीति में आमूल-चूल असर देखने को मिल सकता है.
पहले नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन की बात हो रही थी. नई जनगणना शुरू भी हो चुकी है. पहले चिंता जताई गई थी कि आरक्षण लागू करने में काफी समय लग सकता है क्योंकि नई जनगणना पूरी होने में ही वक्त लगेगा. हालांकि, अब ये बिल लाकर सरकार यह काम 2029 चुनाव से पहले करना चाहती है.
पीएम मोदी ने महिला आरक्षण को बताया समय की सबसे बड़ी जरूरत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण को समय की सबसे बड़ी जरूरत बताते हुए कहा कि इससे भारतीय लोकतंत्र और अधिक सशक्त, जीवंत और सहभागितापूर्ण बनेगा. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस दिशा में किसी भी तरह की देरी दुर्भाग्यपूर्ण होगी। अपने एक लेख का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य हासिल करने के लिए देश को ‘नारी शक्ति’ और ‘मातृ शक्ति’ की पूरी क्षमता को राष्ट्र निर्माण में शामिल करना होगा.
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी दो दशक से अधिक के शासन अनुभव से यह साफ है कि महिलाओं की भागीदारी के बिना विकास का लक्ष्य अधूरा रहेगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों से बातचीत जारी है और अधिकांश दलों का सकारात्मक समर्थन मिल रहा है, जिससे एक अनुकूल माहौल बनता दिख रहा है.
उन्होंने अपील की कि 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद में होने वाली चर्चा के दौरान सभी दल मिलकर इस ऐतिहासिक कदम को पारित करें और इसे एक साझा उपलब्धि के रूप में मनाएं.
राहुल ने समर्थन दिया था, अब विरोध क्यों?
हां, 2023 में सोनिया गांधी का संसद में बिल को समर्थन देने और फौरन अमल में लाने का वीडियो शेयर करते हुए राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी महिला आरक्षण का पूरा समर्थन करती है. संसद ने 2023 में सर्वसम्मति से ये बिल पारित किया था, जो अब हमारे संविधान का हिस्सा है. सरकार अब जो प्रस्ताव ला रही है, उसका महिला आरक्षण से कोई संबंध नहीं है. वो सिर्फ परिसीमन (delimitation) और चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं में जानबूझकर हेरफेर कर सत्ता हथियाने का प्रयास है.
उन्होंने पिछली जनगणना के आंकड़ों के इस्तेमाल पर सवाल उठाया. राहुल ने कहा कि उसमें तो पिछड़े वर्ग का नंबर ही नहीं है. जाति जनगणना के आंकड़ों को दरकिनार कर OBC, दलित और आदिवासी समुदायों से किसी हालत में 'हिस्सा चोरी' बर्दाश्त नहीं की जाएगी. हम दक्षिण, उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और छोटे राज्यों के साथ भी किसी कीमत पर अन्याय नहीं होने देंगे. राहुल ने छोटे स्टेट्स और साउथ के स्टेट्स को लेकर भी गंभीर सवाल किए.
विपक्ष को सरकार की मंशा पर संदेह क्यों?
दरअसल, जब विपक्षी दलों को पता चला कि विशेष सत्र बुलाया गया है, सोशल मीडिया से लेकर अखबारों में लेख लिखकर इसे विधानसभा चुनावों से पहले महिलाओं को आकर्षित करने का हथकंडा बताया जाने लगा. इसे तुष्टीकरण की राजनीति बताया गया. कई विपक्षी दल महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण में विशेष कोटा की मांग कर रहे हैं, जैसा पहले भी कर रहे थे. तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों के नेता कह रहे हैं कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होगा, तो उत्तर भारत को ज्यादा सीटें मिलेंगी. इससे उनकी राजनीतिक ताकत घट जाएगी. हर परिसीमन के बाद आरक्षित सीटें बदलने की अलग चिंताएं हैं.
रामगोपाल यादव बोले- 'महिला आरक्षण बिल पर थे साथ, लेकिन...'
महिला आरक्षण बिल पर समाजवादी पार्टी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं. रामगोपाल यादव ने साफ कहा है कि सपा महिला आरक्षण का समर्थन कर रही थी, लेकिन अब जिस तरह से वो इसे लेकर आ रहे हैं, ये उनकी बदनीयती है. हम इसका विरोध करेंगे.
महिला आरक्षण पर तेजस्वी यादव का तर्क
INDIA गठबंधन की सर्वदलीय बैठक में पहुंचे तेजस्वी यादव ने कहा कि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम' की नैतिक ढाल लेकर पूर्व में पारित महिला आरक्षण बिल को लागू किए बिना उसमें संशोधन, परिसीमन के बहाने संविधान और संघीय ढांचे को कमजोर करने के लिए 'विशेष संसद सत्र' बुलाया गया है. उन्होंने कहा कि हम महिला आरक्षण के पक्षधर हैं. महिलाओं की आधी आबादी को 33% नहीं बल्कि 50% आरक्षण देना चाहिए, लेकिन इस आरक्षण के अंदर SC/ST और OBC की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण होना चाहिए यानी आरक्षित वर्गों की महिलाओं के लिए भी सीटें अनिवार्य रूप से आरक्षित होनी चाहिए.
मायावती ने किया स्वागत
बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की प्रक्रिया को काफी लंबे इंतजार के बाद ही सही, इसे आगे बढ़ाने की कार्रवाई का हमारी पार्टी स्वागत करती है. वास्तव में महिला आरक्षण की असली हकदार शोषित और उपेक्षित वर्गों में भी खासकर सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से लगातार पछाड़े जा रहे एससी, एसटी व ओबीसी समाज की महिलाओं को अगर अलग से आरक्षण की व्यवस्था की जाती तो यह उचित होता. ऐसा नहीं होने से इन वर्गों की महिलाओं को महिला आरक्षण का पूरा लाभ क्या मिल पायेगा, इसमें लोगों को काफी संदेह है. महिला आरक्षण के वास्तविक उद्देश्य को काफी हद तक नकारने जैसा है.
कैबिनेट से मिल चुकी है संशोधन के मसौदे को मंजूरी
केंद्रीय मंत्रिमंडल से पिछले बुधवार को नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के मसौदे को मंजूरी दे दी है, जिससे 2029 चुनावों से पहले महिलाओं को 33% आरक्षण लागू हो सके. प्रस्ताव में लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने और 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात शामिल है.

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