मामले में जांच दल गठित,जांच के आदेश अब होगी जिम्मेदारी तय...
ग्वालियर-चंबल का नगरीय प्रशासन, 57 निकायों में अरबों का लेन-देन 54 पृष्ठों में सिमटा !
मध्यप्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास विभाग के ग्वालियर-चंबल संभागीय कार्यालय से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक गड़बड़ियों का मामला अब लोकायुक्त तक पहुंच गया है। 57 नगरीय निकायों में भुगतान, नियुक्ति, पदोन्नति और प्रभार से जुड़े मामलों को लेकर 54 पृष्ठों की शिकायत लोकायुक्त भोपाल, वल्लभ भवन में अपर मुख्य सचिव और नगरीय प्रशासन आयुक्त कार्यालय में प्रस्तुत की गई है। शिकायत में अधिकारियों की भूमिका के साथ-साथ उन वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं, जिनकी जिम्मेदारी इन मामलों की निगरानी और समय रहते कार्रवाई करने की थी।
राष्ट्रीय भ्रष्टाचार उन्मूलन समिति के शिवपुरी जिलाध्यक्ष एवं आरटीआई कार्यकर्ता माखन सिंह धाकड़ द्वारा प्रस्तुत शिकायत में प्रभारी संयुक्त संचालक अमरसत्य गुप्ता, सहायक संचालक रीता कैलाशिया, प्रभारी लेखापाल सुनील लचौरिया और लिपिक सौरभ सिंह कौरव सहित अन्य की भूमिका की जांच की मांग की गई है। शिकायत में लगाए गए आरोपों का स्पष्टीकरण जांच के बाद ही सामने आएगा।
निलंबन के बाद भी गतिविधियां जारी रहने का आरोप !
शिकायत का सबसे अहम बिंदु 7 सितंबर 2026 को अमरसत्य गुप्ता के निलंबन से जुड़ा है। नगरीय प्रशासन आयुक्त संकेत भोंडवे द्वारा गुप्ता को निलंबित किए जाने के बाद भी शिकायतकर्ता ने कथित रूप से बैकडेट में आदेश जारी होने तथा भुगतान एवं अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं जारी रहने का आरोप भी लगाया है। अब यदि जांच में शिकायतकर्ता के द्वारा लगाए गए आरोप में सत्यता सामने आती है, तो सवाल यह भी उठेगा कि निलंबन के बाद संबंधित अधिकारी अथवा कर्मचारियों की गतिविधियों पर निगरानी किस स्तर से की जा रही थी और जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं किया।
सिर्फ अधिकारियों की भूमिका नहीं, निगरानी तंत्र भी सवालों में...
54 पृष्ठों की शिकायत में कई निकायों में नियुक्ति, पदोन्नति, DDO पावर, भुगतान, टेंडर प्रक्रिया और प्रभार वितरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यदि ये प्रक्रियाएं विभागीय रिकॉर्ड और डिजिटल पोर्टल के माध्यम से संचालित होती हैं, तो जिम्मेदारी निभाने वाला तंत्र अनजान क्यों बना रहा शिकायत में वरिष्ठ स्तर पर निगरानी की कमी और कथित प्रशासनिक अनदेखी की भी जांच किए जाने की मांग की गई है।
DDO पावर और भुगतान प्रक्रिया पर सवाल
शिकायतकर्ता ने शिकायत में यह भी आरोप लगाया है, कि अमरसत्य गुप्ता ने संयुक्त संचालक पद का विधिवत प्रभार लेने से पहले DDO पावर का इस्तेमाल किया। साथ ही पसंदीदा कर्मचारियों के माध्यम से भुगतान कराने तथा बिलों में GST और TDS की नियमानुसार कटौती नहीं की गई। अब जांच में यह महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित भुगतान किस अधिकारी ने स्वीकृत किए, बिलों की जांच किस स्तर पर हुई और भुगतान से पहले निर्धारित वित्तीय प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं।
नियुक्तियों और पदोन्नतियों पर भी गंभीर आरोप
शिकायत में फूप, दतिया, इंदरगढ़, गौरमी, सबलगढ़, चाचौड़ा और गुना सहित विभिन्न निकायों में अनुकंपा एवं संविदा नियुक्तियों तथा पदोन्नति से जुड़े मामलों को उठाया गया है। आरक्षित पदों पर कथित नियम विरुद्ध नियुक्ति, क्षेत्राधिकार से बाहर अनुकंपा नियुक्ति, सेवानिवृत्ति के बाद संविदा नियुक्ति और स्वीकृत पदों के विपरीत पदोन्नति जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।
शिवपुरी का 89 दिन वाला मामला भी जांच के दायरे में
शिकायत में शिवपुरी नगर पालिका से जुड़े एक मामले में 29 दिसंबर 1991 को 89 दिनों के लिए तदर्थ रूप से नियुक्त राघवेंद्र श्रीवास्तव को बाद में नियमित लेखापाल बनाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया गया है। आरोप है कि नियमों की अनदेखी करते हुए DPC आयोजित कर शासन को प्रस्ताव भेजा गया।
DPC की कार्यवाही और लागू नियमों की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी !
अमरसत्य गुप्ता को भिंड नगर पालिका में निर्माण कार्यों से संबंधित कथित अनियमित भुगतान की जांच रिपोर्ट समय पर प्रस्तुत नहीं करने सहित अन्य प्रशासनिक लापरवाहियों के आरोपों के चलते निलंबित किया गया था। शिकायत में अन्य विभागीय जांचों, लोकायुक्त प्रकरणों और न्यायालयीन मामलों से जुड़े प्रतिवेदनों के लंबित रहने का भी उल्लेख किया गया है। यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है, जब विभागीय स्तर पर जांच और प्रकरण लंबित थे तो उनकी नियमित निगरानी और समयबद्ध समीक्षा किस स्तर पर हुई।
57 निकायों के भुगतान की बिलवार जांच की मांग...
शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त से 57 नगरीय निकायों में हुए भुगतानों की Bill-by-Bill जांच, SNA स्पर्श पोर्टल के डिजिटल रिकॉर्ड का फॉरेंसिक ऑडिट तथा संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की विस्तृत जांच कराने की मांग की है। जांच में यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो मामला केवल कुछ अधिकारियों की कथित अनियमितताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही भी तय करने का सवाल उठेगा, जो इन गतिविधियों की निगरानी और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार था।
लोकायुक्त कार्यालय के द्वारा गठित किए गए जांच दल की नजरें इन बिंदुओं तक पहुंच सकेंगी निलंबन के बाद जारी कथित आदेशों, 57 निकायों के भुगतान की कुल राशि कितनी है, किस अधिकारी ने भुगतान स्वीकृत किए, वरिष्ठ अधिकारियों ने नियमित वित्तीय ऑडिट कराया क्या, गंभीर शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई।और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी केवल संबंधित कर्मचारियों की होगी या निगरानी में चूक करने वाले अधिकारियों की भी।
अब पूरे मामले में लोकायुक्त की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दस्तावेज, डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड और विभागीय फाइलों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोप कितने सही हैं और कथित अनियमितताओं की जिम्मेदारी किस स्तर तक जाती है




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