आज का भारत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि रणनीति से चलता है,और यही उसकी असली ताकत है...
ईरान-अमेरिका सीजफायर में भारत की चुप्पी नहीं,कूटनीतिक परिपक्वता का संकेत !
नई दिल्ली। आज के दिन बुधवार ने,दुनिया के दो महत्वपूर्ण देशों और के बीच दो हफ्तों के लिए हुए सीजफायर ने वैश्विक तनाव के माहौल में कुछ राहत अवश्य दी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इस संवेदनशील दौर में किसी भी प्रकार का युद्धविराम शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जाता है।
हालांकि, इस घटनाक्रम के बाद भारत के भीतर एक नई बहस ने जन्म ले लिया है। कुछ राजनीतिक दल और स्वयंभू विश्लेषक यह प्रश्न उठा रहे हैं कि इस प्रक्रिया में ने मध्यस्थता की भूमिका क्यों नहीं निभाई। क्या भारत को इस अवसर पर आगे बढ़कर नेतृत्व नहीं करना चाहिए था?
रणनीतिक चुप्पी: कमजोरी नहीं, समझदारी
भारत की विदेश नीति का मूल आधार “रणनीतिक स्वायत्तता” रहा है। हर अंतरराष्ट्रीय विवाद में हस्तक्षेप करना ही कूटनीति नहीं होता, बल्कि यह तय करना अधिक महत्वपूर्ण होता है कि कब और कहां अपनी भूमिका निभानी है।
जैसे नेताओं के साथ बातचीत की अनिश्चितता और उनकी बयानबाजी की शैली को देखते हुए भारत का सतर्क रुख पूरी तरह व्यावहारिक प्रतीत होता है। बिना स्पष्ट भरोसे और ठोस आधार के किसी भी मध्यस्थता में शामिल होना, देश की साख को जोखिम में डाल सकता था।
विश्वसनीयता बनाम दिखावटी सक्रियता
अंतरराष्ट्रीय मंच पर मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए केवल इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि दोनों पक्षों का विश्वास आवश्यक होता है। और के बीच दशकों से चला आ रहा अविश्वास किसी भी तीसरे पक्ष के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा करता है। भारत ने इस परिस्थिति में जल्दबाजी दिखाने के बजाय अपनी वैश्विक विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी, जो दीर्घकालिक दृष्टिकोण से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान की सक्रियता,कूटनीति या मजबूरी
की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। आर्थिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को देखते हुए उसकी सक्रियता को अवसरवाद और मजबूरी,दोनों के रूप में देखा जा सकता है। यह समझना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर कदम के पीछे राष्ट्रीय हित छिपे होते हैं। ऐसे में किसी भी देश की “मध्यस्थता” को केवल शांति के प्रयास के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा।
भारत का संतुलित रुख
भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में संयमित और संतुलित नीति अपनाई है। न तो अनावश्यक बयान-बाजी की गई और न ही किसी पक्ष का खुला समर्थन किया गया। यह संकेत है कि भारत अब वैश्विक मंच पर भावनात्मक नहीं, बल्कि परिपक्व और व्यावहारिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। ऊर्जा संकट और वैश्विक आर्थिक दबाव जैसे मुद्दों के बीच भारत का अपने राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित रहना ही सबसे उपयुक्त रणनीति थी।
अत : यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ईरान-अमेरिका सीजफायर में भारत की गैर-मौजूदगी को कमजोरी के रूप में देखना एक सतही दृष्टिकोण है। वास्तव में यह भारत की परिपक्व कूटनीति, दूरदर्शिता और संतुलित निर्णय क्षमता का प्रतीक है। आज का भारत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि रणनीति से चलता है,और यही उसकी असली ताकत है-रामवीर यादव(रवि)


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