सरकारी वकील की लापरवाही का खामियाजा शासन भुगत रहा...
शहर की बेशकीमती जमीनों को हड़प रहे हैं भू माफिया !
ग्वालियर। सिटी सेंटर की जमीनों के भाव आसमान छू रहे है। इस क्षेत्र में मौजूद शासकीय भूमि पर भू माफियाओं की नजर है। सिटी सेंटर क्षेत्र में स्थित अलग-अलग सरकारी जमीनों पर 9 दावे जिला एवं सत्र न्यायालय में पेश हुए हैं जिसमे कब्जे के आधार पर जमीन पर मालिकान हक मांगा है। जमीन पर दो लोगों ने आपसी विवाद बताया है और शासन को एक्स पार्टी घोषित करने की तैयारी है। क्योंकि शासन की ओर से न किसी अधिकारी का वकालत नामा आया है और न जवाब के लिए संपर्क किया है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सिटी सेंटर क्षेत्र की जमीनों पर 2014 से 2023 के बीच 67 दावे पेश किए गए, जिसमें 2023 में 34 दावे पेश हुए थे। न्यायालय में दावे आने के बाद शासन ने ध्यान नहीं दिया। इस कारण शासन एक पक्षीय होने की स्थिति में आ गया है। क्योंकि शासन का पक्ष रखने के लिए केस के प्रभारी को वकालत नामा पेश करना होता है, लेकिन वकालत नामा नहीं आया है, जिससे शासन 67 केसों में एक पक्षीय होने की स्थिति में आ गए हैं। नए दावे भी न्यायालय में पेश हुए हैं। न्यायालय में सिटी सेंटर के अलावा आसपास की जमीनों पर भी दावे पेश किए गए हैं। चरनोई, पहाड़ जमीनों पर दावे पेश किए गए हैं। मंदिरों की जमीनों पर न्यायालय में दावे चल रहे हैं। कलेक्टर में जेसी शाखा बनी है। इस शाखा में फाइल इधर-उधर घूमती रहती है।
इन तरीके से हथिया रहे जमीनों को
सरकारी जमीन पर दो लोग अपना विवाद बताते हैं। दोनों जमीन पर कब्जा बताते हुए मालिकाना हक की मांग करते हैं। इस विवाद को सुलझाने के लिए न्यायालय में वाद पेश करते हैं। शासन को पार्टी बनाया जाता है। जब शासन का लंबे समय तक जवाब नहीं आता है तो उसे एक्स पार्टी घोषित करते हैं। दोनों लोग समझौते के आधार पर विवाद खत्म करते हैं। जमीन का मालिकाना हक हासिल करते हैं।
जब डिक्री पक्ष में हो जाती है तो उस आदेश को राजस्व में नहीं देते हैं। अपील करने की अवधि निकल जाती है तो राजस्व विभाग में नामांतरण के लिए आदेश पहुंचाते हैं। शासन इसकी अपील करता है, लेकिन अपील देर से पेश करने पर वह खारिज हो जाती है।
शासन इस तरह से करोड़ों रुपए की जमीन हार चुका है
जैसे कि पुतली घर की 18 बीघा, लोहा मंडी की जमीन सहित एसपी ऑफिस की जमीन भी शासन हार चुका है। सूत्रों की माने तो क्योंकि देर से अपील दायर की गई थी। इसी आधार पर शासन की अपीलें खारिज हुई हैं।


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