यह समय सभी राजनीतिक दलों सत्ता पक्ष हो या विपक्ष के लिए आत्ममंथन का है...
संसद में लगातार बेवजह-बे सिरपैर के मुद्दों पर हंगामा करने वालों से जनता को जवाब चाहिए !
भारत की संसद लोकतंत्र का सबसे पवित्र मंच मानी जाती है। जहाँ देश की नीतियाँ बनती हैं, कानून तैयार होते हैं और करोड़ों नागरिकों के भविष्य से जुड़े निर्णय लिए जाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि पिछले कुछ दिनों से संसद का यह गंभीर मंच कई बार राजनीतिक टकराव और हंगामे का अखाड़ा बनता जा रहा है।
विपक्ष के नेता राहुल और उनकी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों पर यह आरोप बार-बार लगाया जा रहा है कि वे संसद की कार्यवाही को बाधित कर रहे हैं। हंगामे, नारेबाजी और वॉकआउट की राजनीति के कारण कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा तक नहीं हो पाती। इसका सीधा नुकसान देश की जनता को होता है, क्योंकि संसद का हर मिनट करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन से चलता है।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। सत्ता पक्ष की नीतियों पर सवाल उठाना, सरकार से जवाब मांगना और जनता के मुद्दों को संसद तक पहुँचाना विपक्ष का अधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य भी है। लेकिन जब यह अधिकार केवल राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित हो जाए और संसद को चलने ही न दिया जाए, तब यह लोकतांत्रिक मर्यादा पर सवाल खड़े करता है।
हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों जैसे मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव या युद्ध पर भी संसद में शोर-शराबा देखने को मिला है। भारत निश्चित रूप से वैश्विक राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि संसद का मुख्य उद्देश्य देश के भीतर की नीतियों, अर्थव्यवस्था, रोजगार, कृषि, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करना है। जब घरेलू चुनौतियाँ इतनी बड़ी हों, तब विदेशी संघर्षों को लेकर लगातार हंगामा करना कई लोगों को राजनीतिक रणनीति जैसा प्रतीत होता है।
सवाल यह है कि क्या संसद जनता के हितों पर बहस का मंच है या राजनीतिक सुर्खियाँ बटोरने का माध्यम? लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन असहमति का अर्थ अराजकता नहीं होता। अगर हर सत्र में हंगामे के कारण कामकाज बाधित होता रहेगा, तो कानून निर्माण की प्रक्रिया कमजोर होगी और शासन व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।
देश की जनता भी अब इस स्थिति को गंभीरता से देखने लगी है। नागरिकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिन प्रतिनिधियों को संसद में उनकी समस्याएँ उठाने के लिए चुना गया है, वे अगर समय का अधिकांश हिस्सा नारेबाजी में बर्बाद करेंगे तो फिर नीतियों एवं जनता के लिए बनने वाली योजनाओं और कानूनों पर चर्चा कब और कैसे होगी !
यह समय सभी राजनीतिक दलों सत्ता पक्ष हो या विपक्ष के लिए आत्ममंथन का है। लोकतंत्र की गरिमा तभी बनी रह सकती है जब संसद में बहस तथ्य और तर्क पर आधारित हो, न कि केवल राजनीतिक टकराव पर।
एक मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहाँ सत्ता और विपक्ष दोनों जिम्मेदारी के साथ काम करें। देशहित सबसे ऊपर होना चाहिए न कि पार्टी हित। संसद को बाधित करना आसान है, लेकिन देश के लिए नीतियाँ बनाना कठिन और जिम्मेदार काम है।
आज जरूरत है कि राजनीतिक दल समझें—संसद जनता की है, किसी पार्टी की नहीं। अगर यह मंच केवल सियासत का अखाड़ा बन गया, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था की गरिमा ही दांव पर लग जाएगी।
देश को राजनीति नहीं, जिम्मेदार राजनीति की जरूरत है,और यह जिम्मेदारी हर उस जनप्रतिनिधि पर है जो संसद की चौखट पार करता।










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