लोकतंत्र बचाने के नाम पर वोट चोरी का शोर या राजनैतिक सत्ता से बाहर होने का डर...
लोकतंत्र के नाम पर लोगों को सड़कों पर उतारने की राजनीति बंद हो,एवं विपक्ष की जवाबदेही तय हो !
विपक्ष के नेता या तो चुनावी प्रक्रिया को समझ नहीं पा रहे हैं, या फिर वे देश की जनता को इतना नासमझ समझ बैठे हैं कि जो कुछ भी वे कहेंगे, जनता उसे आंख बंद करके सच मान लेगी! देश में इन दिनों वोट चोरी, चुनाव चोरी और लोकतंत्र खतरे में होने के नारे खूब सुनाई दे रहे हैं। विपक्ष के नेता चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। जनता से सड़कों पर उतरने की अपील की जा रही है। युवाओं को आंदोलन के लिए उकसाया जा रहा है और सत्ता परिवर्तन के नाम पर राजनीतिक माहौल को गरमाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने गंभीर आरोप केवल भाषणों, नारों और राजनीतिक बयानों के आधार पर सच मान लिए जाएं? क्या लोकतंत्र को बचाने का दावा करने वाले नेताओं की जिम्मेदारी नहीं है कि वे जनता के सामने ठोस सबूत रखें?
आखिर लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है,संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा, निष्पक्ष प्रक्रिया, जनता के मताधिकार का सम्मान और आरोपों की निष्पक्ष जांच। यदि वास्तव में कहीं वोटों की हेराफेरी हुई है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। दोषी चाहे किसी भी दल का हो, उसे सजा मिलनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप राजनीतिक लाभ के लिए लगाए जा रहे हैं, तो जनता को भ्रमित करने वालों से भी जवाब मांगना जरूरी है। आइए, विपक्ष के उन नेताओं से कुछ सीधे सवाल पूछते हैं, जो वोट चोरी का आरोप लगाते हुए देश के लोकतंत्र को बचाने के नाम पर जनता को आंदोलन के लिए बुला रहे हैं।
पहला सवाल: चुनाव आयुक्त वोट चोरी के लिए जिम्मेदार कैसे हो गए?
भारत में मतदान की प्रक्रिया किसी एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं चलती। मतदान केंद्र पर मतदाता की पहचान, मतदान की व्यवस्था, अधिकृत मतदान अधिकारियों की मौजूदगी, राजनीतिक दलों के नियुक्त एजेंटों की निगरानी और मतदान के बाद निर्वाचन सामग्री को सुरक्षित रखने जैसी अनेक प्रक्रियाएं होती हैं।
मतदान पूरा होने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ईवीएम और वीवीपैट से संबंधित सामग्री को सुरक्षित किया जाता है। निर्धारित सील, दस्तावेजों, अभिलेखों और सुरक्षा व्यवस्थाओं के तहत इसे सुरक्षित रखा जाता है। मतगणना के समय भी निर्धारित नियमों के अनुसार संबंधित अधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों की मौजूदगी में प्रक्रिया संपन्न होती है।
इस पूरी व्यवस्था के बीच यदि कोई गड़बड़ी हुई है, तो उसका स्थान, तरीका, समय और उससे संबंधित प्रमाण सामने आने चाहिए।
सवाल यह है कि किस मतदान केंद्र पर, किस प्रक्रिया में, किसके हस्तक्षेप से और किस प्रमाण के आधार पर वोट चोरी का आरोप लगाया जा रहा है? क्या केवल चुनाव आयुक्त का नाम लेकर आरोप लगा देना ही अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है? निश्चित रूप से नहीं!
आरोप गंभीर हैं तो प्रमाण भी उतने ही गंभीर होने चाहिए। चुनाव आयोग से सवाल पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन बिना प्रमाण किसी को दोषी घोषित करना न्यायसंगत नहीं है।
दूसरा सवाल: यदि चुनाव आयोग ने केवल एक पार्टी को जिताने के लिए वोट चोरी करवाई, तो विपक्षी दलों के सांसद और विधायक कैसे जीत गए?
विपक्ष के आरोपों के सामने यह एक महत्वपूर्ण सवाल है।देश के अलग-अलग चुनावों में विभिन्न दलों के उम्मीदवार जीतते हैं। कहीं सत्तारूढ़ दल को सफलता मिलती है, तो कहीं विपक्षी दल सत्ता में आ जाते हैं। कई राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें भी बनी हैं।
ऐसे में यदि आरोप यह है कि चुनाव आयोग ने किसी एक दल को जिताने के लिए पूरे चुनाव में हेराफेरी की, तो उस आरोप के समर्थन में चुनाववार और क्षेत्रवार प्रमाण सामने आने चाहिए।
यह तर्क देना कि विपक्ष की जीत से किसी भी प्रकार की गड़बड़ी असंभव सिद्ध हो जाती है, सही नहीं होगा। उसी तरह विपक्ष की हार को अपने आप वोट चोरी का प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं है।
लोकतंत्र में जीत का प्रमाण मतगणना का परिणाम है और गड़बड़ी का प्रमाण ठोस साक्ष्य। दोनों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
तीसरा सवाल: राहुल गांधी और प्रियंका गांधी चुनाव जीतते हैं, तो क्या उनके निर्वाचन क्षेत्र में भी वोट चोरी हुई थी?
जब विपक्ष के नेता चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, तो उनसे यह भी पूछा जाना चाहिए कि वे किन चुनावों और किन निर्वाचन क्षेत्रों में अनियमितताओं का आरोप लगा रहे हैं।
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे प्रमुख नेताओं की चुनावी जीत भी उसी संवैधानिक चुनावी व्यवस्था के अंतर्गत दर्ज होती है, जिस पर विपक्ष के कुछ नेता सवाल उठा रहे हैं। यदि व्यवस्था में गंभीर खामी होने का दावा है, तो उस खामी की प्रकृति और उसका प्रभाव स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यह सवाल किसी की जीत को संदेहास्पद ठहराने के लिए नहीं, बल्कि एक ही व्यवस्था के परिणामों को लेकर अपनाए जा रहे राजनीतिक दोहरे मापदंडों की जांच करने के लिए है।
जब परिणाम पक्ष में आएं तो व्यवस्था स्वीकार्य और परिणाम प्रतिकूल हों तो पूरी व्यवस्था संदिग्ध, क्या यही लोकतांत्रिक राजनीति का नया सिद्धांत है?
चौथा सवाल: जब विपक्षी दल कई राज्यों में सरकारें बना चुके हैं, तो क्या उन चुनावों की प्रक्रिया भी संदिग्ध है?
विपक्षी दल विभिन्न राज्यों में चुनाव जीतकर सरकारें बनाते हैं। यदि वे चुनावी व्यवस्था पर व्यापक स्तर पर अविश्वास व्यक्त करते हैं, तो उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि उनका आरोप किन विशेष घटनाओं और प्रमाणों पर आधारित है।लेकिन इसके उलट यह मान लेना कि विपक्ष की हार का कारण अनिवार्य रूप से वोट चोरी ही है, उतना ही गलत है। चुनावी नतीजों को अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार स्वीकारना या नकारना लोकतंत्र के प्रति ईमानदारी नहीं है।
पांचवां सवाल: दिल्ली में बैठे चुनाव आयुक्त को कैसे पता चलता है कि किस मतदाता ने किसे वोट दिया?
भारत में मतदान की गोपनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है। मतदाता किस उम्मीदवार को वोट देता है, यह उसकी निजी पसंद है। मतदान की गोपनीयता बनाए रखने के लिए व्यवस्था निर्धारित है। चुनाव आयोग का कोई अधिकारी केवल पद पर होने के कारण यह नहीं जान सकता कि किसी विशेष मतदाता ने किस उम्मीदवार को वोट दिया।
इसलिए यदि आरोप है कि मतदाताओं के वास्तविक वोटों में हेराफेरी हुई, तो यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कथित गड़बड़ी किस स्तर पर हुई और उसके समर्थन में क्या प्रमाण हैं।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि मतदान की गोपनीयता होने के कारण किसी भी तरह की गड़बड़ी असंभव है। लेकिन गड़बड़ी की आशंका और गड़बड़ी का प्रमाण दो अलग-अलग बातें हैं। विपक्ष को इस अंतर को समझना होगा और जनता को भी समझाना होगा।
छठा सवाल: विपक्ष को कैसे पता चला कि वोट चोरी हो रही है?
यदि विपक्ष के पास वोट चोरी के प्रमाण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से सामने लाया जाना चाहिए और सक्षम निर्वाचन अधिकारियों या न्यायिक मंचों के समक्ष रखा जाना चाहिए।
किस मतदान केंद्र पर क्या हुआ? किस मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया? कहां मतदाता सूची में अनियमितता मिली? किस बूथ के परिणाम पर संदेह है? क्या संबंधित अभिलेखों, शिकायतों और उपलब्ध दस्तावेजों से आरोप की पुष्टि होती है? इन सवालों के जवाब देश की जनता जानना चाहती है।
सिर्फ यह कहना कि चुनाव में गड़बड़ी हुई है, पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में आरोप लगाने वाले को अपने दावे के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए, ताकि उनकी निष्पक्ष जांच हो सके।
यदि सबूत हैं, तो उन्हें सामने रखिए। यदि सबूत नहीं हैं, तो केवल राजनीतिक भाषणों से जनता के मन में संदेह पैदा करना बंद कीजिए।
सातवां सवाल: विपक्ष को कैसे पता चला कि कथित तौर पर हटाए गए नाम केवल उसी के समर्थकों के थे?
मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया के लिए निर्धारित नियम हैं। मतदाता सूची में संशोधन को लेकर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है।
लेकिन यदि किसी दल का दावा है कि हटाए गए नाम उसके समर्थकों के थे, तो उसे बताना होगा कि यह निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया।
किसी मतदाता की राजनीतिक पसंद का अनुमान लगाकर यह घोषित नहीं किया जा सकता कि उसका नाम हटने से किसी खास पार्टी को नुकसान पहुंचा है। मतदाता का वास्तविक राजनीतिक रुझान और उसका वोट गोपनीय विषय हैं।
यदि नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, तो उनकी जांच होनी चाहिए। यदि पात्र मतदाताओं को मतदान से वंचित किया गया है, तो यह गंभीर मामला है। लेकिन बिना प्रमाण यह मान लेना कि हटाया गया प्रत्येक नाम किसी एक राजनीतिक दल के समर्थक का ही था, उचित नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल उठाइए, लेकिन मतदाता की राजनीतिक पसंद के बारे में बिना आधार दावे मत कीजिए।
आठवां सवाल: यदि ईवीएम की व्यवस्था सुरक्षित है, तो वोट चोरी कैसे हुई?
ईवीएम की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर देश में लंबे समय से बहस होती रही है। चुनाव आयोग ने मशीनों की सुरक्षा और मतदान प्रक्रिया के संबंध में निर्धारित व्यवस्थाएं बनाई हैं। इन व्यवस्थाओं की समीक्षा और उन पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है।
लेकिन किसी मशीन को हैक कर लेने या वोटों में हेराफेरी कर देने का दावा तकनीकी प्रमाणों के आधार पर ही परखा जा सकता है। बिना किसी ठोस प्रमाण के यह कहना कि ईवीएम हैक कर ली गई या चुनाव आयुक्त ने वोट चोरी करवा दी, भी उचित नहीं है। सवाल यह नहीं कि कौन कितना जोर से चिल्लाता है; सवाल यह है कि किसके पास क्या प्रमाण है।
यदि विपक्ष के पास कोई तकनीकी प्रमाण, सत्यापित दस्तावेज या विशिष्ट अनियमितता का विवरण है, तो उसे सामने रखकर निष्पक्ष जांच की मांग करनी चाहिए।
नौवां सवाल: मतदाता सूची से नाम हटने पर विपक्ष को कैसे पता चला कि वे सभी उसके ही वोट थे?
मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम काटे जाने की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। किसी पात्र नागरिक का नाम अनुचित तरीके से हटना उसके लोकतांत्रिक अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
लेकिन यह निष्कर्ष निकालना कि सूची से हटाए गए सभी मतदाता किसी विशेष दल को वोट देने वाले थे, प्रमाण के बिना संभव नहीं है। यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं, तो यह जांच का विषय है कि कितने नाम नियमानुसार हटे, कितने नाम गलत तरीके से हटे और कितने पात्र मतदाता वास्तव में प्रभावित हुए।
यह भी जांचना चाहिए कि संबंधित शिकायतें कब दर्ज हुईं, उनका निपटारा कैसे हुआ और क्या किसी पात्र मतदाता को अपना नाम पुनः जुड़वाने का अवसर मिला। विपक्ष को इन सवालों के जवाब दस्तावेजों के साथ देने चाहिए।
अन्यथा जनता पूछेगी कि क्या मतदाता सूची की हर त्रुटि को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखना ही अब विपक्ष की रणनीति बन गई है?
दसवां सवाल: घुसपैठ और संदिग्ध मतदाता पहचान के मुद्दे पर राजनीति क्यों?
अवैध घुसपैठ, नागरिकता और मतदाता सूची की शुद्धता गंभीर विषय हैं। इन पर चर्चा कानून, प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर होनी चाहिए।यदि किसी व्यक्ति की पात्रता पर सवाल है, तो संबंधित अधिकारियों को कानूनी प्रक्रिया के अनुसार जांच करनी चाहिए। किसी व्यक्ति को केवल उसकी भाषा, धर्म, जातीय पहचान या मूल स्थान के आधार पर अवैध मतदाता घोषित नहीं किया जा सकता। इसी तरह किसी भी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध को देखकर उसके सभी समर्थकों को संदिग्ध मान लेना भी अनुचित है।
बांग्लादेशी नागरिकों या रोहिंग्या समुदाय के लोगों से जुड़े मुद्दों पर विपक्षी नेताओं के बयानों की आलोचना की जा सकती है, लेकिन किसी दल पर वोट चोरी करने का आरोप तभी उचित होगा, जब उसके समर्थन में प्रमाण हों।यदि विपक्ष मतदाता सूची में अनियमितताओं का आरोप लगा रहा है, तो उससे यह पूछना उचित है कि उसके पास उन अनियमितताओं के क्या प्रमाण हैं।
लेकिन वोट चोरी का आरोप लगाने वालों पर बिना सबूत वोट चोरी करने का आरोप लगा देना भी उसी राजनीतिक गैर-जिम्मेदारी का हिस्सा होगा, जिसकी आलोचना की जा रही है। कानून का शासन किसी भी राजनीतिक दल की सुविधा से ऊपर होना चाहिए।
ग्यारहवां और सबसे महत्वपूर्ण सवाल: आपको लोकतंत्र बचाने के नाम पर जनता को सड़कों पर उतारने का अधिकार किसने दिया?
विपक्ष का हर नेता यदि यह कहने लगे कि लोकतंत्र खतरे में है, जनता सड़कों पर आए और सरकार को उखाड़ फेंके, तो उससे कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए।
- आखिर जनता सड़कों पर क्यों आए...
- क्या जनता को अपनी रोजमर्रा की समस्याएं छोड़कर राजनीतिक दलों के आंदोलनों का हिस्सा बन जाना चाहिए?
- क्या जनता को हर राजनीतिक आरोप पर बिना जांच विश्वास कर लेना चाहिए?
विपक्ष को आंदोलन करने, सरकार की आलोचना करने, चुनाव आयोग से सवाल पूछने और निष्पक्ष जांच की मांग करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है। जनता को शांतिपूर्ण विरोध करने और अपनी बात रखने का अधिकार भी है। लेकिन किसी भी दल को यह अधिकार नहीं है कि वह जनता से बिना प्रमाण अपने राजनीतिक दावों को सच मानने की अपेक्षा करे या उसे हिंसा, तोड़फोड़ अथवा उपद्रव की ओर धकेले।
लोकतंत्र किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं है और जनता किसी राजनीतिक दल की भीड़ नहीं है।
यदि चुनावी अनियमितताओं के प्रमाण हैं, तो कानूनी रास्ता अपनाइए। संबंधित अधिकारियों के समक्ष शिकायत कीजिए। निर्वाचन प्रक्रिया के अंतर्गत उपलब्ध उपायों का उपयोग कीजिए। जरूरत पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाइए।लोकतंत्र बचाने की जिम्मेदारी केवल राजनीतिक नेताओं की नहीं है,लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए सभी संस्थाओं, दलों और नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए?
लेकिन यदि आपका उद्देश्य केवल राजनीतिक माहौल बनाना है, तो लोकतंत्र बचाने के नाम पर जनता को गुमराह करना देशहित में नहीं है।
जनता को मूर्ख समझने की भूल मत कीजिए...
देश की जनता केवल भाषण नहीं सुनती, वह नेताओं के कामकाज और उनके आचरण को भी देखती है। जनता यह भी देखती है कि कौन महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और युवाओं के मुद्दों पर बात करता है और कौन हर चुनाव के बाद अपनी हार का कारण केवल चुनावी गड़बड़ी बताने लगता है।
यह मान लेना भी गलत होगा कि जो जनता किसी आंदोलन में शामिल नहीं होती, उसे लोकतंत्र की चिंता नहीं है। लोकतंत्र के प्रति चिंता व्यक्त करने के अनेक तरीके हैं और हर नागरिक को आंदोलन में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। विपक्षी नेताओं को यह समझना होगा कि जनता को बार-बार किसी कथित खतरे का भय दिखाकर राजनीतिक रूप से लामबंद करने की कोशिश तभी सफल होगी, जब उनके दावों में विश्वसनीयता होगी।
विश्वसनीयता नारों से नहीं, तथ्यों से बनती है...
लोकतंत्र के नाम पर राजनीति करना आसान है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना बड़ी जिम्मेदारी है। यदि चुनाव आयोग पर सवाल उठते हैं, तो जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी है, तो उसे सुधारा जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने गलत काम किया है, तो जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप साबित नहीं होते, तो नेताओं को अपनी भाषा और अपने दावों की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।
विपक्ष के लिए चेतावनी...
- राजनीतिक कुर्सी की लड़ाई को देश की लड़ाई मत बनाइए! राजनीति में सत्ता प्राप्त करना गलत नहीं है। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों की आलोचना करना, जनता की समस्याओं को उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाना है।लेकिन सत्ता प्राप्त करने की इच्छा और लोकतंत्र की रक्षा करने के दावे के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है।
- यदि किसी दल को लगता है कि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है, तो उसे प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। यदि उसे लगता है कि चुनाव आयोग ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसे विशिष्ट घटनाओं के आधार पर जवाबदेही मांगनी चाहिए।
- लेकिन यदि हर चुनावी हार के बाद पूरा तंत्र ही संदिग्ध घोषित कर दिया जाए, तो इससे उन संस्थाओं पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है, जिनकी निष्पक्षता लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
- यह भी उतना ही जरूरी है कि चुनाव आयोग स्वयं पारदर्शिता, निष्पक्षता और शिकायतों के समयबद्ध निपटारे के माध्यम से जनता का विश्वास बनाए रखे।
- संस्थाओं से सवाल पूछना लोकतंत्र को कमजोर करना नहीं है। बल्कि सवालों का जवाब न देना, शिकायतों की अनदेखी करना या बिना प्रमाण आरोपों को राजनीतिक हथियार बनाना लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुंचा सकता है।
- विपक्ष को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल तब तक लोकतंत्र नहीं है, जब तक सत्ता उसकी मुट्ठी में हो। लोकतंत्र तब भी लोकतंत्र है, जब जनता उसे विपक्ष में बैठने का जनादेश देती है।
- यदि जनता ने किसी दल को सत्ता नहीं सौंपी, तो उसे अपनी हार के कारणों की समीक्षा करनी चाहिए। उसे अपनी नीतियों, नेतृत्व, संगठन और जनसंपर्क पर विचार करना चाहिए।
- यदि उसे चुनावी अनियमितताओं का संदेह है, तो प्रमाण जुटाकर कानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए। लेकिन अपनी राजनीतिक असफलताओं की जिम्मेदारी से बचने के लिए जनता को लगातार आंदोलनों के लिए बुलाना कोई स्थायी राजनीतिक समाधान नहीं है।
अंतिम बात: लोकतंत्र बचाना है, तो पहले तथ्यों का सम्मान करना सीखिए!
भारत का लोकतंत्र किसी एक नेता, किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक सरकार की वजह से नहीं है। यह संविधान, जनता के अधिकारों, स्वतंत्र संस्थाओं, कानून के शासन और नागरिकों के विश्वास पर टिका है।
इसलिए न तो चुनाव आयोग को सवालों से परे माना जा सकता है और न ही विपक्ष के हर आरोप को स्वतः सत्य स्वीकार किया जा सकता है। हर आरोप की जांच होनी चाहिए। हर शिकायत को सुना जाना चाहिए। हर दोषी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और हर नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए।
लेकिन देश की जनता को भी समझना होगा कि राजनीतिक भाषणों में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द, वोट चोरी, लोकतंत्र खतरे में और संविधान बचाओ, अपने आप में किसी आरोप का प्रमाण नहीं होते।
यदि विपक्ष के पास सबूत हैं, तो सामने रखे। यदि गड़बड़ी हुई है, तो जांच कराए। यदि दोषी हैं, तो उन्हें सजा दिलाए। लेकिन यदि केवल राजनीतिक लाभ के लिए जनता के मन में अविश्वास पैदा किया जा रहा है, तो देश को इसका हिसाब मांगना चाहिए।
देश की एकता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सार्वजनिक व्यवस्था के विरुद्ध किसी भी प्रकार की हिंसा, तोड़फोड़ या अवैध गतिविधि स्वीकार्य नहीं हो सकती। असहमति लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन हिंसा लोकतंत्र का विकल्प नहीं है।
विपक्ष के नेताओं से आखिरी सवाल ...
आप लोकतंत्र बचाना चाहते हैं या केवल अपनी राजनीतिक जमीन ? क्योंकि यदि उद्देश्य वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा है, तो रास्ता प्रमाण, पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और संवैधानिक प्रक्रिया से होकर जाएगा।
लेकिन यदि उद्देश्य केवल सत्ता की लड़ाई को लोकतंत्र की लड़ाई बताना है, तो जनता को यह अधिकार है कि वह आपसे सवाल पूछे, आपके दावों के प्रमाण मांगे और आपके राजनीतिक इरादों का मूल्यांकन करे। आरोप का प्रमाण आपके पास है नहीं। आरोप लगाते हैं और भाग जाते हैं, मामला कोर्ट में पहुंच जाए तो माफी मांग कर निकाल लेते हैं। कब तक चलेगा।
याद रखिए, यह देश और ये जनता किसी नेता की जागीर नहीं है, लोकतंत्र किसी दल का ठेका नहीं है और देश किसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से बड़ा है।
देशहित सर्वोपरि है। संविधान सर्वोपरि है। जनता सर्वोपरि है। सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन लोकतंत्र और राष्ट्र की गरिमा किसी भी राजनीतिक दल से बड़ी है -रवि यादव




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