पंजाब विधानसभा ने पारित किए तीन विधेयक…

कृषि कानूनों और घमासान

केंद्र सरकार द्वारा हाल में लाए गए कृषि से संबंधित तीन नए कानूनों को लेकर किसानों का विरोध अभी थमा नहीं है। इस बीच पंजाब विधानसभा ने एक विशेष अधिवेशन में मंगलवार को न केवल इन तीनों कानूनों को नामंजूर घोषित किया बल्कि तीन नए विधेयक पारित कर पंजाब को इनके असर से मुक्त रखने की कोशिश भी की। राज्य सरकार का कहना है कि इन विधेयकों के जरिए उसने प्रदेश के किसानों को पंजाब एग्रिकल्चर प्रोड्यूस मार्केट्स एक्ट 1961 के तहत पहले से मिली वह सुरक्षा बरकरार रखने का प्रयास किया है जो केंद्र के नए कानूनों से खत्म हो जाने वाली है। ये विधेयक किसानों को मंडियों से बाहर भी अपनी उपज बेचने की छूट देते हैं, लेकिन इनके मुताबिक, न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर की गई कोई भी खरीद वैध नहीं होगी और ऐसा करने वालों को तीन साल कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है। 

आवश्यक वस्तुओं को खरीदने और संग्रह करने की सीमा हटाए जाने के प्रावधान की जगह नया बिल साफ कहता है कि इसकी सीमा राज्य सरकार निर्धारित करेगी। विधानसभा में पेश किए गए एक अन्य बिल में किसानों की ढाई एकड़ तक की जमीन को कुर्की-जब्ती से बचाने का प्रावधान है। हालांकि ये विधेयक अभी कानून नहीं बने हैं। चूंकि ये संसद द्वारा बनाए गए कानून से टकराते हैं इसलिए इन्हें राज्यपाल के अलावा राष्ट्रपति के पास भी मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। मौजूदा हालात में इन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की संभावना कम है, फिर भी पंजाब विधानसभा का यह कदम काफी अहमियत रखता है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व वाली अन्य राज्य सरकारें भी आने वाले दिनों में ऐसे ही कदम उठा सकती हैं। मतलब यह कि केंद्र सरकार और किसानों के बीच का यह मुद्दा अब केंद्र और विपक्षी राज्य सरकारों के बीच के विवाद जैसी शक्ल लेता जा रहा है। 

इस बहस में दोनों ही पक्ष खुद को किसानों का हितैषी बता रहे हैं लेकिन किसान अपनी चिंताओं का साझा दोनों से ही करने को तैयार नहीं हैं। केंद्र सरकार जहां बड़ी पूंजी को खेती की ओर आकर्षित कर उसे लाभदायक बनाते हुए किसानों की आमदनी बढ़ाने की बात कह रही है, वहीं विपक्षी राज्य सरकारें किसानों की सुरक्षा का वास्ता देते हुए इस पूरी प्रक्रिया को अटकाने की कोशिश में हैं। एक बात तो तय है कि केंद्र सरकार नए कृषि कानूनों के पीछे किसानों की भलाई की जो दलील देती रही है, उसको अबतक किसानों के लिए ग्राह्य नहीं बनाया जा सका है। इसका जितना भी हिस्सा किसानों तक पहुंच पाया है, वह किसानों के डर, उनकी चिंता और असुरक्षा को संबोधित करने में विफल रहा है। सरकार की नीयत अच्छी और इरादे नेक हों तो भी किसानों में यह भरोसा होना जरूरी है कि खुले बाजार का हिस्सा बनने पर उनकी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ने नहीं जा रहीं।