काव्य : गर कुर्सी बोलती तब...

गर कुर्सी बोलती तब...

एक बार कुर्सी मचली, 
ले शिकायत घर से निकली ।

भीड़ देख रुक गई,
आड देख छुप गई ।

व्यर्थ घोषणा करता है, 
माहौल चुनावी लगता है ।
     
बस आपका सहारा है, 
आगे का काम हमारा है ।

लगे मुहर आपकी, 
सरकार हमारे बाप की ।

भाषण से कला विखेरी थी, 
जनता की भीड़ घनेरी थी ।

मै बोलूंगी अब ना सहूंगी, 
व्यथा इनसे कहूँगी ।

वोटर से नम्र निवेदन है, 
अभी तो बस आवेदन है ।

मै लकड़ी की समझ गई, 
तेरी मत कैसे मारी गई ।

अब तुम मुझको माफ करो, 
मेरे संग भी इन्साफ करो ।

क्यू ऐसे लोग बिठाते हो, 
मुझपे इलज़ाम लगाते हो ।

बैठकर चिपक गए, 
खुद बनने में लग गए ।

बेभार संपति लेकर, 
अब जाए कैसे उठकर ।

उदर वायु विसर्जन वादे, 
बिखर गए ऐसा पादे ।

जो में अपनी पे आऊंगी, 
तो हाहाकार मचाऊगी ।

सुनने को और दलीलें है, 
मेरे अंदर भी कीलें है ।

अपने दागों को धो दूंगी, 
मै श्वपन फाड़कर रख दूंगी ।

निद्रा जमीर की खोलूंगी,
बस A T S लगवा दूंगी ।

अब मेरी व्यथा समझ जाओ, 
सज्जन मानव चुन पहुंचाओ ।

स्वच्छ स्वशासी सौम्य छवि, 
हो कान्ति चमक जैसे रवि ।

सत कर्म करे तब हो कल्याण, 
सर्वस्व रहे मेरा देश महान ।

भूपेंद्र "भोजराज "भार्गव

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