G News 24 : ये दो लोग चाहते, तो 22 अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम हमले को रोका जा सकता था !!!

 3000 रुपये में बेच दिया था देश के गद्दारों ने अपना ईमान... 

ये दो लोग चाहते, तो 22 अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम हमले  को रोका जा सकता था !!!

आज 22 अप्रैल है।  पहलगाम हमले की पहली बरसी. करीब 50 परिवारों के लिए ये 365 दिन बहुत कष्ट में बीते. अपनों के जाने का गम हो या शरीर पर लगे जख्म, उस घटना को भूलने नहीं देते. पूरा देश आज उस दुख को महसूस कर रहा है. कैसे बैसरन घाटी में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने परिवार के साथ घूमने आए निर्दोष निहत्थे पर्यटकों का शरीर गोलियों से छलनी कर दिया था. क्या आप जानते हैं उस रोज दो कश्मीरी चाहते, तो इतना बड़ा हमला रोका जा सकता था।  

उन दो लोगों ने 3000 रुपये की खातिर देश के गद्दारों ने अपना ईमान बेच दिया. वे चाहते तो 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में खूनी खेल नहीं होता। धर्म पूछकर गोली नहीं मारी जाती। उनके पास समय था, लेकिन वे खामोश रहे और दहशतगर्दों को शरण दी. खिलाया-पिलाया और कंबल देकर रवाना किया।  

जी हां, जेल में बंद दो कश्मीरियों पर आरोप है कि इन्होंने हमले से एक रात पहले तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को पनाह दी थी. उन्हें खिलाया-पिलाया था. अगर इनके भीतर की इंसानियत जागती, तो 22 अप्रैल 2025 का कत्लेआम आसानी से रोका जा सकता था. एक-दो नहीं, कुल 26 लोगों को उनके बच्चों, पत्नी, घरवालों के सामने बेरहमी से गोली मार दी गई थी। 

शाम में आतंकी घर आए थे...

इन दहशतगर्दों को कुछ घंटे पहले ही परवेज अहमद और बशीर अहमद ने देख लिया था. बाद में तीनों आतंकियों की पहचान - फैसल जट्ट उर्फ ​​सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ ​​जिब्रान और हमजा अफगानी के रूप में हुई. ये सभी बैसरन में एक बाड़ के पीछे छिपे हुए थे. 

ये आतंकी एक दिन पहले शाम को बशीर और परवेज के घर पर आए थे. इन्होंने उर्दू और पंजाबी के मिले-जुले लहजे में बात की. दोनों स्थानीय नागरिकों ने अपनी आंखों से देखा था कि इनके पास आधुनिक हथियार हैं. ये आतंकी 'अली भाई' के बारे में बात कर रहे थे. दोनों को अंदाज लग चुका था कि बहुत जल्द आसपास कहीं बड़ा आतंकी हमला होने वाला है. अली भाई, मुख्य आरोपी साजिद जट्ट का उपनाम है. वह लश्कर-ए-तैयबा / द रेजिस्टेंस फ्रंट का एक टॉप कमांडर था और पाकिस्तान के कसूर का रहने वाला था। 

3000 रुपये लेकर ये चुप हो गए !!!

हां, आतंकवादियों को पनाह देने और उनकी मदद करने के बदले इन दोनों ने उनसे 3,000 रुपये लिए थे. पता था कि कत्लेआम होगा लेकिन ये खामोश रहे. वे चाहते तो आसानी से पुलिस को फोन कर सकते थे या इलाके में आतंकवादियों के देखे जाने के बारे में स्थानीय टूरिस्ट ऑपरेटर एसोसिएशन को अलर्ट कर सकते थे. जांच में पता चला है कि 21 अप्रैल 2025 की रात करीब 10.30 बजे आतंकी उनके घर से चले गए थे, फिर भी उन्होंने मुंह नहीं खोला.  आतंकियों ने उनके घर में पांच घंटे बिताए थे और खाना भी खाया था. लौटते समय आतंकियों ने कुछ खाना पैक भी करवा लिया था और खाना पकाने का एक बर्तन, कंबल और तिरपाल ले लिया था।  

बाद में बशीर और परवेज ने बैसरन की बाड़ के पास आतंकियों को देखा, फिर भी वे अपने टट्टुओं (घोड़ों) के साथ दूर हट गए और अपने टूरिस्ट ग्राहकों के लौटने का इंतजार करने लगे. दोपहर 1 बजे के आसपास बशीर और परवेज ने टूरिस्टों को टट्टुओं पर बिठाकर वापस पहलगाम पहुंचा दिया. जब उन्हें बैसरन में उन्हीं आतंकवादियों के हमले का पता चला, तो वे पहाड़ों पर बनी अस्थायी झोपड़ी छोड़कर छिप गए. भारतीयों ने दिखाया, आतंकियों से नहीं डरते। हां, एक साल बाद सैकड़ों सैलानी पहलगाम पहुंचे हुए हैं। 

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