वोट व सत्ता के लालची CAA के नाम पर धर्म विशेष के लोगों को...

CAA किसी की नागरिकता छीन ही नहीं रहा है फिर भी विरोध !

CAA जब किसी की नागरिकता छीन ही नहीं रहा है फिर भी वोट के लोभी सत्ता के भूखे नेता एक वर्ग विशेष को क्यों बरगला रहे हैं ? और ये कैसे लोग हैं जो इनकी बातों में आकर देश को तोड़ने की ओर अग्रसर हो जाते हैं। क्या इनके स्वयं के पास स्वयं की सोच नहीं है जो दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं ? और जब इस प्रकार के बहकावे में आकर ये लोग हिंदुओं के खिलाफ, देश के खिलाफ अनर्गल बातें करते हैं तो फिर हिंदुओं को भी क्यों नहीं संगठित होना चाहिए। जब धर्म के नाम पर इनके जैसे तमाम वर्ग संगठित रहते हैं तो हिंदुओं के संगठित होने पर आखिर इनको आपत्ति क्यों है ? निश्चित रूप से सभी को संगठित होने का हक है और होना भी चाहिए। क्योंकि संगठन में शक्ति और सुरक्षा दोनों ही निहित होते हैं।

जब कभी कोई सनातनी आधुनिक Social मिडिया के युग में, हिन्दूत्व की लड़ाई लड़ते हुए किसी मुसीबत में फँस जाता है, किसी कानूनी पचड़े में फँस जाता है या अधर्मियों के हाथों शिकार हो जाता है तो वह सहायता के लिये किसे पुकारे? क्या कोई ऐसी संस्था है या कोई हेल्पलाइन है जिसे वह अपनी रक्षा के लिये गुहार लगाये, या फिर वह बंगाल के हिन्दुओं की तरह चुपचाप मरता कटता रहे!

अपने अपने स्तर पर सभी हिन्दू धर्म के युद्ध में अकेले लड़ाई लड़ रहें हैं, क्या उनकी सुरक्षा की गारंटी कोई State गवर्नमेंट या सेंट्रल गवर्नमेंट लेती है?क्या बंगाल के हिन्दुओं के परिवारों के साथ जो हिंसा और बलात्कार हुए, उन्हें बचाने के लिये कोई संगठन सामने आया... ?

जबकि दूसरे धर्मों में उनका "ईसाई मिशनरी, वक्फ बोर्ड अथवा गुरुद्वारा कमेटी" अपने समुदायो के लोगों के लिये संगठित होकर आगे आते हैं और ऐसा आन्दोलन छेड़ते हैं कि प्रसाशन एवं मिडिया के कान के परदे तक हिल जायें, उदाहरण के लिये देश भर में प्रतिदिन सैकड़ों लड़कियों को जिहादियों द्वारा उठा लिया जाता हैं, उनका बलात्कार किया जाता हैं, उनका धर्म परिवर्तन किया जाता है और हम Social मिडिया पर कुछेक पोस्ट डालकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं और भूल जाते हैं।

अब पंजाब में मैं ही देख लीजिए चाहे बेअदबी का मामला हो या अन्य किसी प्रकार के मामलों को लीजिये, देशभर के सभी सिक्खों ने एकत्र होकर एक ऐसा आन्दोलन छेड़ दिया कि जिहादियों को दुम दबाकर भागना पड़ा, इतना ही नहीं उन लड़कियों को भी छोड़ना पड़ा जिनका कि निकाह भी हो गया था, जिहादी न तो कोर्ट का सहारा ले पाये और न थाने पुलिस का! जानते हो ऐसा कैसे संभव हो सका, कैसे सारे सिख एक साथ एक मंच पर अपने सभी काम धंधों को छोड़कर एक हो गये? हिन्दुओं को उनसे सबक लेना चाहिए।

क्योंकि सभी सिक्खों को एकत्र करने और संचालन करने वाली उनकी "गुरुद्वारा कमेटी" है, जिसका चुनाव स्वयं सिक्ख समुदाय अपने वोट देकर करता है, उसी प्रकार जिहादिओं का बचाव उनका "मुस्लिम वक्फ बोर्ड" करता है, यहाँ तक कि उनके दोषी होने पर भी उनका साथ देता है, उसी तरह ईसाई पादरियों पर बलात्कार का चार्ज तक होने पर भी उन्हें उनकी ईसाई मिशनरी बचा ले जाती है!

और दूसरी तरफ हम बेचारे हिन्दू...? क्या हिन्दुओं में इतना विवेक नहीं है कि वो भी अपने लिये एक "राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड" जैसी संस्था का गठन कर सके, जो सभी सनातनियों के लिये एक ढाल का काम कर सके, उन्हें जिहादियों, प्रशासन और दूसरी बाह्य शक्तियों से लड़ने की शक्ति दें सके....? 

लेकिन समस्या यह है कि हममें से कुछ बुद्धिजीवी जो अपने आपको वयस्क एवं समझदार  समझने लगते हैं, वे लोग किसी न किसी राजनैतिक विचारधाराओं से जुड़े होते हैं, फलस्वरूप वे न तो इस विषय में खुद कुछ सोचते हैं और न किसी और के विचारों को सुनने की क्षमता रखते हैं, उन्हें ऐसा लगता हैं कि इस तरह किसी और कि बातें सुनने और मानने लगे तो उनकी क्या हैसियत रह जाएगी* 

अब सोचना किसको है, सोचना हमें और आपको है, सिर्फ़ सोचना ही नहीं करके दिखाना है....! तो आइये एक साथ आगे बढिये और अपने लिये "राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड" बनाने की मांग कीजिए जिसके मेंबर्स का चुनाव प्रत्येक 2 वर्षों के लिये प्रत्येक साधारण हिन्दू जो 18+ का हो अपने वोट डालकर करें!

इस बोर्ड के गठन के लिये प्रधानमंत्री द्वारा किसी अध्यादेश लाने की आवश्यकता नहीं होगी, और न संसद के किसी सदन में कोई बिल पारित करना होगा, बल्कि प्रधानमंत्री अपने सरकारी गजट में इसे छपवा देंगे और हो गया काम! किन्तु प्रधानमंत्री इसे करेंगे तभी जब देश के आधे से अधिक यानिकि करीब 40 करोड़ हिन्दू अपने पत्र द्वारा उन्हंि ऐसा करने के लिये बाध्य करें...!

इससे समस्त हिंदू समाज एक सूत्र में बंध जायेगा और अन्य सम्प्र्दायों की तरह जाति पाती को भुलाकर स्वयं को सिर्फ़ हिन्दू कहलाना पसंद करेगा! हिन्दू एक सशक्त वोट बैंक होगा, उसे अपने हित के लिये किसी राजनैतिक दल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

- Ravi Yadav