पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को लेकर देश के भीतर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास ...
आपदा में अवसर की राजनीति और ईंधन जमाखोरी का खतरनाक खेल !!!
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को लेकर देश के भीतर जिस प्रकार का माहौल बनाया जा रहा है, वह किसी वास्तविक संकट से अधिक एक सुनियोजित भ्रम का परिणाम प्रतीत होता है। भारत में तेल और गैस की कथित कमी को लेकर सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक जो अफवाहों का बाज़ार गर्म किया गया है, वह न केवल अनावश्यक है बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को अस्थिर करने वाला भी है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जब भी देश के सामने किसी प्रकार की अस्थिरता की आशंका पैदा होती है, तब कुछ राजनीतिक ताकतें उसे राष्ट्रीय चिंता का विषय बनाने के बजाय अपने राजनीतिक लाभ के अवसर के रूप में देखने लगती हैं।
यह पहली बार नहीं है जब ऐसी स्थिति पैदा हुई हो। इतिहास गवाह है कि हर संकट के समय विपक्ष के कुछ हिस्सों द्वारा भ्रम फैलाकर राजनीतिक रोटियां सेंकने का प्रयास किया गया है। आज भी वही पुराना खेल दोहराया जा रहा है जनता के बीच यह संदेश फैलाया जा रहा है कि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण भारत में तेल और गैस की भारी कमी होने वाली है। परिणामस्वरूप आम लोग पैनिक में आकर ईंधन की जमाखोरी करने लगे हैं, जिससे कृत्रिम संकट पैदा होने लगा है।
वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था बेहद व्यापक और विविध स्रोतों पर आधारित है। हार्मोज़ जलडमरूमध्य के रास्ते भारत में केवल लगभग 30 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति होती है, जबकि शेष लगभग 70 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति विश्व के करीब 40 अन्य देशों से होती है। ऐसे में यह कहना कि केवल पश्चिम एशिया के युद्ध से भारत में अचानक तेल-गैस का गहरा संकट खड़ा हो जाएगा, न केवल अतिरंजित है बल्कि तथ्यात्मक रूप से भी भ्रामक है।
लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब राजनीतिक बयानबाजी और अफवाहें मिलकर जनता के मन में भय पैदा कर देती हैं। हाल के दिनों में कुछ जगहों पर एलपीजी सिलेंडरों की कृत्रिम कमी की खबरें सामने आई हैं। यह कमी वास्तविक आपूर्ति बाधा से अधिक जमाखोरी की मानसिकता का परिणाम है। जब लोग आवश्यकता से अधिक वस्तुएं जमा करने लगते हैं, तब बाजार में अस्थायी संकट उत्पन्न हो जाता है और यही स्थिति महंगाई और अव्यवस्था को जन्म देती है।
यह भी विचार करने योग्य तथ्य है कि यदि भविष्य में किसी कारणवश एलपीजी की आपूर्ति पर कुछ समय के लिए असर पड़ता भी है, तो क्या भारतीय समाज पूरी तरह केवल एलपीजी पर ही निर्भर है? भारत का सामाजिक और आर्थिक ढांचा सदियों से विविध संसाधनों पर आधारित रहा है। ग्रामीण भारत में आज भी लकड़ी, कंडे, कोयला और बायोगैस जैसे पारंपरिक साधनों का उपयोग भोजन बनाने के लिए किया जाता है।
शहरी क्षेत्रों में भी विकल्पों की कोई कमी नहीं है। इंडक्शन कुकटॉप, इलेक्ट्रिक हीटर, पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG), सोलर एनर्जी और अन्य वैकल्पिक साधन आज व्यापक रूप से उपलब्ध हैं। ऐसे में यह धारणा कि एलपीजी के बिना जीवन ठप हो जाएगा, वस्तुतः एक अतिशयोक्ति है जिसे केवल भय का वातावरण बनाने के लिए उछाला जा रहा है।
वास्तव में सबसे बड़ी चुनौती किसी बाहरी युद्ध से अधिक उस मानसिकता से है जो अफवाहों को सच मानकर अव्यवस्था को जन्म देती है। यदि लोग घबराकर जमाखोरी करने लगेंगे तो बाजार में कृत्रिम कमी पैदा होगी, कीमतें बढ़ेंगी और इसका सीधा असर देश के हर नागरिक पर पड़ेगा। यही कारण है कि संकट के समय संयम और विवेक सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन जाते हैं।
भारत जैसे विशाल और संसाधन-संपन्न देश के लिए कुछ दिनों की आपूर्ति अस्थिरता कोई असाधारण चुनौती नहीं है। इस देश ने सदियों तक सीमित संसाधनों में भी जीवन जीने की क्षमता दिखाई है। आधुनिक ऊर्जा संसाधन निश्चित रूप से जीवन को सुविधाजनक बनाते हैं, लेकिन उनके बिना जीवन असंभव नहीं हो जाता। यह वही भारत है जिसने कठिनतम परिस्थितियों में भी आत्मनिर्भरता और धैर्य का परिचय दिया है।
इसलिए आज आवश्यकता है कि देशवासी किसी भी प्रकार की अफवाह या राजनीतिक बहकावे में आने से बचें। जमाखोरी से दूर रहें, संयम बनाए रखें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। संकट वास्तविक हो या संभावित, उससे निपटने का सबसे प्रभावी तरीका सामूहिक धैर्य और जिम्मेदारी है, न कि भय और अव्यवस्था।
भारत की ताकत उसके संसाधनों में ही नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के संयम और विवेक में भी निहित है। यदि हम पैनिक की जगह धैर्य का रास्ता चुनें, तो कोई भी बाहरी संकट हमारे देश की स्थिरता को डिगा नहीं सकता। युद्ध चाहे जितने दिनों तक चले, अंततः परिस्थितियां सामान्य होती हैं और व्यवस्था फिर से पटरी पर लौट आती है।
आज जरूरत है विश्वास बनाए रखने की, अफवाहों से दूर रहने की और यह याद रखने की कि हम भारतीय हैं—एक ऐसा समाज जो हर कठिनाई का सामना धैर्य, बुद्धिमत्ता और सामूहिक शक्ति से करना जानता है।जय हिंद--रवि यादव










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