भारत कर रहा चौतरफा चुनौतियों का सामना !

मंगलवार को भारत, रूस और चीन के विदेश मंत्रियों की वर्चुअल बैठक यूं तो पहले से तय थी, लेकिन अभी के माहौल में यह अकारण एक सनसनीखेज घटना बन गई। पिछले हफ्ते गलवान घाटी में भारत और चीन की स्थानीय फौजी टुकड़ियों के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद पहली बार दोनों देशों के विदेश मंत्री किसी बैठक में एक साथ बैठे। हालांकि यह त्रिपक्षीय बैठक थी, जिसमें द्विपक्षीय मसले नहीं उठने थे। वैसे भी दो बड़े और ताकतवर देशों में कोई मतभेद या विवाद होता है तो उसे सुलझाने का सबसे अच्छा तरीका आपसी बातचीत का ही है। मौजूदा संदर्भों में सबसे अच्छी बात यही है कि सीमा पर हुई दुर्भाग्यपूर्ण झड़प के बाद भी दोनों देशों में संवाद जारी है। अलग-अलग स्तरों पर बातचीत लगातार चल रही है। जाहिर है, चीन ने अपने रवैये से भारत को आहत किया है। इस बात का अहसास उसे जल्द से जल्द कराना भारत की कूटनीतिक कामयाबी की कसौटी है। 

भारतीय कूटनीति के शानदार अतीत को देखते हुए इस मामले में उसकी सफलता को लेकर संदेह करने का कोई कारण नहीं बनता। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि मौजूदा दौर भारतीय कूटनीति की कुछ ज्यादा ही कड़ी परीक्षा ले रहा है। चीन तो इसका सिर्फ एक मोर्चा है, उसके अलावा कई अन्य मोर्चे भी भारतीय राजनय के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हैं। ओआईसी यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन का झुकाव कश्मीर के मसले पर भारत की तुलना में पाकिस्तान की तरफ थोड़ा ज्यादा रहा है, लेकिन कई मुस्लिम देशों के साथ अपनी सघन मैत्री के जरिये भारत यह सुनिश्चित करता रहा है कि इस मंच का इस्तेमाल उसके हितों के खिलाफ न किया जा सके। यह सिलसिला इधर अचानक टूट गया है। हाल में ओआईसी की एक समिति ने पाकिस्तान के कहने पर न केवल आपात बैठक बुलाई बल्कि उसमें अनुच्छेद 370 पर भारत सरकार के रुख के खिलाफ बहुत कड़ा प्रस्ताव पारित कर दिया। 

दूसरी तरफ हमारे सबसे करीबी पड़ोसी देश नेपाल की सरकार ने भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से जुड़े एक विवाद पर भारत से बातचीत किए बगैर अपनी संसद में संविधान संशोधन के जरिये विवादित नक्शा पास करवा लिया। तीसरी ओर, हर मंच पर भारत को अपना दोस्त बताने वाले अमेरिका ने पिछले कुछ दिनों में ऐसे कई कदम उठाए हैं जिनसे भारतीय हित प्रभावित होते हैं। ताजा फैसले में उसने एच-वन बी वीजा पर एक साल के लिए रोक लगा दी है, जिससे भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों को काफी नुकसान होगा। निश्चित रूप से इन सभी मामलों की अलग-अलग पृष्ठभूमि है और इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जहां हालात सुधरने की राह बंद हो गई हो। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि भारत के राजनयिकों के लिए आगे का रास्ता खासा मुश्किल है। चीन का कूटनीतिक मोर्चा भी हमारे हाथ तभी आएगा, जब बाकी मोर्चों पर हमारी स्थिति मजबूत रहे।

                                                                                             - दिव्या सिंह यादव