आपातकाल : ज़रूरी क्या संवेदना या कानून !

देश और दुनिया अभी जिस भयावह स्तिथि से गुज़र रही है वह शायद पिछले कई सौ सालों से नहीं गुज़री होगी। किसी ने अपने  सबसे बद से बदतर ख्यालों में भी नही सोच होगा कि इंसान इंसान से मिलने में डरेगा और ज़िंदगी ख़ौफ़ के साये में बीतेगी। इस आपातकाल में जो सबसे ज़्यादा कठिन समय वो लोग देख रहे हैं जो रोज़ कमा कर खाने वाले हैं। जैसे दिहाड़ी मजदूर, घरों में काम करने वाले लोग, छोटे किसान , छोटी दुकान चलाने वाले लोग। लोकडाउन की वजह से और वायरस के डर से इन सभी का रोज़गार इनसे छीन गया और एक वक्त की  रोटी तक को कई परिवार मोहताज हो गए। अगर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा तो उन लोगों को जिनके बंधी आय और बैंकों में पर्याप्त जमा पूंजी थी। यही कारण है कि आने वाले कई सालों तक अपराध और ज़बरदस्ती से कब्ज़ा कर लेने जैसी घटनाएं सामने आती रहेंगी। और यह सुनने में आने भी लगी हैं। 

हाल ही में हुए मध्य प्रदेश के गुना जिले में घटित दलित परिवार के साथ प्रशासन द्वारा मारपीट की जो घटना सामने आई है उसने ये सोचने पर विवश कर दिया है , कि इस बेहाल हुई अर्थव्यवस्था और गरीबों के पंजर हालातों को समझ कर उनकी समस्याओं का निदान करने से ज़्यादा क्या अनुशासन का पालन करना ज़रूरी है। और क्या इतना ज़रूरी है कि गरीब मारने और मरने को मजबूर हो जाये। क्या इस कोरोना ने इंसानियत को भी निगल लिया है? की जो सक्षम है वो अपनी क्षमता के अनुसार ऐसे लोगों की मदद भी ना कर सकें? जो भी गुना में घटा वह निंदनीय है, और समाज के वरिष्ठ वर्ग को आगे आकर आने वाले समय में ऐसे लोगों की मदद को आगे आना पड़ेगा, जिनके पास ना रोज़गार बचा है ना कोई जमा पूंजी।

तभी हम समाज में गुनाह को बढ़ने से रोक पाएंगे। देश को इस आपातकाल से निकलना न सिर्फ सरकार की ज़िम्मेदारी है बल्कि हर एक सक्षम नागरिक का कर्तव्य है। सरकार ऐसे समय में कड़े नियमो के नाम पर अत्याचार करे ये कहां तक जायज़ है। आखिर भूख से ऊपर तो कुछ नहीं है। हर इंसान इस वक़्त मानसिक तनाव की स्तिथि से गुज़र रहा है ऐसे में प्रशासन को चाहिए कि जो कमजोर हैं उन्हें सहारा दें ना कि नियमों के नाम पर प्रताड़ना। संवेदना या कानून दोनों अपनी जगह ज़रूरी हैं पर जहां सवाल सिर्फ दो वक्त की रोटी का हो, वहां सिर्फ सम्वेदना ही होनी चाहिए...कानून नही।

                                                                                                        मोनिका जैन
                                                                     योग प्रशिक्षक