गर कुर्सी बोलती तब...
एक बार कुर्सी मचली,
ले शिकायत घर से निकली ।
भीड़ देख रुक गई,
आड देख छुप गई ।
व्यर्थ घोषणा करता है,
माहौल चुनावी लगता है ।
बस आपका सहारा है,
आगे का काम हमारा है ।
लगे मुहर आपकी,
सरकार हमारे बाप की ।
भाषण से कला विखेरी थी,
जनता की भीड़ घनेरी थी ।
मै बोलूंगी अब ना सहूंगी,
व्यथा इनसे कहूँगी ।
वोटर से नम्र निवेदन है,
अभी तो बस आवेदन है ।
मै लकड़ी की समझ गई,
तेरी मत कैसे मारी गई ।
अब तुम मुझको माफ करो,
मेरे संग भी इन्साफ करो ।
क्यू ऐसे लोग बिठाते हो,
मुझपे इलज़ाम लगाते हो ।
बैठकर चिपक गए,
खुद बनने में लग गए ।
बेभार संपति लेकर,
अब जाए कैसे उठकर ।
उदर वायु विसर्जन वादे,
बिखर गए ऐसा पादे ।
जो में अपनी पे आऊंगी,
तो हाहाकार मचाऊगी ।
सुनने को और दलीलें है,
मेरे अंदर भी कीलें है ।
अपने दागों को धो दूंगी,
मै श्वपन फाड़कर रख दूंगी ।
निद्रा जमीर की खोलूंगी,
बस A T S लगवा दूंगी ।
अब मेरी व्यथा समझ जाओ,
सज्जन मानव चुन पहुंचाओ ।
स्वच्छ स्वशासी सौम्य छवि,
हो कान्ति चमक जैसे रवि ।
सत कर्म करे तब हो कल्याण,
सर्वस्व रहे मेरा देश महान ।



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