प्रधानमंत्री के वादे पर सवाल देश को अस्थिर करने का प्रयास...

स्वयं को किसान नेता कहने वाला टिकैत नेता नहीं डकैत है

26 जनवरी के दंगाइयों को माफी, सीएए के नाम पर शाहिनबाग करने और दिल्ली को जलाने वाले देशद्रोहियों को माफी की मांग करने वाले टिकैत को क्या किसान नेता कहना उचित है इसके काम इसके काम किसानों वाले तो कतई नहीं है बल्कि जिस प्रकार के काम यह कर रहा है बॉर्डर पर बैठकर बॉर्डर को ब्लॉक करना सरकारों को ब्लैकमेल करना ऐसा काम तो डकैत किया करते थे। तो इसे टिकैत कहने के बजाय डकैत कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। 

जिस प्रकार यह कहता है कि हमें अपनी बात मनवाने और सरकार के सामने रखने के लिए धरने प्रदर्शन और अपनी बात रखने की आजादी है। तो फिर आमजन को भी इसके खिलाफ इसकी कलई खोलने की आजादी है । यह पूरा देश पिछले नवंबर माह से देख रहा है कि यह पिछले 12 महीनों से किस प्रकार सरकार को ब्लैकमेल करने का काम कर रहा है । सीधे-साधे किसानों को अपनी अनर्गल बातों से भड़का रहा है बैहका रहा है और इसके बहकावे में कुछ लोग आ भी रहे हैं। ऐसे ही कुछ लोग 26 जनवरी को देश के खिलाफ ऐसा कृत्य कर बैठे जिससे पूरा देश पूरी दुनिया में लज्जित हुआ और इसके कुछ छींटे किसानों के दामन पर भी आए हैं। 

 कृषि कानून जैसे ही बने और यह इंप्लीमेंट हुए तो किसान आंदोलन का शुभारंभ हुआ। आंदोलन को देखते हुए कोर्ट ने इन कानूनों पर तुरंत रोक लगा दी इसके बावजूद भी टिकैत ने भोले-भाले किसानों को भड़काया उन्हें बरगलाया और प्रदर्शन में मशगूल रखा इतना ही नहीं किसानों को इस कदर तक भड़का दिया कि वे दिल्ली के लाल किले पर पहुंच गए जिसमें करीब साढे 400 से अधिक पुलिस कर्मियों को गंभीर चोटें आई। पूरी दुनिया में देश की बदनामी हुई सो अलग। हाईवेज बंद रहने से देश को करोड़ों का नुकसान पिछले 1 साल में हो चुका है अब तो प्रधानमंत्री मोदी ने भी तीनों कृषि कानून खत्म किए जाने की घोषणा कर दी इसके बाद भी यह टिकैत उर्फ डकैत अपना बोरिया बिस्तर बॉर्डर से समेटने को तैयार नहीं है। आखिर इसकी मंशा क्या है देश जानना चाहता है। 

  इसने जो 6 मांगे रखी है वह तो किसी भी हालत में पूरी होने वाली नहीं है और सरकार चाहते हुए ऐसा कर भी नहीं सकती है क्योंकि चंद लोगों की खातिर पूरा देश अस्थिर हो जाए अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो जाए यह तो संभव ही नहीं है। जिस प्रकार की एमएसपी यह टिकैत किसानों को दिए जाने की बात कर रहा है वह किसी भी सूरते हाल में संभव नहीं है । क्योंकि इसकी मांग के अनुसार यदि सरकार एमएसपी लागू करना चाहेगी तो देश को 17 साल लाख करोड़ रूपया किसानों को बांटना पड़ेगा। जो कि हमारे देश के पूरे बजट का लगभग आधे से भी ज्यादा है। आप जनता स्वयं समझदार है क्या इसकी यह मांग पूरी होना संभव है जी बिल्कुल नहीं क्योंकि देश जितना आर्थिक बोझ सहने की पोजीशन में बिल्कुल नहीं है और फिर चारों तरफ से देश पर युद्ध का खतरा भी मंडरा रहा है ऐसे में टिकैत ने जिस प्रकार की मांग सरकार से रखना देश को गड्ढे में डालने जैसा है।  

इसका जवाब यदि टिकैत के पास हो तो वह इन चीजों की मांग रखें और जब सरकार इतना एमएसपी देगी तो महंगाई कहां पहुंचेगी इसका जवाब भी टिकैत से अब जनता को मांगना चाहिए । विचार करने वाली एक बात यह भी है कि बेशक किसान अन्नदाता है लेकिन क्या इस देश में केवल किसान ही सर्वोपरि है। क्या अर्थव्यवस्था से व्यापारी, मजदूर,कर्मचारी वर्ग, बॉर्डर पर खड़े हमारे सुरक्षा प्रहरी का कोई लेना-देना नहीं है। 

अरे भैया देश अकेले किसान के दम पर नहीं चलता है देश सभी के द्वारा मिलकर अपना अपना कार्य करने से चलता है। जब ये सब अपने कार्य को ईमानदारी से करते हैं तब देश चलता है । किसान केवल फसल उगा कर यह कहे कि मैं देश चला रहा हूं तो वह संभव नहीं है क्योंकि किसान को भी अपनी अन्य जरूरतें पूरी करने के लिए व्यापारी , कर्मचारी , सरकारों आदि सबका सहयोग लेना पड़ता है तब उसकी जरूरतें पूरी होते हैं केवल अन्न उगाने मात्र भर से देश व जीवन नहीं चला करते हैं । इसलिए किसान के नाम पर राजनीति कर रहे टिकैत जैसे डकैत नेताओं को आईना दिखाने का कार्य करना चाहिए। 

और स्वयं किसानों को भी टिकैत जैसे डकैत नेताओं की खटिया खड़ी कर बिस्तर गोल कर देना चाहिए। ऐसे लोगों के बहकावे में आने से बचना चाहिए। और फिर भैया किसानों को किस ने जबरदस्ती कर रखी है कि वह खेती ही करें। अगर उसे खेती में नुकसान हो रहा है तो अन्य काम कर ले। अपनी फसल प्राइवेट मार्केट में बेचे जरूरी थोड़ी ही है कि सरकार को ही  अपनी फसल मंडी में जा कर बेचे। जहां उसे ज्यादा कीमत मिले वहां बेचे। किसान फसल पर तो अपनी इच्छा के अनुसार तो एमएसपी चाहता है लेकिन कर्जे जो लिए होते हैं उन्हें भरना नहीं चाहता। हर वर्ष कर्जा माफी चाहता है। बिजली के बिल भरना नहीं चाहता, पानी का पैसा देना नहीं चाहता, कृषि उपकरणों पर अधिक से अधिक सब्सिडी चाहिए।  ऐसे में देश कैसे चलेगा। 

इसलिए किसानों को भी अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और देश वह सरकार को स्थिर करने में अपना सहयोग देना चाहिए ना की डकैती जैसे नेताओं के बहकावे में आकर देश को अस्थिर होने देना चाहिए। क्योंकि देश को चलाने के लिए सरकार को भी पैसा चाहिए और वह पैसा कहीं बाहर से नहीं आता है वह पैसा हमारी और आपकी जेबों से सरकारों के पास खजाने में जाता है। इसलिए देश का भला चाहने वाले जागो और इस आंदोलन को खत्म करो। जो चीज हो नहीं सकती उसकी व्यर्थ की मांग रखकर किसानों को बेकार में वर्गलाओ मत उनका समय बर्बाद मत करो। टिकैत जी अपना बोरिया बिस्तर समेट और घर जाओ और किसानों को भी जाने दो।

- Ravi Yadav