फर्क बस इतना है कि यहाँ आलू-प्याज़ नहीं बल्कि पूरे-पूरे देश तौले जा रहे हैं...
ये दुनिया इन दिनों कुछ ऐसी बनी हुई है जैसे किसी कस्बे का हाट-बाज़ार लगा हो !
दुनिया में इस समय जो स्थिति है जहां देखो वहां युद्ध चल रहे हैं इस सबके लिए जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ राजनीति स्वार्थ और दोगले नेता हैं। सत्ता रूपी तराजू पकड़े, ये नेता जो ऑन कैमरा तो सिद्धांत की बात करते हैं और एवं बिहाइंड कैमरा से सौदेबाजी करते हैं.
यही कारण है कि आज ईरान का हाल उस मुर्गे जैसा हो गया है जिसका सिर तो उड़ चुका है l लेकिन शरीर अभी भी दौड़ रहा है l खेत के इस कोने से उस कोने तक उसे खुद नहीं पता कि जाना कहाँ हैl बस भागना है …. क्योंकि रुक गया तो समझ आ जाएगा कि सिर गया कहाँ !
उधर भूरे अमरीकी का हाल कुछ वैसा है जैसा कस्बे के उस नवयुवक का होता है जिसे अचानक चौपाल की पंचायत की कुर्सी मिल जाए ! कुर्सी मिलते ही उसे लगता है कि अब पूरा गाँव उसी के इशारे पर चलेगा l लेकिन जैसे ही पहला असली झगड़ा सामने आता है तो वह सोचने लगता है “पहले डंडा उठाऊँ या चाय मँगवाऊँ या फिर दोनों पक्षों से ही चंदा ले लूँ”!
इधर इज़राइल वाले नेतराम साहू की हालत बड़ी आरामदेह है जैसे किसी पुराने शतरंज खिलाड़ी की होती है l सामने वाला मोहरे बड़ी शान से चल रहा होता है और वह बीच-बीच में मुस्कुरा कर सोचता है “चलो खेल लो अंत में मात तो तुम्हें ही पड़नी है”
हमारे पीएम नरेंद्र मोदी भी पूरे तमाशे को उसी भाव से देख रहे हैं जैसे गाँव का बुजुर्ग किसान खेत की मेड़ पर बैठकर बादलों को देखता है । वह जानता है कि बारिश कब होगी लेकिन गाँव के लड़कों को खुद अंदाज़ा लगाने देता है ताकि उनका उत्साह भी बना रहे और अनुभव भी बढ़े !
चीन की हालत इस समय उस स्कूल के लड़के जैसी है जो हमेशा क्लास में अव्वल आता था और अचानक परीक्षा में ऐसा प्रश्नपत्र आ गया जिसमें सवाल ही किसी और भाषा में लिखे हों …. अब वह चुप बैठा है क्योंकि बोलने से पता चल जाएगा कि इस बार तैयारी अधूरी रह गई है।
यूरोपीय यूनियन इस समय कमरे में बैठकर भगवान को धन्यवाद दे रहा है जैसे कोई व्यापारी सही समय पर सही माल खरीद ले और बाद में मंडी में दाम दोगुने हो जाएँ …. उन्हें लग रहा है कि भारत के साथ सौदा करके उन्होंने कम से कम एक मजबूत बैलगाड़ी पकड़ ली है वरना इस अंतरराष्ट्रीय मेले में तो कई लोग बिना पहिए की गाड़ी खींचते दिख रहे हैं !
अरब देशों की स्थिति भी बड़ी दिलचस्प है । बाहर से सब शांत,अंदर से फोन पर धीमी आवाज़ में बातचीत जैसे गाँव के दो जमींदार खेत के झगड़े में तीसरे जमींदार को बुलाकर कहते हैं “भाई तुम्हारी लाठी सबसे मजबूत है ज़रा पास ही रहना”
उधर रूस वाले पुत्तन चच्चा का हाल उस व्यापारी जैसा है जिसने मेले के झूले के पास अपनी दुकान लगा ली हो लोग लड़ भी रहे हैं,बहस भी कर रहे हैं लेकिन उसकी दुकान पर तेल के ड्रम बराबर बिक रहे हैं और वह इत्मीनान से हिसाब लिखता जा रहा है जैसे युद्ध भी बस एक नया व्यापार अवसर हो. !
भारत में भी राजनीति का छोटा-सा नाटक जारी है पप्पू एंड पार्टी की बेचैनी देखकर कभी-कभी लगता है कि उन्हें दुनिया की चिंता कम और अपनी राजनीतिक दुकान की चिंता ज़्यादा है जैसे कस्बे का वह नेता जिसे डर रहता है कि कहीं मेले में उसकी दुकान पर ग्राहक कम न आ जाएँ और सामने वाले की दुकान पर भीड़ न लग जाए!
कुछ मुस्लिम नेताओं की स्थिति भी बड़ी विचित्र हो गई है उन्हें उम्मीद थी कि उनकी आवाज़ पर पूरी दुनिया खड़ी हो जाएगी लेकिन जब उनके अरबी आकाओं की तरफ से ही संदेश आ गया “चुप ! बिल्कुल चुप ! कोई आवाज़ नहीं निकलनी चाहिए” ! तो उनकी क्रांति का तापमान उतनी ही जल्दी ठंडा हो गया जितनी जल्दी गैस से उतरी चाय की केतली ठंडी हो जाती है !
पाकिस्तान उसका हाल पूछिए मत वह अभी भी ऐसी चक्करघिन्नी में फँसा है कि उसे यह भी नहीं पता कि अगला जूता किस दिशा से पड़ेगा ! उस पर कोढ़ में खाज यह कि आटे के भी वाँदे हैं और सपना गज़वा ए हिन्द का!
इस पूरे तमाशे में सबसे समझदारी की बात शायद यही है कि भारत के लोग थोड़ा शांत रहें थोड़ा हँसते रहें और सबसे ज़रूरी एकजुट रहें ।
क्योंकि इतिहास बार-बार बताता है कि जब बड़े-बड़े खिलाड़ी मैदान में शोर मचा रहे होते हैं तब असली बाज़ी अक्सर वही जीतता है जो चुपचाप चाल चलता है और बाकी लोग सोचते रह जाते हैं कि खेल शुरू कब हुआ।
और फिलहाल दुनिया सचमुच एक बड़े मेले में बदल चुकी है जहाँ हर कोई अपनी-अपनी दुकान सजाकर बैठा है और दर्शक तय कर रहे हैं कि तमाशा किसका सबसे मनोरंजक है और किसका सबसे महँगा-दिव्या सिंह










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